हेमंत करकरे ईमानदार अफसर

जूलियो रिबेरियो
हेमंत करकरे ने अपने दोस्तों के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी थी. इस देश का हरेक स्त्री-पुरुष उनका दोस्त था. वह औरत-मर्द के बीच, हिंदू-मुसलमान के बीच, इस या उस जाति के बीच, भेद नहीं करते थे. वह एक पेशेवर पुलिसकर्मी थे. और वह देशभक्त थे. जनता, लोकसेवकों से इसी की उम्मीद करती है.

संयोग से करकरे, जातियों के सोपानक्रम में सबसे ऊपर की सीढिय़ों से आते थे. लेकिन, जब उन्होंने खाकी वर्दी पहनी, यह कारक अप्रासांगिक हो गया. परंपरागत संस्कृति की जगह एक नयी संस्कृति ने ले ली, जो इसका तकाजा करती थी कि सभी नागरिकों के साथ बराबरी का बर्ताव किया जाए. कानून की नजरों में सभी बराबर हैं. कोई भी सच्चा पुलिसवाला इसी आदर्श पर चलता है, जो उसका ‘‘धर्म’’ ही हो जाता है.


मैं करकरे से भली-भांति परिचित था. वह उन आईपीएस अफसरों में से थे–जिनकी संख्या दुर्भाग्य से अब घटती जा रही है–जिन्हें बेदाग ईमानदारी के लिए जाना जाता था और इसमें रुपए-पैसे के मामले में ईमानदारी के साथ-साथ, बौद्धिक ईमानदारी भी शामिल है. जो लोग सच्चा न्याय चाहते थे, उनकी ओर खिंच जाते थे. वह सचाई के सिवा और कुछ बोलना जानते ही नहीं थे या कहें कि वह अपनी अस्थि-मज्जा से सच को ही महसूस करते थे.

जिस रोज जेहादी आतंकवादियों ने उनका जीवन दीप बुझाया, उससे एक रोज पहले ही, 25 नवंबर 2008 को वह मुझ से मिलने आए थे. वह मुझे यह बताने आए थे कि वह बेचैन थे. वह बेचैन थे क्योंकि उसके एक रोज पहले या एकाध रोज पहले, एलके आडवाणी ने महाराष्ट्र पुलिस एंटी टैररिस्ट स्कॉड (एटीएस) पर, जिसके करकरे तब प्रमुख थे, मालेगांव विस्फोट प्रकरण में साध्वी प्रज्ञा व अन्य को झूठा फंसाने का आरोप लगाया था. करकरे ने बताया था कि वह तो किसी को फंसाने की बात सपने में भी नहीं सोचते और मुझे उनकी बात पर यकीन था क्योंकि मैं जानता था कि वह कुछ गलत नहीं कर सकते हैं. मैंने उनसे कहा था कि निजी तौर पर आडवाणी से बात करूंगा क्योंकि मुझे उनकी ईमानदारी पर विश्वास था.

करकरे मुझे यह दिखाने के लिए केस के कागजात साथ लाए थे कि उनकी तफ्तीश ने असली दोषियों को धर लिया है. इतना धीरज न होने की वजह से मैं इन फाइलों में नहीं गया. मुझे आज इस बात का अफसोस है कि मैंने उनकी जांच के नतीजों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली. अगर मैंने ऐसा किया होता तो मैं उस भले और ईमानदार शख्स का ठोस तथ्यों के साथ बचाव पेश कर सकता था. उनकी गैर मौजूदगी में उनके खिलाफ जिन तमाम ताकतों को लहका दिया गया है, उनसे अपना बचाव करने के लिए वह अब जिंदा नहीं हैं.

लेकिन, मैं इन ताकतों को बिना चुनौती दिए नहीं निकल जाने दे सकता. मैं ब्यौरों पर भले उनका खंडन न कर पाऊं, पर करकरे को जानने वाले पुसिल अफसरों को पक्का यकीन है कि वह साक्ष्य गढऩे वालों में से नहीं थे. यह तफ्तीश पहले एटीएस में करकरे के पूर्ववर्ती ने की थी, फिर खुद दिवंगत व्यक्ति और अब राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने. जांचकर्ता असाध्य रूप से एक-दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आते हैं.

पहली जांच में चलन के हिसाब से जो संदिग्ध हो सकते थे उन्हें वास्तव में गिरफ्तार भी कर लिया गया था. दूसरी जांच में, टेलीफोन बातचीत के इंटरसैप्ट व रिकार्डशुदा बातचीत जैसे ठोस साक्ष्यों के आधार पर एक कहीं संभावित ग्रुप को पकड़ा गया था. तीसरी जांच में करकरे टीम द्वारा जिन दोषियों की पहचान की गयी थी उनके खिलाफ साक्ष्यों व आरोपों को नरम किया जा रहा है. यह बहुत ही असामान्य है कि बाद की तफ्तीशों में साक्ष्यों को इस तरह से कमजोर किया जाए. बाद की जांचों से केस को मजबूत करने की उम्मीद की जाती है, न कि उसे कमजोर करने की.

