स्वास्थ्य बीमा नहीं…

छत्तीसगढ़ के चिकित्सक इन दिनों मुख्यमंत्री शहरी स्वास्थ्य योजना में मिलने वाली कम रकम का विरोध कर रहे हैं. उनका तर्क है कि चिकित्सा की जो दर रमन सरकार ने निर्धारित की है, उसमे वे चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करने में असमर्थ हैं. इससे दो बातें सामने आती है. पहली रमन सरकार के बारे में दूसरी केंद्र सरकार के बारे में.

यदि रमन सरकार को केंद्र द्वारा निर्धारित राशि में ही चिकित्सा करवानी है तो उन्हें चिकित्सा खर्च को कम करवाना पड़ेगा. यानी सुशासन कायम करने के लिये शासन करना पड़ेगा. आज भी वाह्य रोगियों के चिकित्सा का खर्च सबसे ज्यादा दवाओं पर ही होता है. इसके अलावा भर्ती हुए मरीजों के क्षेत्र में दवाओं पर खर्च कम होता है एवं जाँच, शल्यक्रिया का खर्च ज्यादा बैठता है.


ईमानदारी की बात की जाये तो रमन सरकार करों में छूट और चिकित्सकों को विभिन्न तरह की छूट दे कर कुछ हद तक इन्हें कम कर सकती है. जिससे कि चिकित्सकों को इस योजना के तहत सेवा प्रदान करने से नुकसान न उठाना पड़े. कमसे कम दवाओं में तो करों में छूट दी ही जा सकती है. यह बात आम है कि दवाओं पर कई-कई बार कर लगाये जाते हैं. दवा बनाने से लेकर उसकी पैकिंग, वितरण, बिक्री सभी पर तो कर लगाये जाते हैं. यदि चिकित्सा उपकरणों के मूल्य घटा दिए जाएं तो चिकित्सा पर लगने वाला खर्च कम हो जाता है.

दूसरी बात केंद्र सरकार की मंशा को लेकर है, जो करदाताओं के पैसे से प्राप्त धन को सरकारी अस्पतालों को उन्नत बनाने के लिये खर्चने के बजाय निजी क्षेत्र पर खर्च कर रही है. अपने अस्पताल सुधारने के बजाये हरेक व्यक्ति को एक तयशुदा रकम दे कर उसे निजी अस्पताल और डाक्टरों के हवाले करने के पीछे कोई महान जन कल्याण तो कम से कम नहीं ही छुपा हुआ है. बारहवीं योजना के प्रारूप में ही है कि आने वाले समय में स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजीकरण के ऊंट को घुसने दिया जायेगा. साथ ही साथ केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र में विदेशी निवेश की छूट भी दे रखी है. आने वाले समय में विदेशी नैगम अस्पताल भारत में आयेंगे. मनमोहन-मोंटेक की जोड़ी भविष्य में आने वाले इन दैत्यों के लिये अभी से आसान बाजार तैयार करके रखना चाहती है. जाहिर है, मुद्दा निजीकरण बनाम सरकारी सेवाओं का है.

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