हम इंतज़ार करेंगे तेरा कयामत तक

कनक तिवारी
हिन्दू विवाह एक पवित्र धार्मिक परिकल्पना है. यह पुश्तैनी, पुख्ता और पुण्य विश्वास है कि दांपत्य की अंतरंगता जन्म-जन्मांतर तक एकनिष्ठ होती है. उसमें अविश्वास, अनादर, पृथकता और पराएपन के लिए कोई गुंजाइश नहीं है. यह भारत है जहां सत्यवान-सावित्री, नल-दमयंती, करवाचैथ और अक्षय तृतीया जैसी पूजा अब भी सामाजिक जीवन में सार्थक हस्तक्षेप करती है. एकपत्नीव्रत और पतिव्रता होने का धर्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 को लागू करने के पहले पारंपरिक हिन्दू बुद्धि ने इसी आधार पर जवाहरलाल नेहरू का खुला विरोध किया था.

अधिनियमित विवाह सामाजिक संविदा होने के बावजूद अब भी सप्तपदी और सात वचनों पर आधारित एक अविच्छेद पारस्परिकता है. साक्षरता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, आधुनिकता और शहरीकरण ने तलाक, एकल परिवार और ‘लिव इन रिलेशनशिप‘ जैसी नई संभावनाओं को साकार किया है. गांवों, मध्यम वर्ग तथा सांसारिक कूपमंडूकता के रहते पत्नी का जीवन अब भी पति की अर्धांगिनी कहलाते हुए भी उसकी छाया की तरह रहने की खुशफहमी में है. स्त्री ने भारतीय समाज व्यवस्था में सती, विधवा और देवदासी जैसी अब कुख्यात प्रथाओं के केंचुल में जीने का अभिशाप ढोया है. पता नहीं वह कौन सा रागात्मक आह्वान है जो पत्नी को पुरुष के प्रति असंदिग्ध प्रतिबद्धता के प्रमाणपत्र के लिए अब भी उकसाता रहता है.

गुजरात के एक गुमनाम गांव में निवास कर रही एक सेवानिवृत्त शिक्षिका शास्त्रीय समयचक्र के अनुसार अपने पति की तरह वाणप्रस्थ काल में है. केवल तीन वर्षों के दांपत्य जीवन के बाद पति से परित्यक्त होकर उसे गुमनामी की बांबियों में अपना जीवन मौत और सामाजिक उलाहनों से बचाकर किसी तरह जीना पड़ा होगा. हर तरह का अंधेरा उसके जीवन को रोशन करने के लिए लालायित होता रहा होगा. मीलों लंबे किसी बोगदे से निकली रेलगाड़ी की तरह उसे अचानक एक दिन रोशनी के थपेड़ों ने अंधकार का मर्म समझा दिया. पति ने राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते दांपत्य के दूध में से पत्नी को मक्खी समझकर निकाल फेंका था.

हिन्दू विवाह अधिनियम के फरमान के चलते उसने पत्नी को परित्यक्त करने का सिविल अपराध किया था. पत्नी ने कोई मुकदमा दायर नहीं किया. इसलिए पति निरपेक्ष, निश्चेष्ट और निरापद रहा. सायास परित्याग करने वाले पति पर यह वैधानिक दायित्व था कि पत्नी के भरणपोषण का इंतज़ाम करे. पति ने यह भी नहीं किया. पति धीरे धीरे राजनीति के शिखर की ओर बढ़ते हुए चुनाव लड़ने लगा. आवेदन पत्र के वैवाहिक जीवन वाले कॉलम में उसने अज्ञात कारणों से पत्नी का नाम नहीं लिखा, जबकि ऐसा करना कानूनी तौर पर लाज़िमी था. वह एक दिन देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए अपने राजनीतिक संगठन द्वारा उम्मीदवार बना दिया गया. कुछ खोजी पत्रकारों और राजनीतिक विरोधियों ने गुमनाम पत्नी को सनसनी फैलाने के लिए ढूंढ़ निकाला. उसकी तस्वीरें, कहानियां और कुंठाएं पति को लक्ष्य कर छापी गईं.

