हम भाषा के सेवक हैं

राहुल राजेश
किसी भी काम को अंजाम देने के लिए सबसे जरूरी और सबसे पहली शर्त यह होती है कि हम सबसे पहले यह जानें यानी यह शर्तिया जान लें कि हमें करना क्या है? और करना क्या है, यह हम तब तक नहीं जान पाएँगे, जब तक कि हम खुद को नहीं जानेंगे!

यह मानुष तन दुर्लभ है. यदि हम अबतक नहीं जान पाए हैं कि यह मानुष तन क्यों मिला है, यह मानुष जन्म क्यों मिला है, तो फिर हमारा यह मानुष तन व्यर्थ है! हमारा यह मानुष जन्म व्यर्थ है!


सबसे पहले खुद को जानें

तो ठीक ऐसे ही, यदि हम अबतक यह नहीं जान पाए कि हम क्या हैं यानी हम राजभाषा अधिकारी क्यों बने हैं तो हमारा राजभाषा अधिकारी बनना और राजभाषा अधिकारी होना व्यर्थ है! मैं यहाँ राजभाषा अधिकारी ‘बनने’ से कहीं बहुत अधिक जोर राजभाषा अधिकारी ‘होने’ पर दे रहा हूँ. कहने का सीधा आशय यह है कि आप राजभाषा अधिकारी बन गए हैं, अब राजभाषा अधिकारी होइए!

यदि आपका ‘ट्रांसफॉर्मेशन’ या कहें कि ‘मेटामॉर्फोसिस’ यानी कायांतरण राजभाषा अधिकारी बनने से राजभाषा अधिकारी होने में नहीं हो पाया, यानी ‘from seen as a Rajbhasha Officer’ से ‘Being a Rajbhasha Officer’ में आप खुद को कायांतरित (ट्रांसफॉर्म) नहीं कर पाए तो जान लीजिए कि आप इस काम के लिए नहीं बने हैं! बेहतर होता कि आप कहीं थानेदार या दरोगा बन जाते!

जरा गौर कीजिए, हमारे प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी खुद को प्रधानमंत्री नहीं, प्रधान सेवक कहते हैं! वे खुद को कभी प्रधानमंत्री नहीं कहते! वे हरदम खुद को प्रधान सेवक ही कहते हैं! तो ठीक ऐसे ही, हम राजभाषा अधिकारी नहीं, दरअसल भाषा के सेवक हैं! भाषा-सेवक हैं!

जब तक हम खुद को राजभाषा अधिकारी कहते रहेंगे, हम इस पद के अधिकारी नहीं होंगे! इस पद की गरिमा के अधिकारी नहीं हो पाएँगे! और जब हम खुद इस पद की गरिमा के अधिकारी नहीं हो पाएँगे तो हम औरों को इस पद की गरिमा का एहसास कैसे करा पाएँगे?

तो यह साफ-साफ समझ लीजिए कि आँकड़े तैयार करना, आँकड़े भरना और आँकड़े भेजना हमारा असली काम नहीं है! आप आँकड़ों से खेल सकते हैं, लेकिन भाषा से नहीं! आप भाषा से खेलेंगे तो भाषा आपको नंगा कर देगी! लेकिन सच्चाई यही है कि हम अब तक भाषा से खेलते आए हैं और इसलिए हम हर बार नंगा होते आए हैं!

हमारा असली काम क्या है?

हमारा असली काम है – भाषा को संवारना. भाषा को संभालना. भाषा को गिरने से बचाना. भाषा को लड़खड़ाने से बचाना. भाषा के लिए नई जमीन तैयार करना. भाषा की जमीन में उग आए खर-पतवार को हटाना. भाषा के अन्न में मिल आए कंकर-पत्थर को बीनना! पर हम हकीकत में क्या करते हैं?

हम आँकड़ों को संजाते-संवारते रहते हैं! हम आँकड़ों को संभालते रहते हैं! हम आँकड़ों को गिरने से बचाते रहते हैं! हम आँकड़ों में घुस आए खर-पतवार छांटते रहते हैं!

