दासी जैसी हिंदी

राजकिशोर
अब निश्चित रूप से मेरी यह राय हो चुकी है कि 14 सितम्बर को ‘हिंदी दिवस’ के रूप में नहीं, ‘हिंदी बचाओ दिवस’ के रूप में मनाया जाना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता है, तो हिंदी दिवस मनाना ही छोड़ देना चाहिए. एक अपंग, असहाय दर्शक के रूप में हिंदी की हालत पर आंसू बहाने का कर्मकांड हम कब तक करते रहेंगे?

अब सरकारी दफ्तरों में हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़ा भी मनाया जाता है. इस हिंदी प्रेम को मैं कटे पर नमक मानता हूं. यह उस मिठाई की तरह है, जो उस आदमी को खिलाई जाती है जिसकी टांग काटी जा रही है. हिंदी की यह दुर्दशा क्या एक ऐतिहासिक न्याय है?


हिंदी यानी खड़ी बोली हिंदी ने कई भाषाओं पर हमला करके अपनी यह हैसियत बनाई है. ये घायल भाषाएं भोजपुरी, अवधी, मैथिल, ब्रजभाषा, बुंदेलखंडी, राजस्थानी आदि अब धीरे-धीरे उठ रही हैं और अपना-अपना हक मांग रही हैं. शासन ने कुछ के साथ समझौता कर लिया है. हो सकता है, वोट पाने के लिए आगे भी ऐसे समझौते हों. लेकिन पिछले दो सौ सालों में हिंदी इतना आगे बढ़ चुकी है कि हिंदी क्षेत्र की कोई भी अन्य भाषा उससे मुकाबला नहीं कर पाएगी. पर क्षेत्रीय भाषाओं का हक मार कर बढ़ने वाली हिंदी अब स्वयं एक क्षेत्रीय भाषा बन गई है, बल्कि वह भी नहीं, देश के निम्न-मध्य वर्ग की भाषा.

जिनके पास थोड़ा-सा भी पैसा है, वह अनायास, सहज भाव से अंग्रेजी की तरफ खिसक जाता है, जैसे पानी अपने से नीचे के तल पर अनायास खिसकता जाता है.

मुझे लगता है, हिंदी के साथ जो ट्रेजेडी हुई है, उसे ठीक से समझा नहीं गया है. अंग्रेजों के आने से पहले भारत दर्जनों क्षेत्रों में बंटा हुआ था. सब के अपने-अपने शासक थे और अपनी-अपनी भाषा. अंग्रेज शासकों ने भारत का राजनीतिक एकीकरण किया, पर चार सौ से ज्यादा रियासतों को अपने प्रत्यक्ष शासन में नहीं लिया. इन रियासतों को सरदार पटेल ने आजाद कराया और भारत की राजनीतिक एकता को विस्तृत तथा मजबूत किया.

उस समय भारत के सामने दो रास्ते थे. एक रास्ता यह था कि वह छोटे-छोटे गणराज्यों का महासंघ बन जाए. इससे देश कमजोर होता, पर इससे भारतीय भाषाओं का स्वाभाविक विकास होता. तब खड़ीबोली हिंदी किस राज्य की भाषा बनती? इसकी कल्पना करना भी संभव नहीं है. भारत के सामने दूसरा विकल्प यह था कि वह एकात्मक सरकार बनने की कोशिश करे. फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन आदि में ऐसी ही सरकारें हैं.
वस्तुत: राष्ट्र-राज्य की अवधारणा ही इस मॉडल पर टिकी हुई है : एक देश, एक धर्म, एक संस्कृति, एक भाषा. इस अवधारणा के तहत ही हिंदी को राष्ट्र-भाषा के रूप में देखा गया और उस समय के प्राय: सभी महत्त्वपूर्ण लोगों ने इसके पक्ष में अपनी राय दी थी. शायद वे यह मान कर चल रहे थे कि भारत भी चीन, जापान की तरह एक राष्ट्र बनेगा जहां बहुसंख्य लोग एक ही भाषा बोलते हैं. लेकिन भारतीय स्थितियों में यह संभव नहीं था. यहां हिंदी जितने लोग बोलते हैं, उनसे चार-पांच गुना ज्यादा लोग मराठी, बांग्ला, कन्नड़, तमिल आदि दूसरी भाषाएं बोलते हैं.

