जया जादवानी की कविताएँ

एक
बहुत तंग है जगह
समाती नहीं त्वचा में
डर है
फट कर बिखर न जाऊं.

दो
इसे और कहाँ ले जाऊं
जगहें बदल कर देख चुकी
न जाने कितनी
अब रूह पर ये जिस्म भी एक बोझ है.


तीन
मैं तुम्हारे बारे में कभी नहीं सोचती
चुपचाप गुजरती हूँ हर दिन के गलियारे से
रात को उतर आने देती हूँ
अपने कमरे की खिड़की से अपने भीतर
हो सकता है मैं जलाती होऊं
कुछ मिट्टी के दीए
कि मैं देख सकूँ अपना लिखा साफ साफ
अब बहुत सारी चीजें दिखती भी नहीं
दीवारों पर टंगी तस्वीरों की
बदल गयी है सूरत
रंगों की उलट गयी हैं सारी शीशियाँ
मैं नहीं सोचती तुम्हारे बारे में
मैं खड़ी हूँ अपनी जगह पर
कभी गुजरो इस राह से तो
देखना खामोश खड़े एक वृक्ष को
नदी किनारे शांत
देखना दूर जाती नावों और चिड़ियाओं को
कोई नहीं सोचता उसके बारे में
किसी को क्या फर्क पड़ता है कि वह हरा है
कि उसकी आसमान छूती शाखायें हैं
किसी को क्या फर्क पड़ता है कि वह देखता है
उस ओर से लौटती नावों को चुपचाप.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!