ऐसा करने से आँकड़े मांगने वाले भले हमें माफ कर दें, भाषा हमें माफ नहीं करेगी! ऐसा करने से भले आपके बॉस खुश हो जाएँ, भाषा कतई खुश नहीं होगी! ऐसा करने से भले राजभाषा अधिकारी को धड़ाधड़ ‘प्रोमोशन’ मिल जाए, पर यकीन मानिए, भाषा-सेवक का ‘डिमोशन’ ही होगा! क्योंकि आँकड़ों की ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ से भाषा का कोई भला नहीं हो रहा है!

विज्ञान की भाषा में कहें तो हम दीवार पर बल (फोर्स) तो लगा रहे हैं पर हम एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं! तो असल में भाषा की जमीन पर कोई कार्य ही निष्पादित नहीं हो रहा है क्योंकि ‘वर्क डन इज इक्वल टू फोर्स अप्लाईड इंटू डिस्टेंस’!

जरा गौर कीजिए! इतनी चाक-चौबंद व्यवस्था और इतना ‘रोबस्ट सिस्टम’ होने के बावजूद किसी भी ‘पॉलिसी इम्प्लीमेंटेशन’ में इतना लोचा है तो हमारे ‘ऑफिसियल लैंग्वेज इम्प्लीमेंटेशन’ में कितना लोचा होगा!

संबंधित ‘ऑथरिटी’ के इतने कड़े रूख, इतने कड़े तेवर, इतने कड़े निर्देश, इतनी कड़ी निगरानी के बावजूद, ‘पॉलिसी इम्प्लीमेंटेशन’ के तत्काल ‘डिजायर्ड इफेक्ट्स अचीव’ नहीं हो पाते तो ‘ऑफिसियल लैंग्वेज इंम्प्लीमेंटेशन पॉलिसी’ तो प्रेरणा और प्रोत्साहन पर आधारित है! हम चाहकर भी एक झटके में शून्य से शतांक तक नहीं पहुँच सकते.

अपनी विशेषज्ञता को पहचानिए

यह जान लीजिए कि आँकड़े जुटाना, भरना, भेजना महज ऊपरी काम है! जिसे कोई भी कर सकता है. इसमें राजभाषा अधिकारी की विशेषज्ञता कहाँ है? हमारा असली और अंदरूनी काम है- भाषा का इस्तेमाल बढ़ाना! पर यह बात किसी से नहीं छिपी है कि आँकड़ों के बढ़ने से भाषा का इस्तेमाल नहीं बढ़ता!

आँकड़ों से भाषा का कभी भला नहीं होता! भाषा के इस्तेमाल से भाषा का भला होता है! और आँकड़े भाषा का इस्तेमाल नहीं करते! लोग करते हैं भाषा का इस्तेमाल! पर लाख दावे और छलावे के बावजूद, आँकड़ों के बहुत करीब पहुँच कर भी हम लोगों से बहुत दूर हैं!

प्रवीणता प्राप्त और कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त कर्मचारियों की संख्या मात्र बढ़ा देने से भाषा का इस्तेमाल नहीं बढ़ जाता! पर हम यही मानते हैं! और जब असल में इस्तेमाल नहीं बढ़ पाता है तो हम आँकड़े बढ़ा देते हैं! दरअसल हम लोगों के पास आँकड़े मांगने जाते हैं, भाषा का इस्तेमाल बढ़ाने नहीं जाते हैं!

इसलिए लोग भी हमें ‘डाटा एंट्री ऑपरेटर’ से अधिक कुछ नहीं समझते! या कहें, हम भी खुद को ‘डाटा एंट्री ऑपरेटर’ ही समझ बैठे हैं! वरना एक भाषा का सेवक, भाषा का किसान किसी के पास जाए और वह खाली हाथ लौट आए, ऐसा हो ही नहीं सकता!

राजभाषा अधिकारी दरअसल राजभाषा नहीं, भाषा अधिकारी होता है. वह ‘ऑफिसियल लैंग्वेज ऑफिसर’ नहीं, दरअसल ‘लैंग्वेज ऑफिसर’ होता है. वह ‘ट्रांसलेशन ऑफिसर’ होता है. एक राजभाषा अधिकारी दरअसल भाषाकर्मी होता है. जैसे बैंकिंग क्षेत्र में काम करने वाला कोई भी व्यक्ति सबसे पहले ‘बैंकर’ होता है.

