‘तड़पता भारत’ बनाम ‘डिजीटल इंडिया’

संजय पराते
संघ-भाजपा की जादुई झोली में ‘करतबों’ की भरमार है. इससे आम जनता को अगले पांच सालों तक बहलाया-भरमाया जा सकता है और फिर से चुनाव जीता जा सकता है- ‘राष्ट्रहित’, ‘देशसेवा’ और ‘विकास’ जैसे जुमलों की जुगाली करते हुए. आम जनता ने जनादेश तो पांच साल के लिए दिया है, लेकिन अभी से वे कह रहे हैं- विकास चाहिए, तो 15 साल और दो. ठीकरा भी उसी के सिर है कि उसने कांग्रेस को 60 साल क्यों दिये. ‘साठ साल बनाम पांच साल’ का नारा अब ‘साठ साल बनाम पन्द्रह साल’ में बदलता जा रहा है. बाद में इसका विस्तार 25 साल तक भी किया जा सकता है. वर्ष 2030 तक वे भारत को ‘इंडिया’ में बदलने का दम-खम दिखा रहे हैं. ‘मेक इन इंडिया’ के बाद अब ‘डिजीटल इंडिया’ है- दोनों ‘कार्पोरेट इंडिया’ का अभूतपूर्व विस्तार है. बीच में कहीं से महात्मा गांधी मजबूरी बनकर ‘स्वच्छ भारत’ के रुप में टपक पड़े थे- जो अब पूरे परिदृश्य से गायब है. देशज भारत की जगह अब उनकी प्राथमिकता ‘कार्पोरेट इंडिया’ है. ये ‘कार्पोरेट इंडिया’ 25-30 करोड़ लोगों का मार्केट है जिस पर देशी-विदेशी लुटेरे ‘गिद्धों’ की नजर टिकी हुई है. इस पर दांव लगाया जा सकता है, मुनाफा पीटा जा सकता है. कुछ और नये लोगों/घरानों की ‘फोब्र्स’ की सूची में उभरने की संभावना बनती है. ‘फोब्र्स’ की सूची में आने का मतलब है ताकतवर होना- आर्थिक रुप से भी, राजनैतिक रुप से भी. यह ताकत पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाने का ‘सुखद’ अहसास देती है और यह अहसास- ‘वास्तविक’ है, आभासी नहीं.

संघ-भाजपा-मोदी और उनके सिपहसालार इसी ‘कार्पोरेटी’ पथ के राही हैं. वे अथक मेहनत कर रहे हैं- ‘भारत’ को ‘इंडिया’ बनाने के लिए. वे उस ‘इंडिया’ को गढ़ना चाहते हैं, जिसकी कोशिश हिटलर ने जर्मनी में की थी या नेतन्याहु इसराइल में कर रहे हैं. हिटलर और नेतन्याहु के अनुसरण में एक ऐसा ‘इंडिया’ – जो अपने देश के लोगों के मौलिक अधिकारों को तो कुचले ही, दूसरे कमजोर देशों की आजादी और संप्रभुता को भी न बख्शे और अमरीकी साम्राज्यवाद के आगे शरणागत रहे. यह ‘शरणागतता’ ही उनका जीवनाधार है. ‘डिजीटल इंडिया’ का यही असली चेहरा भी है.


‘गरीबी हटाओ’ का नारा इंदिरा गांधी ने दिया था. सब जानते हैं कि यह नारा उनके लिए सत्ता पाने की कुंजी तो बनी, लेकिन इस विशाल भारत के लिए कभी हकीकत नहीं बन पाया- बनना भी नहीं था. चार दशकों के बाद न केवल देश के अंदर गरीबी और गरीबों की संख्या बढ़ी है, अमीर और ज्यादा अमीर हुए हैं, बल्कि वैश्विक सूचकांक पर भी भारत की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में गिरावट आई है, भारत और कमजोर हुआ है. राजीव गांधी ने भी ‘इक्कीसवीं सदी’ का नारा दिया था. पूरी दुनिया को इक्कीसवी सदी में जाने से कौन रोक सकता था? भारत भी पहुंचा- लेकिन ‘कम्प्यूटरी ढोल’ पर इस देश के दो-तिहाई युवा बेरोजगारों की फौज के साथ. बेचारे राहुल की तो अभी आंख ही खुली है और संगठन के नट-बोल्ट कसने में ही उनके कस-बल ढीले पड़ रहे हैं. सत्ता में रहने के लिए कोई नारा न उन्हें तब सूझा और न अब सूझ रहा है, जब वे विपक्ष में हैं. सार यही है कि कांग्रेस हो या भाजपा, उनके वादे कभी ‘हकीकत के दावे’ नहीं बन पाये, क्योंकि जिन नीतियों पर इन दोनों पार्टियों की सहमति है, वे नीतियां उनके वादों को कभी हकीकत में बदलने नहीं देगी. हकीकत यही है कि इस देश की जनता तबाही और बर्बादी की ओर ही बढ़ रही है. जीडीपी में वृद्धि के नाम पर जिस विकास का दावा किया जाता रहा है, वास्तव में विकास का एक ऐसा दुष्चक्र है, जो लोगों को न रोजगार देता है, न गरीबी दूर करता है और न ही उनके पेट भरने की व्यवस्था. यह ऐसा विकास है, जो आम जनता तक पहुंच रही बची-खुची राहत को भी छीनकर बड़े लोगों की तिजोरी भरने का काम करता है. इस ‘विकास’ के लिए सब्सिडी ‘बोझ’ है और कर-छूट ‘प्रोत्साहन’. वे विकास पर सब्सिडी का बोझ नहीं लादना चाहते बल्कि ‘प्रोत्साहन’ देना चाहते हैं. फेंकू और पप्पू दोनों का अर्थशास्त्र यही कहता है.

