सिंधु घाटी का खुला एक और राज

नई दिल्ली | इंडिया साइंस वायर: सिंधु घाटी सभ्यता वर्षों से इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के शोध का विषय रही है. कुछ वर्षों से आनुवांशिक शोधकर्ता भी इस पर काम कर रहे हैं. एक नये शोध से पता चला है कि सिंधु घाटी की आनुवांशिक विविधता में रोड़ समुदाय की मुख्य भूमिका रही है.

रोड़ समुदाय राजस्थान और हरियाणा के विभिन्न क्षेत्रों में फैला हुआ है और ऐसा माना जाता है कि वैदिक काल से यह समुदाय इसी क्षेत्र में रह रहा है. इसीलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि रोड़ समुदाय की आनुवांशिक बनावट में एक निरंतरता है.


अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध से पता चला है कि रोड़ समुदाय सिंधु घाटी में कांस्य युग के दौरान यूरोपीय क्षेत्रों से आया था. इनके आने से सिंधु घाटी में पहले से रह रहे गुज्जर, जाट, काम्बोज और खत्री समुदाय की आनुवांशिक विविधता में बदलाव आया. यही कारण है कि सिंधु घाटी में रहने वाले विभिन्न समुदायों के आनुवांशिक फलक पर रोड़ अपनी यूरेशियन आनुवांशिक विशेषताओं के कारण आज भी अलग दिखाई देते हैं.

इस शोध में यह भी पाया गया है कि सिंधु घाटी और गंगा के मैदानी भागों में रहने वाले समुदायों के बीच एक आनुवांशिक संबंध है. इसका कारण सिंधु घाटी के पतन के बाद वहां रहने वाले समुदायों के गंगा के मैदानी इलाकों में पलायन को माना गया है.

रोड़ समुदाय की उत्पत्ति गुजरात और राजस्थान के सीमवर्ती क्षेत्रों में मानी जाती है और ऐतिहासिक रूप से सिंध के रोड़ इलाके में इस समुदाय की आबादी अधिक रही है. वर्तमान में भारत में रोड़ समुदाय की कुल जनसंख्या 7.5 लाख मानी जाती है.

भारत में ऐतिहासिक डीएनए नमूनों की कमी है, इसीलिए वैज्ञानिकों ने वर्तमान में यहां रह रहे गुज्जर, जाट, काम्बोज और खत्री जैसे सिंधु घाटी के समुदायों के डीएनए की तुलना यूरोपीय मूल के प्राचीन काल के डीएनए नमूनों से की है. रोड़ समुदाय के डीएनए के नमूने कुरुक्षेत्र के आसपास के इलाकों से लिए गए हैं. इस अध्ययन के नतीजे अमेरिकन जर्नल ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स में प्रकाशित किए गए हैं.

प्रमुख शोधकर्ता डॉ अजय कुमार पाठक ने बताया कि “इस अध्ययन के लिए एकत्रित किए गए डीएनए आंकड़े और पूर्व अध्ययनों से मिली जानकारियों से यह साफ हो जाता है कि रोड़ समुदाय उत्तर भारतीय वंशावली को समझने की महत्वपूर्ण कड़ी है.”

इस अध्ययन से जुड़े एक अन्य शोधकर्ता डॉ ज्ञानेश्वर चौबे के अनुसार, “अभी चल रहे आनुवांशिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हो जाएगा कि सिंधु घाटी में रहने वाले समुदाय कहां से आए थे और कैसे वे भारत के अन्य क्षेत्रों में फैल गए.”

इस अध्ययन में वाराणसी स्थित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान और एस्टोनिया स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ तारतू के वैज्ञानिक शामिल थे.

शोधकर्ताओं में डॉ पाठक तथा डॉ चौबे के अलावा, मानवेंद्र सिंह, प्रमोद कुमार, नीरज राय, मयंक मंडल, लिंडा ओंगारो, जूरी पारिक, एनी मेत्सपालु, सिरी रूत्सी, मेत मेत्सपालु, एलिना कुश्निआरेविच, फ्रैंसेस्को मॉन्टिनारो, लुका पागानी, टूम्स किविसिल्ड और रिचर्ड विलेम्स शामिल थे.

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