जैसे ‘नॉलेज इंस्टीट्यूटशंस’ कहे जाने वाले तमाम संस्थानों के बाकी लोग ‘नॉलेज ऑन्ट्रेप्रेन्योर्स’ हैं, ठीक वैसे ही, हम राजभाषा अधिकारी ‘लैंग्वेज ऑन्ट्रेप्रेन्योर्स’ हैं! इसलिए हमें भाषा का उद्यमी होना है, आँकड़ों का नहीं! हमें भाषा का अध्यवसायी बनना है, आँकड़ों का नहीं! हमें अनुवाद का अनुगामी बनना है, आँकड़ों का नहीं! हमें भाषा का अभ्यासी बनना है, आँकड़ों का नहीं!

पर अफसोस कि आँकड़ों में लगातार लोटते-पोटते, हम ‘आउटपुट-ओरिएंटेड ऑफिसर’ बन गए हैं! जबकि प्रचलित धारणा के उलट, हमको ‘इनपुट-ओरिएंटेड ऑफिसर’ बनना है! हम अबतक ‘मैक्रो लेवल’ पर काम करते आए हैं, जबकि असल में हमें ‘माइक्रो लेवल’ पर काम करना है!

खोजी बनिए, खबरी नहीं!

आँकड़ों के फेर में हम भाषा में अन्वेषी बनना भूल गए हैं. दरअसल हम आँकड़े बढ़ाने-घटाने के चक्कर में खोजी होने के बजाय, खबरी बन गए हैं! चाहे सेमिनार हो या सम्मेलन, कोई कार्यशाला हो या कोई बैठक- हम ले-देकर बस आँकड़ों में ही लटपटाए रहते हैं!

राजभाषा सेमिनारों, सम्मेलनों आदि में भी पढ़े जाने वाले पर्चे भी, भाषा और अनुवाद को छोड़कर, अन्य तमाम मुद्दों पर केन्द्रित होते हैं और उन्ही ‘विषयेतर’ मुद्दों पर आह-वाह करने की अब तो स्थापित परंपरा भी बन चुकी है!

हिंदी को प्रोत्साहन और हिंदी दिवस मनाने के नाम पर हम सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश करने-कराने वाले सांस्कृतिक कर्मी में तब्दील हो जाने को तत्पर होते हैं पर शायद ही हम आपस में कभी भाषा पर, अनुवाद पर, किसी नए अंग्रेजी शब्द के सही, सटीक पर्याय पर गंभीरता से, शिद्दत से बात करते हैं! शब्दावली-निर्माण आदि को केंद्र में रखकर किए गए हमारे इक्के-दुक्के प्रयास भी दरअसल खानापूर्ति जैसी औपचारिक और ठस्स मशक्कत ही होते हैं, जिसमें भाषा के जज्बे से कम ही काम लिया जाता है!

ऐसे में न तो अल्प-प्रचलित हिन्दी पर्यायों को और माँजने, इस्तेमाल में लाने की कहीं कोई सच्ची कोशिश दिखती है और न ही कहीं कार्यालयीन कामकाज में प्रयुक्त हो रही हिन्दी और दैनंदिन अनुवाद को और अधिक सहज-सरल बनाने की सतत कोशिश दिखती है!

हम कभी किसी शब्द या अनुवाद को लेकर कभी चर्चा-परिचर्चा नहीं करते जबकि भाषा और अनुवाद ऐसी अंतःक्रियाएँ हैं जो चौबीसों घंटे हमें अपने आप में डुबोए रखती है. पर हम भाषा की नदी और अनुवाद के समंदर में कभी तबीयत से छलांग ही नहीं लगाते!

भाषा को भ्रष्ट होने से भरसक बचाएँ

हम भाषा के सेवक हैं. इसलिए हमारा दायित्व भाषा को भ्रष्ट होने से बचाना भी है. एकदम शुद्धतावादी होने से बचते हुए और भाषायी विवेक का सचेत इस्तेमाल करते हुए, हमें भाषा को न तो एकदम संस्कृतनिष्ठ ही बनने देना है और न ही भाषा को एकदम दरिद्र बना देना है!

