गोविंदराम निर्मलकर का निधन

राजनांदगांव | अतुल श्रीवास्तव: छत्तीसगढ़ के महान कलाकार गोविंदराम निर्मलकर नहीं रहे. रविवार को रायपुर के ज़िला अस्पताल में पद्मश्री गोविंदराम निर्मलकर ने अंतिम सांस ली.

जिन्होंने हबीब तनवीर का ‘चरणदास चोर’ देखा हो या ‘आगरा बाज़ार’, उन्हें गोविंद राम निर्मलकर ज़रुर याद होंगे. ‘चरणदास चोर’ का चोर हो या ‘आगरा बाज़ार’ का ककड़ी बेचने वाला हो, ‘लाला शोहरत बेग’ का शोहरत बेग हो या ‘देख रहे हैं नैन’ का दीवान, गोविंद राम निर्मलकर से आप बात करें तो लगता है, जैसे कल की ही बात हो. लेकिन गरीबी और लकवा की मार झेलते हुए गोविंदराम निर्मलकर इस दुनिया को अलविदा कह गये.

गरीबी और बीमारी ने उन्हें तोड़ दिया था. पद्मश्री समेत सारे सम्मान बेमानी साबित हुये और हालत ये हुई थी कि अपनी दवाइयां खरीदने और गृहस्थी की गाड़ी चलाने के चक्कर में वे लाख रुपये के कर्जे में डूब गये थे.

वह 1950 का जमाना था, जब 1935 में जन्मे 15 साल के गोविंदराम निर्मलकर हबीब तनवीर के साथ पहली बार नाटक की दुनिया में उतरे. छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य नाचा के कलाकार गोविंदराम ने 1954 में पहली बार दिल्ली थियेटर के लिये आगरा बाज़ार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उसके बाद तो आने वाले 50 साल जैसे गोविंदराम और हबीब तनवीर का नया थियेटर एक दूसरे की पहचान बन गये.

मिर्जा शोहरत बेग, बहादुर कलारिन, मिट्टी की गाड़ी, पोंगा पंडित, शाजापुर की शांतिबाई, गांव के नाम ससुरार मोर नाव दमाद, सोन सरार, जिन लाहौर नई वेख्‍या वो जन्‍म्या ई नई, कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना, वेणीसंघारम….और जाने कितने नाटक. एडिनबरा में चरणदास चोर के मंचन को याद करते हुए गोविंदराम निर्मलकर की आंखें चमकने लग जाती थीं- “52 देशों के नाट्य दल थे वहां और चरणदास चोर को श्रेष्ठ नाटक का सम्मान मिला. उसके बाद तो हमने दुनिया भर में उसका मंचन किया.”

छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव मोहरा से दुनिया के रंगमंच पर अपने अभिनय की छटा बिखेरने वाले गोविंदराम निर्मलकर जब अपने उम्र के आखरी पड़ाव में पहुंचे तो लगा कि अब अपनी जड़ों में ही रहकर कुछ किया जाये. लेकिन बीमारी ने इससे पहले उन्हें घेर लिया.

हबीब तनवीर और उनकी मंडली को करीब से जानने वालों को पता है कि हबीब तनवीर की टीम के आधार स्तंभ माने जाने वाले मदन निषाद से लेकर भुलवाराम यादव और फिदाबाई मरकाम तक के आखरी दिन कैसे गुजरे हैं. ऐसे में गोविंदराम निर्मलकर के साथ कुछ अलग होने की उम्मीद कम ही थी. लेकिन जब सरकार ने उन्हें पद्मश्री के लिये चुना तो उम्मीद जगी कि देर से ही सही, कम से कम सरकार ने उनकी प्रतिभा को पहचाना तो सही.

गोविंद राम अपनी पत्‍नी के साथ दिल्‍ली गये और पद्मश्री पाया. सम्मान लेकर अपने गृह जिले राजनांदगांव लौटे तो निर्मलकर के मन में कई अरमान थे. श्री निर्मलकर ने तब कह‍ था कि वे लुप्‍त होती नाचा विधा को नई पीढी को सौंपकर वे दुनिया से विदा होना चाहते हैं लेकिन उनकी इस इच्‍छा पूर्ति में आड़े आ गया उनका स्‍वास्‍थ.

लगभग 75 साल के गोविंद राम लकवा से पीड़ित थे और चाहते थे कि सरकार ने जब उन्‍हें यह सम्मान दिया है तो उनकी बीमारी को ठीक करने में मदद भी करे ताकि जिस नाचा कला के लिए उन्‍हें यह सम्मान मिला है, वह समय के साथ खत्‍म न हो. पर ऐसा नहीं हुआ. उन्हें कहीं से कोई मदद नहीं मिली. न अपने लिये न नाचा के लिये. सरकार की ओर से मिलने वाली 1500 की पेंशन ही उनके इलाज और घर चलाने के लिये आय का एकमात्र स्रोत था. और जरा हिसाब लगायें कि 1500 रुपये में आज के जमाने में क्या-क्या किया जा सकता है !

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