मकान खाली पड़े हैं

अनिल चमड़िया
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में एक बड़ी आबादी है, जो कि मुफ्त में एलपीजी के सिलेंडर की सुविधा मिलने के बाजवूद उसका वर्ष भर उपयोग नहीं कर पा रही है क्योंकि एक बार के बाद दूसरी बार सिलेंडर में गैस भरवाने के लिए जो पैसे चाहिए, उसका इंतजाम वे नहीं कर पाते हैं. यह हाल देश के कई राज्यों में है. स्वयं केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री ने यह आंकड़ा पेश किया है कि प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को 5 करोड़ एलपीजी कनेक्शन मुहैया कराने का लक्ष्य रखा है, उनमें अब तक वितरित गैस सीलिंडर में अच्छी खासी तादाद उन परिवारों की है, जो कि वर्ष भर गैस नहीं भरवा पाते हैं.

इस उदाहरण को मकानों की समस्या के साथ प्रस्तुत करने की एक वजह यह समझना है कि किसी भी समस्या को आंकड़ों में तब्दील करने के खतरे होते हैं. आंकड़ों में तो उपलब्धि दर्ज हो जाती है लेकिन जो समस्याग्रस्त है, वह समस्याओं से मुक्त नहीं हो पाता है बल्कि समाधान के रास्ते उसके लिए बोझ बन जाते हैं. आर्थिक समस्याओं का एक चक्र होता है. उस पूरे चक्र को जब तक समाधान की नीति का हिस्सा नहीं बनाया जाता है तो समस्याएं बनी रहती हैं.


भारत में मकान का मालिक होना सामंती और पूंजीवादी विचारों के प्रचार की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है. साहित्य में भी मकान का मालिक होना बड़े सपने के पूरा होने के रुप में परोसा जाता है. किरायेदारों की त्रासदी से भी साहित्य भरा पड़ा है. कई फिल्में बनी है. इन सबके उल्लेख का तात्पर्य है कि एक मकान का हरेक परिवार के मालिक बनने का सपना भारतीय राजनीति के लिए सबसे अनुकूल रहा है. लेकिन सरकारी नीतियों का यह आलम है कि मकान तो बन रहे हैं लेकिन बेघरों की आबादी कम नहीं हो रही है. यह समस्या तब से और जटिल होने की प्रक्रिया में दिख रही है, जब से इंसान और विकास को महज आंकड़े में तब्दील करने की विचारधारा प्रबल हुई है.

यहां केवल इस समस्या पर अपनी ओर से कुछ कहने के बजाय इससे संबंधित कुछ आंकड़े रख दिए जाएं तो तस्वीर साफ हो सकती है. भारत सरकार का नया आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि भारत के शहरों में एक तरफ तो आवास की कमी है तो दूसरी तरफ खाली मकानों की संख्या भी बढ़ रही है. 2001 में 65 लाख मकान खाली पड़े थे. इसके बाद विकास के आंकड़ों में ये आया कि बड़ी तादाद में नये मकान बनें हैं लेकिन उस आंकड़े का वास्तविक सच है कि खाली मकानों की तादाद दस वर्षो में बढ़कर 1 करोड़ 11 लाख हो गई. 2016 की जनगणना बताती है कि कुल शहरी आवास का 12 प्रतिशत हिस्सा खाली पड़ा है. इस आंकड़े की गहराई में जितना जा सकते हैं, वह देश में आर्थिक विकास के सच के उतने ही करीब हमें ले जाता है. यानी छोटे शहर, बड़े शहर, मध्य आकार के शहर और देश के विकसित शहरों के रुप में विकास का मॉडल वास्तव में भारतीय समाज में गैरबराबरी की आर्थिक नीतियों से रुबरु कराती है.

