भारत में औद्योगिक गतिरोध

प्रभात पटनायक
हाल ही में 2015-16 के लिए औद्योगिक उत्पादन के जो आंकड़े जारी किए गए हैं. ये आंकड़े दिखाते हैं कि इस वित्त वर्ष के दौरान (इससे पहले के वित्त वर्ष के मुकाबले) औद्योगिक वृद्धि की दर सिर्फ 2.4 फीसद रही थी.

भौतिक उत्पादन में वृद्धि धीमी पड़ी
बहरहाल, औद्योगिक उत्पाद में यह लगभग गतिरोध की स्थिति, महज एक वित्त वर्ष विशेष का मामला नहीं है. वास्तव में पिछले चार वित्त वर्षों में औद्योगिक वृद्धि दर की इसी प्रकार की रही है:
2012-13 1.1′
2013-14 -0.1′
2014-15 2.8′
2015-16 2.4′

यह डंके की चोट पर गतिरोध का मामला है. लेकिन, यह गतिरोध औद्योगिक वृद्धि दर में उस आम सुस्ती के ऊपर से आया है, जो समग्रता में उदारीकरण के दौर की पहचान बनी रही है. उदारीकरण से पहले के दशक में यानी 1980-81 से 1990-91 के बीच देश में औद्योगिक उत्पादन की चक्रवृद्धि दर, 7.83 फीसद रही थी. इसके विपरीत, 1990-91 से 2011-12 के दौरान यानी वर्तमान औद्योगिक गतिरोध के शुरू होने से पहले तक भी, औद्योगिक वृद्धि दर 6.28 फीसद से ज्यादा नहीं थी. दूसरे शब्दों में उदारीकरण के दौर की पहचान, इससे पहले के दशकों की तुलना में, औद्योगिक वृद्धि दर के धीमी पडऩे से होती है.

यहां तक कि अगर हम इससे और पीछे तक जाएं और उदारीकरण से पहले के पूरे दौर की तुलना, उदारीकरण के पूरे के पूरे दौर की स्थिति से करें, तब भी हमें औद्योगिक वृद्धि दर में गिरावट ही दर्ज होती दिखाई देगी. 1950-51 से 1990-91 यानी कथित नियंत्रणात्मक अर्थव्यवस्था के समूचे दौर को लें तब भी हम औद्योगिक वृद्धि दर का औसत 6.32 फीसद ही पाते हैं. इसके विपरीत, 1990-91 से 2011-12 बीच, जैसाकि हम पहले ही देख आए हैं, यह दर 6.28 फीसद से ज्यादा नहीं रही है और अगर इसमें 2011-12 के बाद के वर्षों को भी जोड़ लिया जाए तो, जिन वर्षों में औद्योगिक क्षेत्र में स्पष्ट रूप से गतिरोध छाया रहा है, उदारीकरण के बाद के दौर के लिए औद्योगिक वृद्धि दर का आंकड़ा स्पष्ट रूप से काफी नीचे ही बैठेगा.

इसी प्रकार, उदारीकरण के दौर में कृषि उत्पादन की वृद्धि दर (जिसमें खाद्यन्न उत्पादन में वृद्धि की दर खासतौर पर शामिल है), इससे पहले के दौर के मुकाबले धीमी ही रही है. इसका अर्थ यह हुआ कि उदारीकरण के दौर में, समग्रता में भौतिक (सामग्री) उत्पादन के क्षेत्र में वृद्धि दर, नियंत्रणात्मक व्यवस्था के दौर से नीची रही है. इसका अर्थ हुआ कि उदारीकरण से कथित रूप से सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में जिस तेजी के आने का बहुत ढोल पीटा जाता है, सिर्फ सेवाओं के क्षेत्र तक ही सीमित है.

सेवा उत्पाद की गणना का गड़बड़झाला
लेकिन, सेवाओं के क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद की गणना में शामिल किया जाना तो अपने आप में ही विवाद का विषय रहा है. इसकी वजह यह है सेवाओं के क्षेत्र के तो ‘उत्पाद’ मात्र के साथ, गंभीर अवधारणात्मक तथा सांख्यिकीय समस्याएं जुड़ी हुई हैं. इन समस्याओं का संबंध इससे है कि यह उत्पाद ठीक-ठीक है क्या और क्या जिन आंकड़ों से इस उत्पाद को प्रदर्शित करने की उम्मीद की जाती है क्या वाकई इस उत्पाद को प्रदर्शित भी करते हैं.

