अदालत में न्याय के नाम पर

अदालत को परिवार बचाने की कोशिश करने के बजाए जीर्ण-शीर्ण न्याय व्यवस्था को ठीक करना चाहिए.उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं के साथ ठीक नहीं किया. एक कानून का दुरुपयोग रोकने की कोशिश में इसने उसे ऐसा बना दिया कि संकट में फंसी महिला भी इसका इस्तेमाल करने से पहले कई बार सोचेगी. 27 जुलाई को सर्वोच्च अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के प्रावधानों को और कमजोर कर दिया. इसे 1983 में जोड़ा गया था. क्योंकि दहेज निषेध कानून, 1961 को इतना मजबूत नहीं माना जा रहा था कि इसके सहारे दहेज प्रताड़ना के मामलों से निपटा जा सके. दुर्भाग्य से उच्चतम न्यायालय ने सेव इंडियन फैमिली जैसे समूहों के कानून के दुरुपयोग के तर्क को मान लिया. ये संस्थाएं हर उन मामलों को दुरुपयोग बताती हैं जिसमें महिला आरोपों को सिद्ध करने में नाकाम रहती है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2012 के आंकड़े के मुताबिक इस कानून के तहत सजा पाने वालों का प्रतिशत 14.4 फीसदी है. दूसरे कानूनों के तहत भी तकरीबन यही स्थिति है. लेकिन अदालत ने इसके आधार पर मान लिया कि इस प्रावधान का दुरुपयोग हो रहा है. अब सिविल सोसाइटी की एक समिति पहले मामले को देखेगी. इसमें कानूनी जानकार, सामाजिक कार्यकर्ता, सेवानिवृत्त लोग, कामकाजी अधिकारियों की पत्नी और अन्य नागरिक हो सकते हैं. यह समिति मामले का अध्ययन करके महीने भर के अंदर पुलिस को रिपोर्ट देगी. इसके बाद ही ऐसे मामलों में पुलिस आगे बढ़ेगी.


लेकिन यह व्यवस्था बनाते समय अदालत ने यह नहीं सोचा कि इस बीच शिकायत करने वाली महिला का क्या होगा. वह घर के अंदर हो रही हिंसा से बचने के लिए कहां जाएगी? इसके अतिरिक्त यह कैसे मान लिया जाए कि समिति रिश्वत नहीं ले सकती है या फिर आरोपी का ही पक्ष क्यों नहीं ले सकती है? हालांकि, अदालत ने छह महीने में फिर से मूल्यांकन की बात कही है लेकिन यह आदेश जिन तर्कों के आधार पर दिया गया है, वह गलत है. यह मानना ठीक नहीं है कि महिलाओं की शिकायतें झूठी होती हैं और इनकी सत्यता जांचने के लिए एक और स्तर होना चाहिए.

शादी के पहले साल में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा की सबसे बड़ी वजह दहेज है. इसके खिलाफ कानून होने के बावजूद यह रुका नहीं है. उपभोक्तवादी समाज के विकास के बाद से यह और बढ़ा है. कई ऐसे मामले आते हैं जिसमें कम उम्र की ये महिलाएं दहेज की मांग की वजह से आत्महत्या कर लेती हैं या उनकी हत्या कर दी जाती है. 1983 में धारा 498ए को इससे निपटने के लिए ही लाया गया था. इसमें यह प्रावधान है कि पति या उसका कोई संबंधी अगर महिला को यातना देता है तो उसे तीन साल तक की कैद की सजा हो सकती है और जुर्माना भी लग सकता है.

इसके विवादास्पद होने की एक वजह यह रही है कि इसमें पुलिस को शिकायत करने वाली के परिजनों को गिरफ्तार करने का अधिकार मिल जाता है. कई मामलों में पति, उसके अभिभवकों और भाई-बहनों की गिरफ्तारी हो जाती है. लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इस पर अंकुश लगाने वाला आदेश 2014 में ही जारी किया था. अदालत ने कहा था कि पुलिस के लिए भ्रष्टाचार का बढ़िया मौका यह प्रावधान बन गया है. अदालत ने स्पष्ट किया था कि गिरफ्तारी तब ही होगी जब पुलिस इसके लिए मजिस्ट्रेट को संतुष्ट कर दे. अदालत के आदेश के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से राज्यों के लिए जारी एडवाइजरी में बताया गया कि इस कानून का इस्तेमाल असंतुष्ट पत्नीयां बचाव के लिए नहीं बल्कि हथियार के तौर पर कर रही हैं.

हिंसा की शिकर हो रही महिलाओं को न्याय नहीं मिल पाने में न सिर्फ कानून की कमियां जिम्मेदार हैं बल्कि जीर्ण-शीर्ण न्यायिक तंत्र भी जिम्मेदार है. चाहे वह बलात्कार हो या फिर दहेज, न्याय की आस में आने वाली महिलाओं को निराश ही होना पड़ता है. लचर जांच और सरकारी वकील द्वारा अदालत में अपनाए जाने वाले रुख से अपराध को साबित करना मुश्किल हो जाता है और महिलाएं हार मान लेती हैं. ऐसे में अगर कोई हिम्मत करती भी है तो उसे 498ए के तहत फर्जी केस करने वाली बता दिया जा रहा है. उसे बाध्य किया जा रहा है कि परिवार बचाने के नाम पर वह समझौते करे. ऐसे परिवारों को नहीं बल्कि इनसे महिलाओं को बचाने की जरूरत है. उन्हें उस न्याय व्यवस्था से भी बचाने की जरूरत है जो उनके खिलाफ काम कर रही है.

1966 से प्रकाशित इकॉनामिक एंड पॉलिटिकल वीकली के नये अंक का संपादकीय

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