छत्तीसगढ़ में क्यों निकला रतनजोत का तेल

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में रमन सिंह ने रतनजोत के सहारे बायोडीजल के मामले में आत्मनिर्भर होने का दावा किया थालेकिन इस योजना का ही तेल निकल गया है. केंद्र की मोदी सरकार ने रतनजोत को लेकर जो फैसला लिया है, वह राज्य के बायोफ्यूल प्राधिकरण के मुंह पर तमाचे की तरह है.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा था कि 2015 तक छत्तीसगढ़ ही पूरे देश को अपनी रतनजोत योजना से बायोडीजल के मामले में आत्मनिर्भर कर देगा. रतनजोत के नाम पर एक पूरी फौज थी, जो तरह-तरह से पूरे देश को भरमाने और गुमराह करने में लगी थी. सरकार ने इस योजना पर अरबों रुपये फूंक दिये लेकिन नतीजा शून्य हासिल हुआ. रतनजोत परियोजना की जब शुरुआत हुई थी, उस समय दुनिया के कई देशों में अवांछित घोषित इस पौधे को लगाये जाने का विरोध किया था. लेकिन रतनजोत के तेल और उसकी धार देखने में व्यस्त सरकारी अफसरों ने इस विरोध की अनदेखी की.


रमन सिंह ने 2005 में ‘डीजल नहीं अब खाड़ी से, डीजल मिलेगा बाड़ी से’ का नारा दिया था. पूरे राज्य में सबसे बड़ा मुद्दा बायोडीजल बन गया था. करोड़ों की संख्या में पौधे लगाने की शुरुआत हो गई थी. विश्वरिकार्ड बनाये जा रहे थे. रायपुर से लगे सुंदरकेरा गांव में 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से रतनजोत लगवा कर इसे खूब प्रचारित प्रसारित किया गया. लेकिन आज 11 साल बाद एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा लगाया गया पौधा कहीं ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेगा. हकीकत तो ये है कि 100 एकड़ में यहां लगाये गये इस पौधे का नामो-निशान नहीं है. यहां तक कि इस पूरे आयोजन के दौरान लगाया गया शीलालेख भी वहां से उखाड़ा जा चुका है.

लेकिन मामला केवल सुंदरकेरा भर का नहीं है. पूरे राज्य में 1.65 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर रतनजोत यानी जेट्रोफा लगाये गये थे और अधिकांश का यही हाल हुआ. सिक्किम और गोवा, दो राज्यों से भी बड़े क्षेत्रफल में जेट्रोफा लगाया गया था. कई जगहों पर तो सरकार ने एक ही जमीन पर तीन-तीन बार जेट्रोफा लगाये. पंचायत का पौधा सूखा तो बीज विकास निगम ने लगा दिया. बीज विकास निगम ने पौधारोपण के बिल बना कर छुट्टी पाई तो उसी ज़मीन पर वन विभाग ने पौधे लगाये. लेकिन अब इन जगहों पर एक पौधा नजर नहीं आता.

जेट्रोफा के नाम पर अरबों फूंकने के बाद केंद्र सरकार के फैसले ने तो छत्तीसगढ़ सरकार की पूरी योजना को ही कटघरे में खड़ा कर दिया. इस साल केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बैठक बुलाई और छत्तीसगढ़ के अक्षय उर्जा विकास अभिकरण छत्तीसगढ़ यानी क्रेडा के साथ की साझेदारी वाली कंपनी को भंग कर दिया.

केंद्र सरकार के फैसले में कहा गया- सीआरईडीए एचपीसीएल बायोफ़्यूल लिमिटेड और इंडियन ऑयल- सीआरईडीए बायोफ़्यूल लिमिटेड के बीच रतनजोत के प्लांटेशन एवं जैव-ईंधन के उत्पादन के लिए क्रमशः 2008 और 2009 में संयुक्त उपक्रम की शुरुआत की गई थी. इंडियन ऑयल- छत्तीसगढ़ की शाखा सीआरईडीए ने लैंड यूज एग्रीमेंट के तहत रतनजोत के प्लांटेशन के लिए बंजर भूमि उपलब्ध कराई. विभिन्न बाधाओं जैसे बीज की बहुत कम उपज, बंजर भूमि की सीमित उपलब्धता, प्लांटेशन के रखरखाव की ऊंची क़ीमत आदि के चलते यह परियोजना अव्यवहारिक हो गई और रतनजोत प्लांटेशन की गतिविधियों को रोक दिया गया.

यही हाल रेलवे के साथ हुआ. रेलवे ने भी माना कि जिस तरह से जेट्रोफा लगाया गया था, उसका कोई मतलब नहीं है और फिलहाल रेलवे ने भी इस परियोजना को बंद कर दिया है.

आज की तारीख में छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल प्राधिकरण ने भी जेट्रोफा से कहीं अधिक करंज पर ध्यान देना शुरु किया है. लेकिन रतनजोत के नाम पर 3000 लाख से अधिक पौधारोपण का जो खेल खेला गया, और जिस खेल में करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा हुआ उसका जवाब कोई नहीं देना चाहता.

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