भारत में जजों की संख्या कम: CJI

नई दिल्ली | समाचार डेस्क: चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने कहा कि हमारे यहां जजों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम है. उन्होंने अमरीका का उदाहरण देते हुये बताया कि वहां के सर्वोच्य न्यायालय के 9 न्यायाधीश मिलकर साल में 81 मामलें निपटाते हैं जबकि हमारे देश में सर्वोच्य न्यायालय का एक न्यायाधीश साल में 2,600 मामलों में फैसला सुनाता है. चीफ जस्टिस ने याद दिलाया कि 1987 में ही विधि आयोग ने देश में न्यायाधीशों की संख्या 40,000 बढ़ाने की अनुशंसा की थी.

उन्होंने न्याय प्रणाली में सुधार के लिये न्यायधीशों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया. देश के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति टी. एस. ठाकुर ने रविवार को सरकार से भावुक अपील की कि सभी को न्याय सुनिश्चित करने के लिए अधिक न्यायाधीशों की व्यवस्था की जानी चाहिए. इस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इस गंभीर विषय पर वह ध्यान देंगे.


न्यायमूर्ति ठाकुर ने मुख्यमंत्रियों, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों व सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि देश की न्यायपालिका आबादी के हिसाब से न्यायाधीशों की कम संख्या की समस्या का सामना कर रही है, और ऊपर से इसके सामने मुकदमों का अंबार लगा हुआ है.

उन्होंने मंच पर बैठे प्रधानमंत्री की ओर देखते हुए कहा कि देश में नागरिकों की संख्या के अनुपात में न्यायाधीशों की संख्या अन्य विकसित देशों की तुलना में निराशाजनक है.

न्यायमूर्ति ठाकुर ने न्यायिक सुधार को लागू करने में सरकार की विफलता पर उसे आड़े हाथों लिया और कहा कि न्यायाधीशों के सेवानिवृत्त होने के बाद उनसे अतिरिक्त वर्षो तक काम करने के लिए कहा जाना चाहिए. उन्होंने व्यावसायिक अदालतों पर निशाना साधा.

न्यायमूर्ति ठाकुर ने अमरीका की मजबूत न्यायिक प्रणाली का जिक्र करते हुए कहा कि अमरीकी सर्वोच्च न्यायालय के नौ न्यायाधीश मिलकर एक साल में 81 मामले निपटाते हैं, जबकि भारत में सर्वोच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश प्रतिवर्ष 2,600 मामलों में फैसला सुनाता है.

उन्होंने कहा, “आलोचना करना काफी नहीं है. आप सारा बोझ न्यायाधीशों पर नहीं डाल सकते. न्यायाधीशों के काम करने की भी एक सीमा होती है”

उन्होंने कहा, “इसका एकमात्र उपाय अधिक अदालतों की स्थापना और प्रत्येक 10 लाख की आबादी पर न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर 50 करना है.”

तय कार्यक्रम के अनुसार, प्रधान न्यायाधीश को सिर्फ 15 मिनट बोलना था, लेकिन भावुक न्यायमूर्ति ठाकुर ने 35 मिनट से अधिक बोला और उन्होंने अपनी पूरी भड़ास निकाली.

प्रधानमंत्री मोदी ने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए सरकारी अधिकारियों और न्यायपालिका के लोगों को मिलाकर एक समिति गठित करने की पेशकश की. उन्होंने कहा, “मैं प्रधान न्यायाधीश द्वारा उठाई गई गंभीर समस्याओं को दूर करने की कोशिश करूंगा.”

न्यायमूर्ति ठाकुर ने कहा कि भारत एक मजबूत न्यायपालिका के बगैर आर्थिक विकास हासिल नहीं कर सकता. विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए भी यह आवश्यक है.

उन्होंने कहा, “जिन्हें निवेश के लिए आमंत्रित किया जा रहा है, वे न्यायिक प्रणाली और न्याय निष्पादन को लेकर भी चिंतित हैं. न्यायिक प्रणाली की मजबूती देश के विकास से महत्वपूर्ण रूप से जुड़ी हुई है.”

उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम द्वारा संस्तुति किए जाने के बावजूद नियुक्तियां लंबित पड़ी हुई हैं, लेकिन सरकार इस दिशा में आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रही है.

न्यायमूर्ति ठाकुर ने कहा कि न्याय निष्पादन प्रणाली गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली 30 प्रतिशत आबादी के लिए दूर की कौड़ी बनी हुई है. उन्होंने कहा, “निचली अदालतों की अवसंरचना में सुधार करने और नियुक्तियों को भरने की जरूरत है.”

उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालयों में 38 लाख से अधिक मामले लंबित हैं. उन्होंने सवाल किया, “आखिर इसका आगे का रास्ता क्या है?”

न्यायमूर्ति ठाकुर ने कहा, “हमें लंबित मामले निपटाने के लिए यथासंभव प्रयास करने चाहिए. जेल भरे पड़े हैं.”

जबकि देश की अदालतें प्रति वर्ष दो करोड़ से अधिक मामले निपटाती हैं.

वर्ष 1987 में सरकार के विधि आयोग ने कहा था कि भारत की न्याय प्रणाली को विभिन्न स्तरों पर 40,000 न्यायाधीशों की आवश्यकता है. उसके बाद से आज देश की आबादी 30 करोड़ बढ़ गई है.

न्यायमूर्ति ठाकुर ने कहा कि वर्ष 2013 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश अल्तमस कबीर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहा था कि न्यायिक प्रणाली की समस्याएं दूर करने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है. इस पर मनमोहन सिंह ने कहा था कि यह राज्य सरकारों से संबंधित है और राज्यों के पास पैसे नहीं हैं.

प्रधान न्यायाधीश ने व्यावसायिक अदालतों के मुद्दे पर सरकार की खिल्ली उड़ाई. उन्होंने कहा कि इन अदालतों का अस्तित्व मौजूदा न्यायिक अवसंरचना और न्यायाधीशों की संख्या पर संभव नहीं है.

उन्होंने कहा कि दुबई में व्यावसायिक अदालतों के लिए पवित्र व उचित वातावरण है. लेकिन भारत में ये अदालतें जिस तरह काम कर रही हैं, उनसे वह मकसद हल नहीं होने वाला है, जिसके लिए उन्हें स्थापित किया गया है.

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि इस समस्या से उबरने का एक मात्र रास्ता है कि लंबित मामलों को निपटाने के लिए प्रशिक्षित न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाए. इस अवस्था में किसी न्यायाधीश को सेवानिवृत्ति बाद घर जाने के लिए कहना अपराध है.

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