एक उदाहरण से इससे संबंधित अवधारणात्मक समस्या स्पष्ट हो जाएगी. हम एक सरल अर्थव्यवस्था का उदारहण ले सकते हैं, जिसमें मान लीजिए कि मकई की 100 इकाइयां ही पैदा होती हैं और उसके अलावा कुछ भी नहीं. इन 100 इकाइयों में से 50 इकाई, भूस्वामी ले लेते हैं. उदाहरण की सरलता के लिए हम मान लेते हैं कि ये भूस्वामी, इन 50 इकाइयों में से अपने उपभोग पर कुछ भी खर्च नहीं करते हैं और इसके बल पर 50 लठैतों की फौज रखते हैं, ताकि किसानों को दबाए रख सकें. अब सेवाओं के क्षेत्र की चालू गणना के अनुसार, इस अर्थव्यवस्था का सकल घरेलू उत्पादन सरकारी गणना में 150 इकाई लगाया जाएगा, जिसमें 100 इकाई मकई के साथ ही, 50 इकाई का ‘सेवा उत्पाद’ भी जोड़ा जाएगा, जो उक्त लठैतों पर होने वाले खर्च के सिवा और कुछ नहीं है.

अब मान लीजिए कि भूस्वामी, 50 इकाइयों की जगह 70 इकाइयां हथिया लेते हैं और हरेक लठैक पर 1 यूनिट के बजाए 1.4 यूनिट का खर्चा करने लग जाते हैं, तो उस अर्थव्यवस्था का सकल घरेलू उत्पाद 150 यूनिट से बढक़र 170 यूनिट पर पहुंच जाएगा! दूसरे शब्दों में इस गणना में न सिर्फ वास्तव में अतिरिक्त उत्पाद पर पलने वालों को एक उत्पाद का ‘‘उत्पादन’’ कर रहा मान लिया जाता है बल्कि वास्तविक उत्पादकों के (इस उदाहरण में मकई का उत्पादन करने वाले किसानों के) शोषण की दर में बढ़ोतरी को, सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोतरी के रूप में प्रदर्शित किया जाता है.

सेवाओं के क्षेत्र के उत्पाद की अवधारणा से ही अपरिहार्य रूप से जुड़े इस बेतुकेपन की ही वजह से, सोवियत संघ तथा अन्य समाजवादी देशों में राष्ट्रीय आय अनुमानों में कभी भी सेवाओं के क्षेत्र को शामिल नहीं किया जाता था. इन देशों में सकल घरेलू उत्पाद की गणना में सिर्फ भौतिक उत्पादन के क्षेत्र को हिसाब में लिया जाता था. इस पैमाने से देखा जाए तो हमारे देश में उदारीकरण के बाद के दौर में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर, नियंत्रणात्मक अर्थव्यवस्था के दौर के मुकाबले ऊंची के बजाए, नीची ही बैठेगी.

बहरहाल, असली मुद्दा सिर्फ यही नहीं है कि उदारीकरण के बाद के दौर में, सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर, इससे पहले वाले दौर के मुकाबले तेज हुई है या धीमी पड़ी है. हम अब ऐसे दौर में पहुंच गए हैं जहां औद्योगिक क्षेत्र, उदारीकरण से पहले के दौर के मुकाबले धीमी दर से तो बढ़ ही रहा था, अब तो उसमें बढ़ोतरी भी करीब-करीब रुक गयी है और वृद्धि पूरी तरह से ठप्प ही हो गयी है.

औद्योगिक गतिरोध के पहले से भिन्न कारण
बेशक, भारत में औद्योगिक क्षेत्र में गतिरोध कोई पहली बार नहीं आया है. फिर भी, मौजूदा औद्योगिक गतिरोध, इससे पहले नियंत्रणात्मक अर्थव्यवस्था के दौर में आते रहे गतिरोध से भिन्न है. मिसाल के तौर पर साठ के दशक के मध्य में भी औद्योगिक गतिरोध का दौर आया था. लेकिन, उस औद्योगिक गतिरोध के पीछे तात्कालिक कारण तो 1965-66 तथा 1966-67 में खाद्यान्न उत्पादन में आयी भारी गिरावट का ही था, जिससे बिहार में तो अकाल के जैसे हालात ही पैदा हो गए थे.

