वट वृक्ष बनाम बोधि वृक्ष

कनक तिवारी

प्रदेश के चर्चित, प्रभावशाली तथा अनुभवी राजनेता विद्याचरण शुक्ल के दुखद अवसान के बाद एक मित्र ने सद्भावनावश कहा कि वे छत्तीसगढ़ की राजनीति के वट वृक्ष थे. यद्यपि कांग्रेस को ही स्वाधीनता-मूल्यों का वट वृक्ष कहा जाता है. क्या वंशजों को भी वट वृक्ष कहा जा सकता है?

सबसे पहले गांधी की ओर ध्यान जाता है. गांधी पार्टी के चवन्नी सदस्य नहीं रहते थे, लेकिन अध्यक्ष, संकटमोचक, प्रवक्ता, विद्रोही सभी कुछ होते रहते थे. उनके संरक्षण में कांग्रेसी पनपे, योद्धा बने और सत्ताधीश भी. औसत कांग्रेसी तो पार्टी संविधान को छूता या जानता भी नहीं है. यही हाल बाकी सभी पार्टियों में भी है. कार्यकर्ता के लिए नेता का आदेश ही संविधान है. विधायिकाओं के चुनाव के बाद वे कहने लगते हैं कि जो उच्च कमान का वट वृक्ष कहेगा, वही होगा.

पार्टी के नेता वट वृक्ष के बदले बोधि वृक्ष होते हैं. बरगद घनत्व, प्रसार और फैलाव में बड़ा होता है. पीपल की ऊंचाई उससे ज्यादा होती है. बरगद की छांह में मनुष्यों का बसेरा होता है. वह सावित्रियों में पतिव्रता भाव पैदा करता है और सत्यवानों की रक्षा करता है. पीपल के नीचे बैठकर गौतम को बोधगया में आत्मज्ञान प्राप्त हुआ था. बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु की भयानकताओं से उन्हें मुक्ति मिल गई थी. राजनीतिक दलों के नेताओं के बोधि वृक्ष की छाया तले बैठकर कार्यकर्ता आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक भय से मुक्त हो जाते हैं. बरगद का पेड़ संविधान-ज्ञान, नीति नियम और भविष्य के सपनों का दस्तावेज पढ़कर सुनाता है.

नेताओं के बोधि वृक्ष के नीचे बैठने से ठेके, लायसेंस, परमिट, फ्रेंचाइज वगैरह मिल जाते हैं. नेता नियुक्ति, सिफारिश, डांट, घुड़की के जरिए झोली भर देते हैं. कार्यकर्ता नेता की सेवा कर नेकी दरिया में डालते हैं. मौका पड़े तो बालटी भर निकालना भी चाहते हैं. राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता अचानक साइकिल से मोटर साइकिल, फिर मोटर कार, फिर कारों के काफिले पर चढ़ने लगते हैं. विद्या भैया के आशीर्वाद के कारण छत्तीसगढ़ ही नहीं बाहर भी बीसियों करोड़पति पार्टी कार्यकर्ता उग आए हंै. उनका स्वभाव ऐसा ही उदार था. जो वरिष्ठ नेता पार्टी के वट वृक्ष के नीचे बैठे रहते हैं, वे बोधि वृक्ष नहीं बन पाते.

गांधी ने खुद को बोधि वृक्ष बनाए रखा. भगतसिंह के पक्ष में अपील हो या सुभाष बाबू की पार्टी की अध्यक्षी हो, गांधी पार्टी से अलग हटकर बोधि वृक्ष की तरह तन गए. राम परम्पराओं के वट वृक्ष के तले रहे. इसलिए आज तक राम नाम सत्य है. कृष्ण ने गीता का बोधि वृक्ष उगाकर भी सत्यवादी युधिष्ठिर से झूठ बुलवाकर सत्य की स्थापना की.

पार्टी को वट वृक्ष तो समझा जवाहरलाल ने. राजेन्द्र बाबू को दुबारा राष्ट्रपति बनाने का मामला हो या केरल की सरकार को गिराने का, वे सरदार पटेल और इन्दिरा गांधी के सामने झुक गए. उन्होंने जिला कांग्रेस तक को तरजीह दी. यूगोस्लाविया के प्रेसीडेन्ट टीटो के नागरिक अभिनन्दन में पहला गुलदस्ता प्रधानमंत्री होकर भी मेयर अरुणा आसफ अली से दिलवाया.

श्यामाचरण शुक्ल कांग्रेस को वट वृक्ष ही समझते चले गए. बोधि वृक्ष नहीं बने. यही समझ सरदार पटेल, मौलाना आजाद, कृपलानी, कामराज, वसंतराव उइके, मोरारजी, निजलिंगप्पा, संजीव रेड्डी वगैरह की रही. इन्दिरा गांधी ने बोधि वृक्ष बनकर पार्टी के संविधान को तहस नहस कर वी वी गिरि को राष्ट्रपति बनवाकर पार्टी को अप्रासंगिक कर दिया. अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी के अन्दर बोधि वृक्ष नहीं बन पाए. आडवाणी द्वारा बहुमत का ककहरा पढ़ने पर मोदी को राजधर्म का पालन करने वाली सीख देने के बावजूद खून का घूंट पी लिया. अन्यथा भाजपा को ‘मुख में राम, बगल में मोदी‘ वाली कहावत नहीं रटनी पड़ती. वाजपेयी लेकिन राजग के लिए बोधि वृक्ष बने रहे. उन्होंने संघम् शरणम् गच्छामि नहीं रटा.

भाजपा के नये बोधि वृक्ष नरेन्द्र मोदी हैं. उनके साए तले अभियुक्त अमित शाह, ब्रांड अम्बेसडर अमिताभ बच्चन, अरबपति अम्बानी बंधु और टाटा, कुपोषण, साम्प्रदायिक हिंसा, फौजदारी मुकदमे, फैशन डिजाइनर, उत्तेजक भाषा सब एक साथ फल फूल रहे हैंंंं. उन्हें मुसलमान के वोट तो चाहिए और विवेकानन्द के संन्यास पूर्व नाम नरेन्द्र का उच्चारा भी.

विद्रोही वेदांती ने अपने मित्र सरफराज हुसैन को लिखा था, ‘भारत में वह दिन धर्मोदय का होगा, जब इस्लामी शरीर (सभ्यता) में वेदांती (हिन्दू) मन (संस्कार) होगा.‘ मोदी ऐसा ‘धर्मम् शरणम् गच्छामि‘ नहीं कहते. नये बोधि वृक्ष मोदी के नीचे वट वृक्ष भाजपा को ही बैठना पड़ रहा है. आडवाणी वट वृक्ष की एकता, सहमति और समन्वय के साथ आक्रामक हिन्दुत्व को मिलाकर केन्द्र में सरकार तक बना ले गए थे. बोधगया वाले बिहार के नीतीश कुमार अब तक भाजपा के वट वृक्ष तले थे. अब बोधि वृक्षों का गुलदस्ता बनाने के लिए ममता, जयललिता, नवीन पटनायक, मुलायम सिंह वगैरह को टटोल रहे हैं.

नेहरू और शास्त्री के बाद से वट वृक्ष के बदले बोधि वृक्ष ही हुकूमत करते रहे. वी पी सिंह ने वट वृक्ष की जड़ों में मठा डाला. वही काम गुजराल, जगजीवनराम, मोरारजी, चंद्रशेखर ने कर लिया. मोतीलाल वोरा ने इन्दिरा को पहले बोधि वृक्ष नहीं समझा था. बाद में बुद्धम शरणम गच्छामि कहा. वट वृक्ष के मुकाबले बोधि वृक्ष बनने का साहस छत्तीसगढ़ कांग्रेस में केवल अजीत जोगी में बचा है. यही गुण उनके राजनीतिक वट वृक्ष अर्जुन सिंह में था.

कोलकाता के बोटानिकल गार्डन के वट वृक्ष की दर्जनों फैली शाखाओं की तरह यह पता ही नहीं चलता कि कांग्रेस के किस नेता को मूल विचारधारा का प्रवक्ता माना जाए. राजीव शुक्ल, सत्यव्रत चतुर्वेदी, संजय निरुपम, तक को गुरूर है कि वे बोधि वृक्ष हैं. विद्याचरण शुक्ल जैसे गहरी जड़ों के नेता अपनी वट वृक्ष पार्टी के लिए बोधि वृक्ष और अनुयायियों के लिए वट वृक्ष बने रहने की दोहरी महारत हासिल कर चुके थे. उनके समर्थक अब दो पूर्व मुख्यमंत्रियों की वट वृक्ष शाखाओं पर निर्भर हैं.

सोनिया गांधी मूल वट वृक्ष हैं. उनके तले राहुल गांधी बोधि वृक्ष बनने की थ्योरी को खारिज करते हैं. नरेन्द्र मोदी पार्टी के वट वृक्ष को उखाड़ कर बोधि वृक्ष की अपनी गुजराती ऊंचाई पर आत्म-मुग्ध हैं. लोकतंत्र में अधेड़ उम्र के भाजपाई बोधि वृक्ष और कांग्रेसी वट वृक्ष के संरक्षण वाले सक्रिय युवा नेता के बीच जनता को चुनाव करना है. जनता तो कल्प वृक्ष है.

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