जैसे मौद्रिक नीति के अंतर्गत नीतिगत ब्याज दर तय करने में हम पीएलआर, बीपीएलआर, बेस रेट से आगे बढ़ते हुए, आज एलएएफ यानी ‘लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी’ तक चले आए हैं, ठीक वैसे ही, हमारी राजभाषा हिंदी भी संस्कृतनिष्ठ से बहुत आगे बढ़ते हुए, ‘मॉडर्न’ और ‘मार्केट-फ्रेंडली’ हो गई है.

लेकिन जैसे हम ‘कॉल मनी मार्केट’ के ‘रेट कॉरिडोर’ को चौड़ा (वाइड) नहीं, संकरा (नैरो) ही रखते हैं ताकि नीतिगत दर ‘निर्धारित’ करने का ‘उद्देश्य’ ही हमारे हाथ से न निकल जाए, ठीक वैसे ही हम हिंदी में अंग्रेजी की मिलावट के ‘कॉरिडोर’ को भी एकदम ढीला नहीं छोड़ सकते, नहीं तो हमारी भाषा ही हमारे हाथ से निकल जाएगी! तब यह भले बहुत कुछ और हो जाए, हिंदी तो जरा भी नहीं रह जाएगी!

संस्कृतनिष्ठ बनाम सहज-सरल पर्याय के इस मामले को इस उदाहरण से भी समझिए. बॉलीवुड की हिंदी फिल्मों में ‘लव-ट्राइंग्ल’ का खूब इस्तेमाल होता है! अंग्रेजी के इस ‘लव ट्राइंग्ल’ के लिए हिंदी में ‘प्रेम-त्रिकोण’ कहा जाता है! लेकिन इसमें ‘प्रेम’ और ‘त्रिकोण’ -दोनों शब्द ही घनघोर संस्कृतनिष्ठ हैं!

कइयों को तो इन्हें बोलने में तो कइयों को इन्हें समझने में भी घनघोर कठिनाई होती होगी! तो इस संस्कृतनिष्ठ ‘प्रेम-त्रिकोण’ को सरल-सहज करते हुए क्यों न ‘प्यार-तिकोना’ कर दिया जाए? लेकिन क्या इसमें वही बात, वही स्वाद है, जो उस संस्कृतनिष्ठ ‘प्रेम-त्रिकोण’ में है?? और सबसे मजेदार सवाल तो यह कि इतना संस्कृतनिष्ठ होने के बावजूद यह हिंदी पर्याय इतना प्रचलित और स्वीकृत कैसे हो गया?? यानी समस्या संस्कृतनिष्ठ होने में नहीं है, इनके इस्तेमाल के प्रति निर्रथक दुराग्रह और दुष्प्रचार में है!!

बिना भरदम कोशिश किए, हार न मानें

अक्सर संस्कृतनिष्ट हिन्दी और संस्कृतनिष्ठ हिन्दी पर्याय के निराधार आरोप की आड़ में लोग हिन्दी में सीधे-सीधे अंग्रेजी शब्दों को ही स्वीकार कर लेने और इस्तेमाल में ले आने की पुरजोर वकालत करने लगते हैं. और यह वकालत दबाव और दबदबे की हद तक पहुँच जाती है.

ऐसे में राजभाषा अधिकारियों के लिए अपने घुटने टेक देना सबसे आसान रास्ता होता है. लेकिन इससे भाषा का सीधा-सीधा नुकसान तो होता ही है, उस गलत धारणा को भी बल मिल जाता है, जिस गलत धारणा के बल पर हिन्दी पर्यायों की जगह सीधे-सीधे अंग्रेजी शब्दों को आसानी से जगह मिल जाती है!

इसलिए इस प्रतिकूल रवैये से पार पाने का एक ही उपाय है कि हम सीधे-सीधे अंग्रेजी शब्दों को इस्तेमाल में लेने और लाने का भरसक विरोध करें और उन शब्दों के लिए हिन्दी में उपलब्ध सटीक और समर्थ हिन्दी पर्यायों को सामने रखने और उनको इस्तेमाल में लाने का दृढ़तापूर्वक प्रयास करें. इसके लिए हम लोगों से खुलकर चर्चा करें, अन्य भाषाओं से उदाहरण लेकर उन्हें समझाने-बुझाने की कोशिश करें.

