47 प्रतिशत सांसद 55 पार

नई दिल्ली | समाचार डेस्क: सोलहवीं लोकसभा में 47% सांसद 55 पार के हैं. पिछली बार यह आंकड़ा 43% था. ऐसे माननीय सांसदों की संख्या बी इस बार संसद में बढ गई है, जो केवल दसवीं पास हैं. नरेंद्र मोदी ने जिन युवाओं को वोट के लिये आह्वान किया था, उन्होंने उनकी बात तो मान ली लेकिन उन्होंने चुना बुढ़े सांसदों को ही. नौजवानों की संख्या इस लोकसभा में ऐसी नहीं है, जिसकी मिसाल दी जा सके.

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की जो रिपोर्ट बीबीसी ने पेश की है, उसके अनुसार इस बार भारत के संसदीय इतिहास में सबसे अधिक महिलाएं सांसद होंगी. लेकिन दूसरी तरफ़ इस सदन में वैसे सांसदों की तादाद बढ़ी है, जो दसवीं पास भी नहीं हैं.

ग्रेजुएट प्रतिनिधियों की संख्या भी पहले के मुक़ाबले इस बार कम हुई है और युवा वोटरों की बड़ी तादाद का बार-बार हवाला दिए जाने के बाजवूद उम्र के लिहाज़ से सोलहवीं लोकसभा पहले से अधिक बुज़ुर्ग होगी. पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने सभी 543 लोकसभा सीटों की प्रोफ़ाइल का अध्ययन करके एक लिस्ट जारी है कि भारत की नई संसद कैसी दिखाई देगी.

इस अध्ययन के अनुसार इस बार के चुनाव में कुल ऐसी 61 सीटें हैं, जहां से महिलाएं जीती हैं.अगर प्रतिशत के लिहाज़ से देखें, तो महिलाओं की संख्या लगभग 11.3 फ़ीसद है.

हालांकि 15वीं लोकसभा के मुक़ाबले देखें, तो महिला सांसदों की संख्या में महज़ तीन सीटों की बढ़ोतरी हुई है. पिछली लोकसभा में 58 महिला सांसद थीं. 1952 में होने वाले पहले लोकसभा चुनावों में महिलाओं की संख्या पांच फ़ीसदी थी. जो 1984 के आठवें लोकसभा चुनावों में लगातार जारी उतार-चढ़ाव के बाद आठ प्रतिशत रह गई.

2009 की 15वीं लोकसभा में यह संख्या बढ़कर 11 फ़ीसदी तक पहुंची. 16वीं लोकसभा चुनावों में महिला सांसदों की संख्या 11.3 फ़ीसद है.

देश में युवा वोटरों की बड़ी तादाद होने की बात बार-बार कही गई, लेकिन इसके बावजूद इस बार वैसे सांसदों की संख्या अधिक है, जिनकी उम्र 55 साल के पार है. सोलहवीं लोकसभा में 543 सांसदों में से 253 सांसद ऐसे हैं, जिनकी उम्र 55 साल से ज़्यादा है. प्रतिशत के हिसाब से यह क़रीब 47 फ़ीसदी के आसपास है. 15वीं लोकसभा में 55 साल से अधिक उम्र के सांसदों की संख्या 43 प्रतिशत थी.

सोलहवीं लोकसभा में आए मात्र 71 सांसदों की उम्र 40 से कम है यानी क़रीब 13 प्रतिशत है. इस बार चुनावी फ़तह हासिल करने वालों में महज़ 75 फ़ीसदी सांसद ही ऐसे हैं, जिनके पास स्नातक की डिग्री है. पिछले सदन में यह फ़ीसद 79 था.

वैसे सांसद, जिन्होंने दसवीं भी पास नहीं की है, उनका प्रतिशत पिछली बार के तीन फ़ीसदी के मुक़ाबले बढ़कर 13 फ़ीसदी तक पहुंच गया है. वहीं जनता के वैसे प्रतिनिधि जो मैट्रिक पास हैं, उनकी संख्या 17 फ़ीसद से घटकर 10 प्रतिशत आ गई है.

हालांकि डॉक्टरेट की उपाधि रखने वाले सांसदों की संख्या पहले से तीन प्रतिशत बढ़ी है. पिछली लोकसभा से तुलनात्मक अध्ययन करने पर यह बात भी सामने आती है कि इस बार वैसे सांसदों का फ़ीसद पहले के मुक़ाबले (15) अधिक (20) है जिन्होंने कारोबार को अपनी रोज़ी-रोटी का ज़रिया बताया है.

खेती को अपना प्राथमिक व्यवसाय बताने वालों की फ़ीसद पिछली बार (27) जितना ही है.पंद्रहवीं लोकसभा में 28 फ़ीसदी सांसदों ने राजनीति और सोशल वर्क को अपना व्यवसाय बताया था. इस बार यह 24 प्रतिशत है.

पहली लोकसभा में 36 फ़ीसदी संसद सदस्यों का पेशा वकालत था, इसके बाद 22 प्रतिशत सांसदों का प्राथमिक व्यवसाय कृषि था और केवल 12 फ़ीसदी सांसद कारोबार से जुड़े थे.

यह काबिल-ए-ग़ौर है कि 16वीं में एक फ़ीसदी सांसद पत्रकारिता और लेखन से जुड़े हैं, जबकि तीन फ़ीसदी सांसद अध्यापक और शिक्षाविद हैं. तो वहीं चार फ़ीसदी सांसद मेडिकल क्षेत्र से जुड़े हैं. 16वीं लोकसभा में वकालत के पेशे से जुड़े सांसदों की संख्या सात प्रतिशत है. सिविल, पुलिस और सैन्य सेवा से जुड़े सांसदों की संख्या दो फ़ीसदी के आसपास है.

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