राजनीति असल में दलदल का ही दूसरा नाम है. उससे ही पति कमल-मुख लेकर पार्टी की नाल के ऊपर उगता सूरज बनने लगा था. इस बार पति ने पत्नीव्रत होकर नहीं बल्कि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के रथ के पहिए को पंक्चर होने से बचाने के लिए पत्नी का नाम पहले से निरंक चले आ रहे कॉलम में टीप दिया. वैधानिक अभिस्वीकृति के बाद अब तक अल्पज्ञात बल्कि गुमनाम, खामोश और लाचार रही पत्नी ने दबी जबान से बस इतना हौसला जताया कि काश उसे अब भी पति यदि बुला लें तो वह उस अपनी मजबूरी की सारी जिं़दगी को तपस्या का प्रसाद समझ लेगी. लगता नहीं पति को यह नासमझ प्रस्ताव कुबूल होगा. महत्वाकांक्षाओं के आसमान में कोई धरती की दूब लेकर नहीं उड़ता. धरती तो केवल आखिरी दिन के लिए सबकी प्रतीक्षा करती है.

जसोदा बेन की प्रतीक्षा कयामत के दिन तक दीपक की लौ की तरह जलती रहेगी. ऐसी स्वाभाविक संभावना है. लड़की के बालिग होते ही वह स्त्री में शुमार होने लगती है. कुदरत, समाज और शरीर तथा मन के विज्ञान का नियम है कि मानव सभ्यता के विकास के लिए स्त्री और पुरुष की युति आदम और हौव्वा के समय से ही कारक रही है. पुरुष पत्नी को साथ रखने से केवल उन्हीं आधारों का सहारा ले सकता है जो हिन्दू विवाह अधिनियम में दर्ज कारण नहीं हैं. देश का संभावित प्रधानमंत्री बन जाना या मुख्यमंत्री रहे आना अधिनियम में दर्ज नहीं है. यह भी है कि पत्नी द्वारा अदालत का दरवाज़ा नहीं खटखटाए जाने की स्थिति में अन्य कोई कुछ नहीं कर सकता. संसद ने परित्यक्त स्त्री के लिए अधिकारों का आसमान तो मुहैया कराया है, लेकिन जसोदा बेन की तरह अपनी इच्छाओं, अधिकार और संभावनाओं की सहनशील कुर्बानी करने वाली स्त्री संसदीय अधिनियमों के परे होती है.

एक परित्यक्त स्त्री के लिए जीवन की कुलबुलाती संभावनाओं पर पूर्ण विराम लग चुका था. कारण यह कि पति ने अपने हाथों संविधान की शपथ खाकर भी उसका नाम आवश्यक प्रपत्रों पर लिखने में गुरेज़ किया था. पति ने अब भी बुलाया नहीं लेकिन जसोदा बेन से विवाह करना लिखित में स्वीकार किया. जसोदा बेन को पति का हस्ताक्षर जर्जर हो रही अपनी देह में प्राणों का संचार लगा. चुक गई भावनाओं में जीवन की धड़कन पैदा होना मनुष्य के लिए निजी भूकंप या ज्वालामुखी से कम नहीं है.

वे पूरी दुनिया को बताना चाहेंगी कि निपट सादगी, शांति और करुणा का जीवनयापन करने वाली एक महिला कविता का स्त्रोत या दार्शनिक उद्रेक का कारण बन सकती है. राजनीति, आतंकवाद और मीडिया के विज्ञापन बाज़ार के अवांछित शोर में जसोदा बेन का विनम्र कारुणिक बयान मानवीय सभ्यता को जीवन की सिम्फनी से प्राणमय कर देता है. पति की हामी के लिए इंतज़ार करने वाली यह औरत होकर भी विरल भारतीय नारी एक साथ विवाह अधिनियम, मनोविज्ञान, सामाजिक व्यवस्थाओं और मनुष्य होने के मर्म के सभी दरवाज़ों पर दस्तक दे रही है. करुणा के मुकाबले पति की संभावित तथा पूर्व-क्रूरता बौनी, अवैज्ञानिक और नकारात्मक खामोशी है. प्रश्न एक व्यक्ति की चाहत का नहीं, उस पति से सहवास का है जिसे संस्कारों, परंपराओं, मर्यादाओं, मान्यताओं और संभावनाओं तक ने केवल जसोदा बेन के लिए गढ़ा है.

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