उन हिन्दी पर्यायों का उदाहरण दें जो शुरू में अटपटे लगते थे लेकिन इस्तेमाल में आने के बाद, धीरे-धीरे सहज और अपने लगने लगे. प्रबंधन, प्रसंस्करण, आरक्षण, ई-बटुआ, ई-भुगतान, समय-सारणी, जैव-विविधता, पर्यावरण-हितैषी आदि-आदि जैसे सैकड़ों शब्द शुरू में लोगों को शायद थोड़े असहज लगे होंगे, लेकिन अब वे प्रचलित होते-होते मानक और सहज हो गए हैं!

इसलिए यदि आप सचमुच भाषा के सेवक हैं तो भाषा के हक में बिना भरदम कोशिश किए, कभी हार न मानें.

प्रांतीय भाषाओं से क्यों नहीं?

मुंबई में आप यदि सड़क मार्ग से शहर में या शहर के इर्दगिर्द यात्रा कर रहे हों तो जरा गौर करें कि अंग्रेजी में लिखे यातायात-निर्देशों को मराठी में कितनी सहजता से व्यक्त किया गया है!

मैं अपनी बात कुछेक उदाहरण की मदद से स्पष्ट करता हूँ. अंग्रेजी शब्द ‘Flyover’ के लिए मराठी में ‘उड्डानपुल’ लिखा गया है. फिर हम हिन्दी में सीधे-सीधे अंग्रेजी शब्द ‘फ़्लाइओवर’ ही क्यों लिख देना चाहते हैं? क्या हम इसके बदले हिन्दी में भी ‘उड्डानपुल’ नहीं लिख सकते?

इसी तरह अंग्रेजी शब्दों ‘Free Way’ और ‘Underpass’ के लिए मराठी में क्रमशः ‘मुक्त मार्ग’ और भुसारी मार्ग’ शब्द प्रयोग किए गए हैं, जो बिलकुल साफ-साफ समझ में आते हैं. लेकिन हम हिन्दी में सीधे-सीधे ‘फ्री वे’ और ‘अंडरपास’ ही लिख देना चाहते हैं! क्या हम हिन्दी में भी क्रमशः ‘मुक्त मार्ग’ और ‘भुसारी मार्ग’ शब्द प्रयोग नहीं कर सकते? क्या हम इन्हें हिन्दी में धड़ल्ले से इस्तेमाल कर प्रचलित नहीं बना सकते?

पर लोगों को तुरंत आपत्ति हो जाएगी कि ये तो अटपटा है! भाई, ये शब्द न तो मराठियों के लिए अटपटे हैं न हिंदीभाषियों के लिए. मैं पूछता हूँ, जब आप सीधे-सीधे अंग्रेजी शब्दों को स्वीकार कर लेने को उतावले हैं तो आपको प्रांतीय भाषाओं के इतने सहज-सुंदर पर्यायों को अपनाने में दिक्कत क्यों हो रही है?

मुझे तो ‘Underpass’ के लिए यह ‘भुसारी मार्ग’ बहुत प्यारा पर्याय लग रहा है! मराठी में ‘Accident Prone Zone’ को ‘अपघात प्रवण क्षेत्र’ कहा जाता है. मुझे तो यह ‘दुर्घटना संभावित क्षेत्र’ से कहीं अधिक सहज-सरल पर्याय लग रहा है और इसका प्रयोग करने में भी किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए!

अभी हाल में कोलकाता के एक चिकित्सा जाँचघर में ‘X-Ray’ को हिन्दी में ‘क्ष-किरण’ लिखा हुआ देखा तो मुझे बहुत खुशी हुई. हम ‘X-Ray’ को हिन्दी में भी ‘एक्स-रे’ ही लिखते आ रहे हैं. पर देखिए, ‘क्ष-किरण’ के रूप में यहाँ इसका कितना सही, सटीक और संप्रेषणीय पर्याय इस्तेमाल किया जा रहा है!

इसलिए भाषा में नए शब्दों की आवाजाही सिर्फ एक ही भाषा (अंग्रेजी) तक सीमित न रह जाए, यह भी हम भाषा के सेवकों को देखना होगा.
* लेखक हिंदी के चर्चित कवि और पेशे से राजभाषा अधिकारी हैं.

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