महाराष्ट्र में यदि बीस लाख मकान खाली पड़े है तो केवल मुंबई में 4 लाख 80 हजार मकान खाली पड़े हैं. दूसरा नंबर दिल्ली का है, जहां 3 लाख मकान खाली पड़े हैं. बैंगलुरु में भी इतनी ही संख्या खाली मकानों की है. यानी विकास के जितने बड़े मॉडल की तरफ हम बढ़ते हैं, खाली मकान की संख्या उतनी ही बढ़ती दिखाई देती है. देश की राजधानी दिल्ली का हिस्सा समझा जाने वाला गुडगांव को विकास के एक मॉडल के रुप में पेश किया जाता है लेकिन वहां का सच है कि देश में सबसे ज्यादा मकान यानी 26 प्रतिशत मकान खाली पड़े हैं. जाहिर सी बात है कि मकानों का निर्माण जरुरतमंदों के लिए नहीं है.

यह तो विकास का एक पक्ष है कि मकान बन रहे हैं लेकिन जरुरतमंदों को वे हासिल नहीं हो सकते हैं. लेकिन इससे जुड़े दूसरे पहलूओं पर भी गौर करें तो सबके लिए घर उपलब्ध कराने के नारे की हकीकत के करीब और पहुंचा जा सकता है. मसलन एक बड़ी आबादी है, जिसने कि बैंकों से महंगे ब्याज पर कर्ज लेकर मकानों के लिए रीयल स्टेट के धंधे में लगी कंपनियों को पैसे का भुगतान किया लेकिन उन्हें मकान उपलब्ध नहीं हो सका. यदि मकान मिला तो निजी कंपनियों की नौकरी से बाहर कर दिए गए और मकान की किस्ते पूरी नहीं दी जा सकी. कई लोगों के बारे में जानकारी है कि उन्होंने अपने सपने को पूरा करने के लिए दिन रात एक कर दिया लेकिन अचानक से कंपनी के मालिक ने उन्हें नौकरी से बाहर कर दिया और वे अपने सपने को छोड़ देने के लिए मजबूर कर दिए गए.

मकान का मालिक होना एक आर्थिक चक्र का हिस्सा है. महज मकान बनना या मकान उपलब्ध हो जाना ही मकान की सुविघा का पर्याय नहीं है. मकान का स्वामित्व हासिल होना और उसे बरकरार रख पाना एक आर्थिक चक्र का हिस्सा होता है. विकास की जो दिशा है, उसमें इस विचार की गहन पड़ताल करने की जरुरत है कि क्या वास्तव में सबको घर मुहैया कराने का नारा नीतियों के साथ जुड़ा दिखता है ?

शहरीकृत विकास में घर की सुविधा का एक दूसरा रास्ता किरायेदारी का है. देश के ग्रामीण इलाकों में किराये के मकानों में रहने वाले परिवारों का हिस्सा महज 5 प्रतिशत है. शहरीकृत विकास में गुजरात को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक मॉल के रुप में पेश किया है. वहां मकानों के मालिक के बजाय किरायेदारों की संख्या देश में जहां सबसे ज्यादा हैं, उनमें वह एक हैं. गुजरात के अलावा महाराष्ट्र और विकास का नया मॉल बनने को आतुर आंध्रप्रदेश के शहरी इलाकों में किरायेदारी सबसे ज्यादा है.

देश में शहरी क्षेत्रों में कुल 31 प्रतिशत हिस्सा किरायेदारी का है. आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि अपेक्षाकृत बड़े शहरों में किराये के मकानों का हिस्सा सबसे ज्यादा होता है. यह कुल मकानों का चालीस प्रतिशत हिस्सा होता है. इससे शहरों के विकास की जो नीतियां चल रही है और उसके बीच में जो सबके के लिए घर मुहैया कराने का जो नारा सुनने को मिलता रहा है, उसके बीच भारी अंतर को समझा जा सकता है. किसी भी समस्या के एक हिस्से को यदि एक राजनीतिक नारा बनाया जा रहा है तो समस्या से ग्रस्त लोगों को चाहिए कि वह उस नारे की हकीकत को पूरी आर्थिक नीति से जोड़कर देखें. टुकड़ों में जिस तरह से समस्याओं को देखने का नजरिया विकसित किया गया है, उससे राजनीति को टुकड़ों में ही खेलने का अवसर मिलता है. रोटी कपड़ा और मकान का नारा भारतीय राजनीति में नई आर्थिक नीतियों के साथ और जटिल हो गया है.

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