फिर छत्तीसगढ़ में रतनजोत का खेल

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में रतनजोत से बायोफ्यूल को लेकर फिर तैयारी शुरु हो सकती है. मुख्यमंत्री रमन सिंह का 2015 तक बायोफ्यूल के मामले में छत्तीसगढ़ के आत्मनिर्भर होने का दावा बुरी तरह से असफल साबित हुआ है.यहां तक कि केंद्र सरकार ही इस योजना को असफल मान चुकी है.

राज्य सरकार करोड़ों रुपये पानी की तरह बर्बाद करने के बाद बायोडीजल का नाम लेना तक भूल गई थी. लेकिन एक बार फिर राज्य सरकार कमर कस कर तैयारी में जुट गई है.


ताज़ा आह्वान केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किया है. उन्होंने सोमवार को छत्तीसगढ़ में कहा कि गडकरी ने कहा कि हाल ही में एक प्लेन बायो फ्यूल से उड़ी है. उसमें 25 प्रतिशत बायोफ्यूल था. ये बायोफ्यूल छत्तीसगढ़ से आया था.

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ हिंदुस्तान का बायोफ्यूल हब बन सकता है. गडकरी ने दावा किया कि बायोडीजल से नागपुर में एक हजार ट्रैक्टर चल रहे हैं. 55 एयरकंडीशन बसें चल रही हैं. नई टेक्नोलॉजी आई है जिससे बस, ऑटोरिक्शा, बाइक बायोफ्यूल और इथेनॉल से चलेंगे.

यह तब है, जब केंद्र सरकार खुद छत्तीसगढ़ की रतनजोत योजना को असफल मान चुकी है. इससे पहले 24 अगस्त 2016 को विधानसभा की लोकलेखा समिति के अध्यक्ष धनेंद्र साहु के समक्ष विभाग के अफसरों ने स्वीकार किया कि रतनजोत योजना असफल हो गई.

केंद्र ने कहा-असफल

इस साल 22 मार्च 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की केंद्रीय समिति ने सीआरईडीए एचपीसीएल बायोफ़्यूल लिमिटेड और इंडियन ऑयल- छत्तीसगढ़ रिनेवल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी, बायोफ़्यूल लिमिटेड को बंद करने का आदेश जारी किया.
इस फ़ैसले में कहा गया- सीआरईडीए एचपीसीएल बायोफ़्यूल लिमिटेड और इंडियन ऑयल- सीआरईडीए बायोफ़्यूल लिमिटेड के बीच रतनजोत के प्लांटेशन एवं जैव-ईंधन के उत्पादन के लिए क्रमशः 2008 और 2009 में संयुक्त उपक्रम की शुरुआत की गई थी.

इंडियन ऑयल-छत्तीसगढ़ की शाखा सीआरईडीए ने लैंड यूज एग्रीमेंट के तहत रतनजोत के प्लांटेशन के लिए बंजर भूमि उपलब्ध कराई. विभिन्न बाधाओं जैसे बीज की बहुत कम उपज, बंजर भूमि की सीमित उपलब्धता, प्लांटेशन के रखरखाव की ऊंची क़ीमत आदि के चलते यह परियोजना अव्यवहारिक हो गई और रतनजोत प्लांटेशन की गतिविधियों को रोक दिया गया.

छत्तीसगढ़ ने जिस रतनजोत क्रांति के लिये रेलवे को प्रेरित किया था, उसने भी हाथ जोड़ लिए.

रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा के अनुसार-भारतीय रेल की खाली पड़ी भूमि पर काफी मात्रा में जटरोफ़ा के पौघे लगाए गए किंतु इन पौधों की जीवन दर बहुत कम थी, ये पौधे प्रत्याशा से बहुत कम मात्रा में पनप पाए और इनमें दीमक लगने की संभावना था. रेलवे को इन जटरोफ़ा पौधों से कोई बायो-डीज़ल प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि यह वाणिज्यिक रूप से व्यहार्य नहीं पाया गया.

दिल्ली से भी अधिक इलाके में रतनजोत

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार 12 साल पहले छत्तीसगढ़ सरकार ने अमरीकन मूल के जटरोफ़ा यानी रतनजोत नामक पौधे को अपना हथियार बनाया और राज्य भर में रतनजोत लगाने की शुरुआत की गई. कृषि, उद्यानिकी, पंचायत, ग्रामीण विकास, वन विभाग समेत तमाम सरकारी विभागों में रतनजोत लगाने की होड़ लग गई.

रोजगार गारंटी से लेकर तमाम सरकारी परियोजनाओं में रतनजोत को प्राथमिकता देने के निर्देश जारी किए गये. सड़क के किनारे, तालाब की मेढ़ पर, तमाम कानूनों को ताक पर रख कर जंगलों के भीतर, चारागाहों पर, हर इलाके को रतनजोत से पाट दिया गया.

छत्तीसगढ़ बायोफ़्यूल विकास प्राधिकरण के अनुसार इस योजना में अलग-अलग विभाग कार्यरत थे, इसलिये यह स्पष्ट नहीं है कि छत्तीसगढ़ में रतनजोत लगाने और उसके रख रखाव के नाम पर कुल कितने अरब रुपये खर्च हुए.

सरकारी आंकड़ों की मानें तो 2005 से 2009 तक कम से कम 1.65 लाख हेक्टेयर इलाके में रतनजोत लगाए गए.

इसे आसानी से समझना हो तो कहा जा सकता है कि सिक्किम और गोवा जैसे दो राज्यों से भी बड़े इलाके में रतनजोत लगा दिया गया.

दिल्ली राज्य का पूरा इलाक़ा 1,484 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और छत्तीसगढ़ ने इससे भी कहीं अधिक 1650 वर्ग किलोमीटर में केवल रतनजोत लगा दिया.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने नारा दिया-“डीज़ल नहीं अब खाड़ी से, डीज़ल मिलेगा बाड़ी से.”

उन्होंने 2014 तक डीजल के मामले में छत्तीसगढ़ के पूरी तरह से आत्मनिर्भर होने का दावा किया.

राज्य के दस लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिलने की बात कही गई. मुख्यमंत्री ने अपनी गाड़ी भी बायोडीजल से चलानी शुरू की. सरकार ने रेलगाड़ियों को बायोडीजल से चलाने का प्रयोग शुरू किया.

रतनजोत के प्रति मुख्यमंत्री रमन सिंह का उत्साह देखते ही बनता था.

इंडियन ऑयल से लेकर रिलायंस पेट्रोलियम और विदेशी कंपनी डी-वन तक को न्यौता दिया गया.

रतनजोत लगाने के लिए 45 हज़ार हेक्टेयर ज़मीन क्रेडा-एचपीसीएल बायोफ़्यूल लिमिटेड और इंडियन ऑयल क्रेडा बायोफ़्यूल लिमिटेड को लीज पर दी गई.

छत्तीसगढ़ बायोफ़्यूल विकास प्राधिकरण नाम से एजेंसी बनाई गई, जिलों में टास्क फ़ोर्स बनाया गया, निजी कंपनियों को ज़मीन देने के लिये ख़ास तौर पर अधिसूचनाएं जारी की गईं.

छत्तीसगढ़ सरकार ने कंपनियों के साथ मिलकर ‘ज्वाइंट वेंचर’ बनाया. इन कंपनियों ने भी 5889 हेक्टेयर में रतनजोत लगाए.

फिर सारी योजना तेल में

रमन सिंह ने दावा किया- अकेले छत्तीसगढ़ 2015 तक बायोफ़्यूल के मामले में भारत को आत्मनिर्भर कर देगा. लेकिन अब यह सब पुराने दिनों की बात है.

रमन सिंह की गाड़ी के लिए भी बायोडीजल नहीं मिला और गाड़ी कुछ ही दिनों बाद डीजल से चलने लगी. रेलवे ने कुछ किलोमीटर गाड़ियां चलाई और फिर यह प्रयोग बंद कर दिया.

26 फरवरी 2008 को मुख्यमंत्री ने विधानसभा में जानकारी दी कि 2005 में स्थापित प्लांट से आठ महीने में 2494 लीटर बायोडीज़ल मिला है.

और राज्य भर में पौधारोपण और उसके रख रखाव पर हुये करोड़ों रुपये के खर्च से अलग अकेले छत्तीसगढ़ बायोफ़्यूल विकास प्राधिकरण पर इन आठ महीनों में ही करीब 14 करोड़ रुपये खर्च हो गये.

यानी एक लीटर तेल निकालने के लिये करीब 54585 रुपये का खर्च हुआ.

2010 के आसपास जब सरकार को समझ में आया कि योजना पूरी तरह से फ़्लॉप हो गई तो उसने राज्य में पौधारोपण की सूची से रतनजोत को हटा दिया.

कैग ने कई इलाक़ों में जांच के बाद अपनी रिपोर्ट में बताया कि बड़ी मुश्किल से महासमुंद इलाके से 50 किलोग्राम बीज एकत्र किया गया है.

जिन नमूने की जांच की गई थी, उनमें ही पांच करोड़ रुपये की गड़बड़ी पाई गई. अनुमान लगाया गया कि रतनोत के नाम पर कई करोड़ का भ्रष्टाचार हुआ है.

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