इससे किसे इंकार हो सकता है कि भारत तकनीक के उपयोग में सक्षम हो? कौन इंकार करेगा की लोगों के घंटों में होने वाले काम मिनटों में हो- और वह भी बिना लाइन लगाये? बच्चों पर बस्तों का बोझ कम करने से कोई मना करेगा क्या? कौन नहीं चाहेगा कि उसके दस्तावेज किसी ऐसे ‘लॉकर’ में सुरक्षित रहें, जहां से वह एक ‘क्लिक’ पर उसे हासिल भी कर सके. लेकिन इसके लिए क्या भारत को ‘इंडिया’ बनाने की जरूरत है, जहां 4.5 लाख करोड़ का प्रारंभिक निवेश जरूरी हो और 25 लाख रुपयों के निवेश की कीमत पर एक रोजगार पैदा हो. सब जानते हैं कि इस देश के बेरोजगारों को अपने स्वरोजगार के लिए बैंकों से एक लाख रुपये का ऋण हासिल करने के लिए भी कितना खून पसीना बहाना पड़ता है? और इसके बाद भी एक बड़ी रकम अफसरों के ‘पूजा-पाठ’ में ही चढ़ जाती है. इस ‘इंडिया’ के पास ‘भारत’ की इस समस्या का क्या कोई समाधान है?

इस देश में 62 करोड़ लोग खुले में शौच करते हैं. यह सवाल पूछना जायज है कि ‘डिजीटल इंडिया’ ऐसे लोगों के लिए क्या ‘डिजीटल टायलेट’ लाने जा रहा है? क्या ‘डिजीटल इंडिया’ डिजीटल सेक्सुअल इक्विलिटी भी लाने जा रही है, वल्र्ड इकाॅनामिक फोरम की रिपोर्ट जिसके बारे में भारत को 114 वें स्थान पर रखती है? भारत में 36 करोड़ लोग निरक्षर हैं और 10 प्रतिशत परिवारों में एक भी साक्षर नहीं हैं. आरटीई अधिनियम का भी देश के केवल 8 प्रतिशत स्कूलों में पालन हो रहा है. क्या संघ-भाजपा का ‘डिजीटल इंडिया’ ऐसे अभागों और हत्भागों के लिए ‘डिजीटल लिटरेसी’ भी लाने जा रही है? ‘ऐसोचैम’ की रिपोर्ट यह बताती है कि महंगाई के कारण आम आदमी अपनी रसोई के बजट में 40 प्रतिशत कटौती करने को मजबूर हुआ है. भुखमरी की यह हालत है कि 50-60 प्रतिशत किसान आबादी भूखे सोने को मजबूर है. महंगाई और कृषि संकट मिलकर अर्थव्यवस्था ही हालत बिगाड़ रही है. इस ‘डिजीटल इंडिया’ के पास इन भूखे लोगों को राहत देने के लिए कोई ‘डिजीटल ब्रेड’ है? हमारा देशज भारत तो उद्योगों से निकली उस राख का भी उपयोग करने भी सक्षम नहीं है जो हमारे आदिवासी जनजीवन, कृषि व पर्यावरण को बर्बाद कर रहा है. क्या ‘डिजीटल इंडिया’ के पास इसका कोई ‘डिजीटल साॅल्यूशन’ है? यह ‘डिजीटल इंडिया’ भारत के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ ही सहस्त्राब्दी विकास रिपोर्ट को क्या बदलने का माद्दा रखती है, जिसका दावा है कि दुनिया के समस्त निर्धनतम लोगों का 35 प्रतिशत भारत में ही निवास करता है और यहीं सर्वाधिक बाल मृत्यु दर भी है. क्या इस ‘डिजीटल इंडिया’ में दवाओं की ऑनलाइन खरीदी तो सहज-सुलभ हो जाएगी, लेकिन क्या भारत में हो रहे 10 अरब डॉलर के नकली दवा व्यापार पर रोक लग पाएगी, जिसके शिकार इस भारत के 35 प्रतिशत लोग हैं? यह भी साफ करने की जरूरत है कि इस ‘डिजीटल इंडिया’ में भारत में रहने वाले उन 36 करोड़ से ज्यादा लोगों की क्या स्थिति होगी, जो महीने में 1000 रुपये भी खर्च करने की औकात नहीं रखते, 175 रुपये में एक जीबी डाटा खरीदना तो दूर की बात है. क्या यह ‘डिजीटल इंडिया’ उस सामंती भारत के साथ ही सफर करेगा जहां 27 प्रतिशत लोग आज भी छुआछूत मानते हैं, और जो नहीं मानने का दावा करते हैं, उनमें से भी अधिकांश दलित-आदिवासियों को अपनी रसोई में प्रवेश देने के लिए तैयार नहीं हैं.

यह वह भारत है, जो मानव विकास सूचकांक की गिनती में दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले बहुत पीछे खड़ा है. इस सूचकांक को निर्धारित करने वाले बहुत से कारकों पर तो पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका आगे है, जिन्हें हम ‘जाहिल’ समझते हैं. इस भारत को ‘आधुनिक भारत’ बनाने की, ‘ज्ञान-विज्ञान से समृद्ध भारत’ बनाने की, मानव विकास सूचकांक में श्रेष्ठतर बनाने की चुनौती तो समझ में आती है, लेकिन ‘डिजीटल इंडिया’ बनाने की चुनौती ??!!

तो इस सरकार की प्राथमिकता के बारे में, उसके अर्थशास्त्र और अर्थव्यवस्था के बारे में जरूर बात की जानी चाहिए. कृषि इस देश का सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता क्षेत्र है, जहां आज भी इस देश की 50 प्रतिशत श्रम शक्ति लगी हुई है- भले ही रोते-धोते लगी हो. लेकिन कुल निवेश का 4 प्रतिशत से ज्यादा इस क्षेत्र में नहीं हो रहा है. आम बजट का एक से डेढ़ प्रतिशत ही कृषि क्षेत्र को आबंटित हो रहा है. ग्रामीण विकास की तमाम योजनायें भयंकर कटौती के दौर से गुजर रही हैं. समूचा ग्रामीण भारत बड़े उद्योगों के लिए विस्थापन की पीड़ा झेल रहा है, जबकि इस क्षेत्र में 80 प्रतिशत निवेश के बावजूद केवल 6 प्रतिशत रोजगार ही पैदा हो रहा है. विनिर्माण के क्षेत्र में रोजगार की दर में 7-8 प्रतिशत वार्षिक की दर से गिरावट आ रही है- और समूचा विकास ‘रोजगारहीन विकास’ बनकर रह गया है. ऐसे विकास से तो जीडीपी बढ़ती है, उद्योग-धंधे लाभ कमाते हैं, सेंसेक्स में भी खूब उछाल आता है, लेकिन रोजगार में गिरावट ही आती है. 1980 में विनिर्माण क्षेत्र में शुद्ध मूल्य संवर्धन में वेतन का हिस्सा 30 प्रतिशत था और मुनाफे का 20 प्रतिशत. नई तकनीक ने लागत को खूब घटाया, लेकिन इसका फायदा मजदूरों को नहीं मिला. 2010 में मूल्य संवर्धन में उनका हिस्सा घटकर 10 प्रतिशत से भी कम रह गया, पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया. नई तकनीक ने बेरोजगारी भी बढ़ाई, मजदूरी भी छीनी.