हिंदी की स्थिति और उसका स्वभाव, दोनों कुछ ऐसे हैं कि वह अपने आप भारत की संपर्क भाषा बन गई है. लेकिन भारतीय गणराज्य का जो राजनीतिक ढांचा है, उसमें राष्ट्रभाषा नाम की कोई चीज हो नहीं सकती. वह केंद्र सरकार के काम-काज करने की भाषा जरूर बन सकती है और बहुत सोचने-विचारने के बाद हमारे संविधान निर्माता भी इसी निर्णय तक पहुंचे थे. उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया, केंद्र सरकार की भाषा बनाया.

हिंदी अभी तक केंद्र की राजभाषा बन जाती तो आज उसकी यह हिजड़ा स्थिति न होती. लेकिन यह होना नहीं था, न कभी होना है. नरेन्द्र मोदी डिक्टेटर हो जाएं, तब भी हिंदी को उसका संवैधानिक दरजा नहीं दिला सकते. इसका कारण यह है कि संविधान बनाते समय भले ही हिंदी को केंद्र की राजभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया गया हो, पर जिन्हें आगे चल कर शासन करना था, वे सभी अंग्रेजी वाले थे. हिंदी को इसलिए स्वीकार करना पड़ा क्योंकि वह एक तरह से स्वतंत्रता संघर्ष की भाषा बन चुकी थी और उसकी जगह किसी और भाषा को देना संभव नहीं था. पर अंग्रेजी पहले से राजरानी थी और उसे राजरानी बनाए रखना आसान था.

हिंदी के प्रति विरक्ति इतनी थी कि स्वयं प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी हिंदी नहीं सीखी, न अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों और कांग्रेस पार्टी के गैर-हिंदी भाषी नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिंदी सीखने और हिंदी में कामकाज करने की प्रेरणा दी. जिसे अंग्रेजी में ‘ओरिजिनल सिन’ (पहला पाप) कहते हैं, वह यही था.

संविधान ने अंग्रेजी से हिंदी में में जाने के लिए पंद्रह वर्ष दिए थे. इसकी तैयारी 26 जनवरी 1950 से ही शुरू हो जानी चाहिए थी, जब संविधान लागू हुआ और 1965 में प्रशासन से अंग्रेजी की छुट्टी कर देनी चाहिए थी. तब गैर-हिंदी राज्य 1965 में उतना कोलाहल नहीं करते. कोलाहल करते, तब इसे दबा दिया जा सकता था और यह संविधान के पूर्णत: अनुरूप होता. लेकिन ऐसा न कर नेहरू ने आश्वासन दे दिया कि किसी पर भी हिंदी थोपी नहीं जाएगी. उसी क्षण हिंदी का भविष्य तय हो गया था.

अंग्रेजी को राज करना था और हिंदी को दासी बने रहना था. अंग्रेजी के कसाव में जकड़ती गई इसके साथ ही यह भी हुआ कि सभी विषय की उच्च शिक्षा अंग्रेजी में दी जाती रही. भौतिकी, रसायनविज्ञान, जीवविज्ञान आदि का न तो भारतीयकरण हुआ और न तो हिंदीकरण. इसका कारण भी यही था कि भारत का उच्च और मध्य वर्ग अंग्रेजी के मोहपाश में और कड़ाई से बंधने लगा. जब सरकार में अंग्रेजी, उच्च शिक्षा में अंग्रेजी, विज्ञान में अंग्रेजी, उद्योग- वाणिज्य में अंग्रेजी तब चारों तरफ अंग्रेजी का बोलबाला हो, तो खादी की साड़ी पहने हिंदी कहां खड़ी रह सकती है? वर्तमान व्यवस्था में हिंदी का कोई भविष्य दिखाई नहीं पड़ता.

हिंदी का भविष्य बनने की एक ही सूरत है-भाषा के मामले में भारतीय संविधान को तुरंत लागू करने से. यह कैसे हो, इसी पर हमें विचार करना चाहिए. हिंदी दिवस इसका एक अच्छा अवसर हो सकता है.

नेहरू ने आश्वासन दे दिया कि किसी पर भी हिंदी थोपी नहीं जाएगी. उसी क्षण हिंदी का भविष्य तय हो गया था. अंग्रेजी को राज करना था और हिंदी को दासी बने रहना था. वर्तमान व्यवस्था में हिंदी का कोई भविष्य दिखाई नहीं पड़ता. हिंदी का भविष्य बनने की एक ही सूरत है- भाषा के मामले में भारतीय संविधान को तुरंत लागू करने से . यह कैसे हो, इसी पर हमें विचार करना चाहिए. हिंदी दिवस इसका एक अच्छा अवसर हो सकता है.

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