दूसरे शब्दों में, नियंत्रणकारी अर्थव्यवस्था के तहत, औद्योगिक उत्पादन में उतार-चढ़ाव घनिष्ठ रूप से कृषि उत्पादन में उतार-चढ़ाव से जुड़ा रहा था. फसल खराब होने का मतलब होता था, खेती की पैदावार करने वालों की आय का घटना और दूसरी ओर उपभोक्ताओं को खाद्यान्न महंगा मिलना (इस मामले में छठे दशक से कुछ राहत जरूर मिलने लगी थी, जब सार्वजनिक खरीदी तथा सार्वजनिक वितरण में आ रही तेजी के बल पर, उपभोक्ताओं को कृषि उत्पाद जिन दामों पर पड़ते थे, उन पर फसल खराब होने का दुष्प्रभाव कुछ कम हो गया था). इसका नतीजा यह होता था कि कृषि उत्पादक तथा उसके मालों के उपभोक्ता, दोनों के हाथों में औद्योगिक मालों की खरीद के लिए क्रय शक्ति घट जाती थी. ऐसा मजदूरों तथा अन्य वेतनभोगियों के मामले में खासतौर पर सच था. इसके अलावा, जब फसल खराब होने के चलते खाद्यान्नों के दाम बढ़ते थे, मुद्रास्फीति पर काबू रखने के लिए सरकार अपने खर्चों में कटौती करती थी और इसका भी औद्योगिक मांग पर संकुचनकारी असर पड़ता था. इस तरह, उस जमाने में औद्योगिक मांग तथा औद्योगिक उत्पाद, कृषि क्षेत्र की स्थिति के साथ घनिष्ठï रूप से जुड़ें रहते थे.

लेकिन, अब ऐसा नहीं रह गया है. मौजूदा औद्योगिक गतिरोध के संबंध में यह उल्लेखनीय है कि यह गतिरोध इसके बावजूद आया है कि खाद्यान्न उत्पादन समेत कृषि उत्पाद में, कोई तीखी गिरावट देखने को नहीं मिली है. उल्टे 2011-12 तथा 2013-14, दोनों खेती के लिए अच्छे साल रहे थे और हालांकि 2013-14 में उत्पाद अपेक्षाकृत कम रहा था, यह कमी किसी भी तरह से खाद्यान्न उत्पादन में उस गिरावट के आस-पास भी नहीं थी, जो साठ के दशक के मध्य में देखने में आयी थी. वैसे भी कम से कम 2011-12 तथा 2013-14 जैसे खेती के अच्छे वर्षों के बाद तो (अगर हम कृषि से इसके असर के उद्योग तक पहुंचने में एक साल का अंतराल मानें तब भी) 2012-13 तथा 2014-15 में औद्योगिक वृद्धि की ऊंची दरें दर्ज होनी चाहिए थी न कि वैसी मामूली वृद्धि दरें जो वास्तव में दर्ज हुई हैं.

विश्व पूंजीवादी संकट का असर
इस तरह, यह उल्लेखनीय है कि साठ के दशक के मध्य में आये औद्योगिक गतिरोध के विपरीत, मौजूदा औद्योगिक गतिरोध को कृषि उत्पाद में गिरावट से नहीं जोड़ा जा सकता है. यह दिखाता है कि हाल की औद्योगिक वृद्धि का आधार, पहले वाले आधार से बहुत भिन्न रहा है. यह औद्योगिक वृद्धि आबादी के उन तबकों की आय पर पहले से कहीं कम निर्भर है, जिनकी क्रय शक्ति में कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन के हिसाब से उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. दूसरे शब्दों में, अब औद्योगिक वृद्धि, उस घरेलू जन-बाजार पर निर्भर नहीं रही है, जो कृषि उत्पाद के आकार के हिसाब से घटता-बढ़ता है बल्कि घरेलू ‘‘अभिजात बाजार’’ ने और निर्यातों के बाजार ने ही हाल की औद्योगिक वृद्धि के लिए उत्प्रेरण मुहैया कराया है. अब जबकि विश्व पूंजीवाद संकट में फंसा हुआ है, इस बाजार पर मार पड़ रही है. नियंत्रणात्मक अर्थव्यवस्था के दौर के विपरीत, भारतीय अर्थव्यवस्था अब विश्व पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के साथ कहीं घनिष्ठï रूप से जुड़ गयी है. इसलिए, मौजूदा औद्योगिक गतिरोध के कारण हमें, विश्व पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के (अ) स्वास्थ्य में देखने होंगे.

अगर हम 2016 के मार्च के ही महीने को देखें तो हम यह पाते हैं कि पिछले साल के मार्च के ही महीने के मुकाबले औद्योगिक वृद्धि दर करीब-करीब शून्य पर ही थी (सिर्फ 0.5 फीसद). बहरहाल, अब से चंद रोज पहले ही मीडिया ने जोर-शोर से इसका एलान किया था कि मार्च के महीने में ‘‘कोर क्षेत्र’’ की ही वृद्धि दर 6.4 फीसद रही थी और यह एक प्रभावशाली औद्योगिक बहाली आ रही होने का इशारा है. लेकिन, ऐसी कोई बहाली तो नहीं ही आ रही है, वास्तव में ‘‘कोर क्षेत्र’’ में ऐसी अच्छी वृद्धि के बावजूद, समग्रता में औद्योगिक सूचकांक में गतिरोध का बना होना यही दिखाता है कि गैर-कोर क्षेत्र में बहुत भारी औद्योगिक संकुचन आया है. चूंकि कोर क्षेत्र में राजकीय उद्योगों की अच्छी-खासी उपस्थिति है, गैर-कोर क्षेत्र में औद्योगिक संकुचन, निजी औद्योगिक क्षेत्र में संकुचन की ओर ही इशारा करता है. और निजी क्षेत्र में संकुचन का, दूसरी लहर वाला दुष्प्रभाव भी पड़ता है, जिसमें निवेशों में कटौतियों का प्रभाव, अंतत: पूंजी मालों के उत्पाद को भी नीचे गिरा देता है. इसका अर्थ यह हुआ कि आने वाले दिनों में औद्योगिक मोर्चे पर परिदृश्य बद से बदतर ही होने जा रहा है.