‘डिजीटल इंडिया’ कार्पोरेटों के लिए इसी मुनाफे के विस्तार का दूसरा नाम है. इस ‘इंडिया’ के लिए ‘भारत’ की प्राथमिकताओं का सवाल गौण है. उनके लिए कृषि का विकास, गरीबी उन्मूलन, आधारभूत संरचनाओं का विस्तार, स्वच्छता कार्यक्रम जैसे मुद्दे कोई अहमियत नहीं रखते, क्योंकि अब इससे मुनाफा नहीं पीटा जा सकता. मुनाफा तो अब एफडीआई से पैदा होता है, सो 4 करोड़ छोटे कारोबारियों की कीमत पर विदेशी निवेश को न्यौता जा रहा है. मुनाफा तो सेंसेक्स का उछाल देता है, सो लाखों निवेशकों को बर्बाद करने की कीमत पर सट्टा बाजारी की जाती है. मुनाफा तो प्राकृतिक संसाधनों की लूट से पैदा होता है, सो जल-जंगल-जमीन-खनिज पर कब्जा करने के लिए लोगों को उनकी सहमति के बिना, अध्यादेशों के बल पर, विस्थापित करने की प्रक्रिया जारी है. मुनाफा तो ई-कामर्स से पैदा होता है, जो आज 13 अरब डाॅलर का है. ऐसा व्यापार करने वाली कंपनियों की भारत के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है और ये कंपनियां हर साल 50 हजार करोड़ रुपयों का सालाना टैक्स चोरी कर रही हैं. गैर कानूनी कारोबार से पैदा सारी आमदनी ये विदेशों में ले जाने को स्वतंत्र हैं.

इसीलिए ‘डिजीटल इंडिया’ का ‘कम्प्यूटर साक्षरता’ से कोई संबंध नहीं हैं, जिसका भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है. इस ‘डिजीटल इंडिया’ की चुनौतियों के बारे में ‘कार्पोरेट मीडिया’ ने काफी कुछ लिखा है, लेकिन अमेरिकी कंपनियों की नजर इस देश के 20 करोड़ ‘इंटरनेट यूजर्स’ पर है, जिन्हें वह उपभोक्ताओं के रुप में देख रही है और ई-कामर्स के जरिये जिसकी क्रय क्षमता पर वह कब्जा जमाना चाहती है. जो टाटा-बिड़ला-अंबानी कार्पोरेट सोशल रिस्पाॅन्सिबिलिटी (सीएसआर) के मद पर खर्च किये जाने वाले पैसे को धन का अपव्यय बताती है, जिसके पास भारत की स्वच्छता कार्यक्रम के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं है, यदि ये बड़े खिलाड़ी ’डिजीटल इंडिया’ में लाखों करोड़ रुपयों का निवेश कर रहे हैं, तो देश सेवा व विकास के लिए नहीं, मुनाफा कमाने के लिए ही कर रहे हैं. देशज भारत की चुनौती यह है कि इस ‘डिजीटल इंडिया’ को मात दे.

जो लोग आर्यभट्ट की उपलब्धियों को नहीं, बल्कि मनुष्य के धड़ पर हाथी का सिर फिट करने के मिथक को सबसे बड़ा विज्ञान मानते हैं, वो लोग ही ‘सामंती भारत’ पर ‘डिजीटल इंडिया’ को रोपना चाहते हैं. वास्तव में वे भारत को एक ऐसा ‘आधुनिक भारत’ नहीं बनाना चाहते- जो ज्ञान-विज्ञान के नये विचारों से लैस हो. एक ऐसा यांत्रिक देश बनाना ही उनकी नीयत है- जो मुनाफे के लिए तकनीक तो काम में लाए, लेकिन व्यवहार में घोर कूपमंडूक, अंधविश्वासी, अल्पसंख्यक द्वेषी हो. जो तकनीक का उपयोग दंगा-फसाद करवाने में और ‘हिन्दू राष्ट्र’ की स्थापना में लगाये. एक ओर तड़पता-तरसता भारत है, जो ’आधुनिक भारत’ बनने की चाह में संघर्षरत है. वे इस भारत को कुचलकर उस ‘डिजीटल इंडिया’ का प्रयास कर रहे हैं, जो मुनाफा ही मुनाफा पैदा करे.

लेकिन सभी जानते हैं कि ‘शाइनिंग इंडिया’ किस गति को प्राप्त हुआ था. क्या ‘डिजीटल इंडिया’ का भी यही हश्र होगा? उत्तर साफ है, ग्रीस की जनता के उत्तर की तरह- आम जनता पर धन कुबेरों की ब्लैकमेलिंग शाश्वत नहीं हो सकती. संघ-भाजपा भले ही कार्पोरेटों के आगे घुटने टेक दे, जनता घुटने टेकने वाली नहीं हैं. नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ उसका संघर्ष जारी रहेगा- यह संघर्ष ‘मेक इन इंडिया’ के खिलाफ भी है और ‘डिजीटल इंडिया’ के खिलाफ भी.

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