प्रतिबंध की गारंटी वाले इश्तहार

सुनील कुमार
दिल्ली के अखबारों में दो दिन पहले एक बड़ा सा इश्तहार छपा जिसे लेकर नाराजगी में उबल पड़े लोगों ने उस कंपनी से शिकायत की. इश्तहार की तस्वीर से दिखता है कि यह चिकन से बने हुए खाने के सामान का कोई रेस्त्रां या ब्रांड है, और अंग्रेजी का यह इश्तहार कहता है- कुछ ऐसा आजमाओ, जिसे दोनों हाथों से दबोच सको.

इसके बाद चिकन की तस्वीर के नीचे लिखा हुआ है हम बुरा नहीं मानेंगे अगर आप अपने हाथों से हमारे नितंब (बन्स), या सीने (ब्रेस्ट) या यहां तक की हमारी जांघों को भी अगर छुएंगे. आपकी जो कुछ भी पसंद हो, हमारे खाने को दोनों हाथों से पकड़ सकते हैं.

जाहिर तौर पर यह विज्ञापन महिलाओं के शरीर की तरफ इशारा करते हुए बनाया गया है, और ऐसा लगता है कि जिस विज्ञापन एजेंसी ने इसे तैयार किया होगा, उसे खुद भी पता होगा कि मीडिया में पैसे देकर यह ब्रांड इस विज्ञापन को जितनी जगह दिलवाएगा, उससे कई गुना अधिक जगह इसे लेकर खड़े होने वाले विवाद से मुफ्त में इसे मिल जाएगी. बाजार का हाल हमेशा से यही रहता है कि बदनाम हुए, तो क्या नाम न हुआ?

हिन्दुस्तान ही नहीं, दुनिया के बहुत से देशों में ऐसे विज्ञापन बनाए जाते हैं जिनका मकसद प्रतिबंधित होना ही होता है. वहां पर रंगभेद, नस्लभेद, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले, महिलाओं को नीचा दिखाने वाले, बच्चों पर क्रूरता वाले, हिंसा और अश्लीलता वाले कई तरह के ऐसे विज्ञापन बनाए जाते हैं, सड़कों के किनारे ऐसे पोस्टर-होर्डिंग लगाए जाते हैं जिन पर प्रतिबंध लगना तय सा रहता है, लेकिन इनको लेकर शिकायतें होती हैं, प्रदर्शन होते हैं, और अदालत, सरकार, या किसी और किस्म के संवैधानिक आयोग जब तक इन पर रोक लगाते हैं, तब तक इस ब्रांड का खासा प्रचार हो चुका रहता है.

लेकिन जनता का एक छोटा तबका जागरूकता के साथ ऐसे विज्ञापनों या प्रचार का विरोध तो करता है, लेकिन इनका बहिष्कार नहीं करता. ऐसी हरकतों को सच में ही अगर रोकना हो तो लोगों को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझते हुए, ऐसे ब्रांड और सामान का सामाजिक बहिष्कार करना होगा, तब कहीं जाकर इनको कुछ चोट लग सकती है. लेकिन बाजार में ग्राहक की सामाजिक जवाबदेही, उसकी नैतिक जिम्मेदारी का इतना बुरा हाल है कि जो अमरीका मध्य-पूर्व के जिन देशों पर हमले कर रहा है, उन देशों में भी गैरजरूरी अमरीकी सामानों के बहिष्कार की कोई सोच नहीं है. बहुत से मुस्लिम देशों पर अमरीका ने हमले किए हैं, और दुनिया में मुस्लिम-गैरमुस्लिम तनाव खड़ा किया है, लेकिन फिर भी दुनिया के मुस्लिमों में अमरीकी सामानों के बहिष्कार की कोई सोच नहीं है.

लेकिन विज्ञापनों की अगर बात करें तो हिन्दुस्तान में लोगों की भावनाओं को, और सामाजिक हकीकत को नुकसान पहुंचाने वाले विज्ञापनों का सिलसिला कभी खत्म ही नहीं होता है. इन दिनों टीवी पर एक इश्तहार लगातार चलता है, राजश्री पान मसाला के विज्ञापन में एक फिल्म अभिनेता अलग-अलग समाजसेवी स्थितियों के साथ यह जताने की कोशिश करता है कि राजश्री पान मसाला खाने वालों की सोच महान हो जाती है. इस अभियान का नारा ही यह है कि स्वाद में सोच है.

अब पान मसाला की हकीकत जानने वाले यह तो जानते हैं कि पान मसाला में कैंसर है लेकिन पान मसाला के स्वाद से भी कोई ऐसी सोच निकल सकती है कि लोग अपने पुराने कपड़े दूसरे जरूरतमंद लोगों को दान करने लगें, रक्तदान करने के लिए जाने लगें, और ऐसी ही दस और किस्म की समाज सेवा पान मसाला के स्वाद से उनको सूझने लगे, तो फिर सरकार को जागरूकता के अभियान बंद करके सरकारी खर्च पर राजश्री पान मसाला ही जनता को अनिवार्य रूप से खिलाना चाहिए.

यह बहुत ही अपमानजनक, और घटिया अभियान है, लेकिन यह अपने किस्म का अकेला अभियान नहीं है. बाजार के कारोबारी और विज्ञापन एजेंसियों का तालमेल लोगों का ध्यान खींचने के लिए, या बखेड़े खड़े करने के लिए ऐसा काम पूरी दुनिया में करते हैं. यह एक अलग बात है कि इनके मुकाबले जागरूकता पैदा करने के सामाजिक आंदोलन के विज्ञापन इनसे भी कहीं अधिक असरदार बनने लगे हैं, और लोग उनको आगे भी बढ़ाने लगे हैं. ऐसे जागरूकता के विज्ञापन मीडिया के कुछ लोग अपने अखबारों में, या चैनलों पर खुद होकर भी दिखाने लगे हैं, छापने लगे हैं.

आज मुफ्त के सोशल मीडिया के चलते हुए दिल्ली के इस ताजा विज्ञापन के खिलाफ बड़ा कड़ा विरोध शुरू हुआ है, लोगों ने जमकर इसकी आलोचना की, और कुछ संवैधानिक संस्थाओं ने इसकी शिकायत भी की. लेकिन यह जागरूकता बढ़ते चलना जरूरी है, इसे धिक्कारना जरूरी है, क्योंकि बाजार ऐसी हरकत करते ही रहेगा, और सामाजिक जवाबदेही से अनजान लोग इन विज्ञापनों को देखते हुए भी ऐसे ब्रांड खाते रहेंगे, और उनका कारोबार बढ़ाते रहेंगे. आज ऐसे वक्त पर होना यह चाहिए कि ऐसी सोच के खिलाफ लोगों को सोशल मीडिया पर बात बढ़ानी चाहिए, कुछ जनसंगठनों को ऐसे ब्रांड के खिलाफ उनके सामने प्रदर्शन करना चाहिए, और जो-जो कानूनी कार्रवाई हो सकती है, वह सब करनी चाहिए.

* लेखक दैनिक छत्तीसगढ़ के संपादक हैं.

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