वास्तव में पूंजी मालों के क्षेत्र में गंभीर संकुचन तो पहले ही दिखाई भी देने लगा है. 2016 के मार्च के महीने में पूंजी मालों के लिए औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक, पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले 9.2 फीसद सिकुड़ा था और इसके असर के सहारे से ही इस महीने में समूचे विनिर्माण क्षेत्र में पूरे 1.2 फीसद का संकुचन हुआ था. लेकिन, इसके बाद अप्रैल में पूंजी माल क्षेत्र में पूरे 15.4 फीसद का संकुचन दर्ज हुआ.

दीवालिया रास्ता
पूंजीवादी दुनिया में आज हर जगह दिखाई दे रही यह परिघटना, पूंजीवादी व्यवस्था मात्र की निशानी है. पूंजीवादी व्यवस्था में किसी भी औद्योगिक मंदी की दशा में, उपभोक्ता मालों के उत्पाद में गिरावट अपरिहार्य रूप से पूंजी मालों के उत्पाद में गिरावट से कम होती है. इस परिघटना को (जिसकी ओर रोजा लक्जमबर्ग ने ध्यान खींचा था) इस तरह समझा जा सकता है. मान लीजिए ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है, जहां उपभोक्ता मालों के क्षेत्र की वृद्धि दर शून्य हो जाती है. ऐसे हालात में पूंजीपति अपने उपभोक्ता माल क्षेत्र की क्षमता में शून्य के बराबर बढ़ोतरी ही करेंगे. इसलिए, पुराने उपकरणों के बदले जाने तथा पूंजी माल क्षेत्र के अपने ही निवेश को छोडक़र (जिन्हें हमने उदाहरण की सरलता के लिए अनदेखा ही कर दिया है), अर्थव्यवस्था में निवेश और इसलिए पूंजी मालों का उत्पादन, शून्य के बराबर होगा.

दूसरे शब्दों में इस सरल उदाहरण के हिसाब से भी, उपभोक्ता मालों के क्षेत्र में शून्य वृद्धि दर, पूंजी माल क्षेत्र में शून्य उत्पाद की स्थिति पैदा कर रहा होगा. (अर्थशास्त्री इस परिघटना को ‘‘एक्सिलरेटर’’ का प्रभाव कहते हैं). इसलिए, संकट के आने की सूरत में पूंजी मालों के उत्पादन में, उपभोक्ता मालों उत्पादन के संकुचन की तुलना में कहीं ज्यादा संकुचन होता है. इसी तर्क से, किसी अर्थव्यवस्था के संकट से उबरने का असली इशारा यही होता है कि पूंजी माल क्षेत्र की वृद्धि दर ऊपर उठने लगती है तथा इस क्षेत्र में क्षमता उपयोग का स्तर ऊपर उठ जाता है. यह इसका संकेतक होता है कि पूंजीपति निवेश करना शुरू कर रहे हैं. लेकिन, ऐसा आज तो दुनिया भर में कहीं नहीं हो रहा है, अमरीका में भी नहीं. यह विश्व पूंजीवादी संकट के कायम रहने को ही दिखाता है.

लेकिन इस समय जबकि दुनिया भर में पूंजीपति निवेश करने के प्रति ही अनिच्छुक हैं, मोदी सरकार की ‘‘मेक इन इंडिया’’ (यानी भारत में निवेश) की पुकार का अनसुना ही रह जाना तय है. इसे मोदी सरकार ने, भारतीय अर्थव्यवस्था में नयी जान डालने की अपनी रणनीति का मुख्य आधार बना लिया है, जो इस सरकार के घोर दिवालियापन को ही दिखाता है. पूंजीपतियों के लिए तरह-तरह की रियायतों के एलान के साथ, ‘‘मेक इन इंडिया’’ नीति की घोषणा कई महीनों के बाद भी, अर्थव्यवस्था अब भी औद्योगिक गतिरोध में ही फंसी हुई है, जो इस नीति के खोखलेपन का ही सबूत है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *