गवाह हाजिर हो…!

कनक तिवारी
प्रदेश के एक प्रमुख अखबार में यह खबर प्रमुखता से छपी है ‘पंकज संचोरा हाजिर हो….’ यह आवाज मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर की किसी न किसी कोर्ट में अक्सर सुनने को मिल जाती है. वजह है पंकज का शहर के पांच थानों के करीब 300 केसों में गवाह होना.

खास बात यह है कि पंकज जुए-सट्टे से लेकर हत्या तक के मुकदमों में गवाह है. पुलिस पिछले 24 सालों से उसे गवाह बना रही है. उज्जैन के इंदिरानगर में रहने वाला पंकज (44) रोजाना थानों में अखबार बांटने जाता है. कोतवाली पुलिस ने 1990 से उसका नाम गवाह के तौर पर लिखना शुरू किया.


संचोरा ने बताया कि जांच अधिकारी गवाही में नाम लिखकर खुद ही उसके हस्ताक्षर कर देते हैं. वह शाजापुर व इंदौर जैसे दूसरे शहरों के केसों में भी गवाह है. समन आने पर उसे गवाह होने का पता चलता है. कई बार खुद के ही खर्च से पेशी पर जाना पड़ता है.

उसके खिलाफ कई बार गिरफ्तारी वारंट तक निकल चुके हैं. अपराधी धमकियां भी देते रहते हैं. शिकायत करने पर पुलिस सुनती नहीं है. इस वजह से परिजन नाराज होते हैं.

सांसद चंदूलाल चंद्राकर बताते थे कि राजनांदगांव में भी एक पेशेवर गवाह था. वह किसी भी प्रकरण में सफलतापूर्वक गवाही दे सकता था. उसकी शर्त यही होती थी कि उसे राजनांदगांव के प्रसिद्ध मोती हलवाई की दुकान पर या तो एक सेर (किलो) वजन की देसी घी की पूड़ी या एक सेर जलेबी का नाश्ता कराया जाए.

काका हाथरसी ने तो ‘फ्री स्टाइल गवाही‘ नामक एक नाटक ही लिख दिया है. इसका नायक कठिन से कठिन सवालों का इस तरह जवाब देता है कि प्रतिप्रश्न पूछने वाला वकील हताश हो जाता है. वह एक ही प्रकरण में दोनों तरफ से गवाही देने की महारत हासिल किए होता है.

अंगरेज़ी न्याय व्यवस्था में गवाही देना एक अद्भुत कारनामा है. चतुर गवाह गैर सयाने वकीलों और पक्षकारों के ऊपर बिना मुकदमों को जाने भी भारी पड़ता रहता है. कई बार गवाह सिखाने पढ़ाने के बाद झूठी गवाही देता है. इसके बावजूद प्रतिप्रश्न करने वाला वकील उत्साह में उससे कुछ ज़्यादा ही पूछने लगता है. तब वह गवाह सच बोलने लगता है. बेचारा पक्षकार वकील की नादानी के कारण मारा जाता है.

छोटी अदालतों के कई वकील गवाहों को इस कदर डांटते फटकारते हैं कि वे बीमार भी पड़ जाते हैं. पुलिस वाले अमूमन जब्ती के झूठे गवाह बनाते हैं. ऐसे गवाहों को केवल अपने हस्ताक्षर पहचानने होते हैं. गवाही देने का एक तरह से कमाई का जरिया अंगरेजी न्याय व्यवस्था के जरिए फलता फूलता रहा है.

वैसे प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था में भी गवाही का प्रावधान रहा है. शूद्रक के नाटक मृच्छकटिक में तो पहली बार परिस्थितिजन्य साक्ष्य का अचूक अस्त्र इस्तेमाल किया गया था.
* उसने कहा है-19

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