जब सुसम्मानित सरकारी वकील, रोहिणी सलियान ने हिंदुत्ववादी अतिवादियों के खिलाफ केस को नरम करने के लिए, एनआईए द्वारा उन्हें प्रभावित करने की कोशिश किए जाने की शिकायत की थी, मैं यह मानकर चल रहा था इसके बाद वे ऐसी कोशिश बंद कर देंगे. लेकिन, अपनी बुरी से बुरी कल्पना में भी मैं यह नहीं सोच सकता था कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए, मेरे दोस्त हेमंत करकरे जैसे राष्ट्रीय नायक की बलि चढ़ा दी जाएगी. उसके जाने के बाद तो उसकी प्रतिष्ठा ही बची थी और अब उसे ही दफ्न किया जा रहा है.

हेमंत की हत्या के कुछ ही साल में उनकी पत्नी की स्वाभाविक कारणों से मौत हो गयी. पीड़ा इतनी ज्यादा थी कि वह बर्दाश्त नहीं कर पायीं. अगर वह जिंदा होतीं, तो लड़ रही होतीं. मुझे इसमें रत्तीभर शक नहीं है. लेकिन, उनकी नामौजूदगी में और उनकी बेटियों की नामौजूदगी में, जो विदेश में हैं, मेरे जैसे पुराने सहकर्मी पर यह जिम्मेदारी आ जाती है कि उनका बचाव करूं.

मेरी कई पुलिस अधिकारियों तथा पुलिसकर्मियों से बात हुई है जिन्हें, अपने एक भरोसे के काबिल तथा न्यायप्रिय सहयोगी की सुकीर्ति पर दाग लगाने के, एनआईए के फैसले से निराशा हुई है. इससे सत्ता में बैठे लोगों को खुश करने की कोशिश की ही गंध आती है. मुझे पुलिस बल में ऐसे ही मोहभंग का एहसास तब हुआ था, जब इशरत जहां केस में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने, उसकी हत्या की साजिश में खुफिया ब्यूरो के कुछ अधिकारियों को नामजद किया था.

मैं पहली बार यह देख रहा था कि एक केंद्रीय पुलिस एजेंसी द्वारा एक आपराधिक मामले में एक सहोदर सरकारी एजेंसी के कारकूनों को लपेटने की कोशिश की जा रही थी, जबकि बादवाली एजेंसी के तौर-तरीकों के बारे में आम पुलिसकर्मी भी बखूबी जानते हैं. उस मामले में भी ऊपरवालों को खुश करने की कोशिश आसानी से देखी जा सकती थी. अगर सेवानिवृत्ति के बाद शानदार नियुक्तियों पर कानून के जरिए पाबंदी लगा दी जाती है, तो ऊपर वालों को खुश करने की प्रवृत्ति घट जाएगी.

जब करकरे ने दोषियों की अपनी सूची जारी की थी, हम भारतीयों के लिए यह दावा करना आसान था कि भारत, पाकिस्तान से भिन्न है. उस अंधियारे देश में तो जेहादी आतंकवादियों की, अगर वे दुश्मन के खिलाफ यानी हमारे खिलाफ काम रहे होते हैं, हमेशा हिफाजत ही जाती है. हम गर्व के साथ एलान कर सकते थे कि हमारा देश तो ‘‘कानून के शासन’’ से शासित होता है. अगर कानून को बराबरी से तथा न्यायपूर्ण तरीके से लागू नहीं किया जाता है, तो मुझे शक है कि हम कभी भी उस सम्मान को हासिल कर पाएंगे.

जब एनआईए ने अंतत: मालेगांव केस में अपने निष्कर्ष सार्वजनिक किए, मेरे हिंदू दोस्त तब तक सुचिंतित चुप्पी ओढ़े रहे, जब तक मैंने उन्हें टिप्पणी करने के लिए समझाया-बुझाया नहीं. करकरे का निरादर किए जाने पर निष्कर्षों की ओर ले जाने वाले सवाल पर, प्रतिक्रिया बहुत ही बेजान थी. लेकिन, जब मैंने अभिनव भारत के अप्रत्याशित तथा असामान्य जन्म के कारण के रूप में इस्लामी अतिवाद की ओर इशारा किया, वे कई गुना ज्यादा उत्साहित नजर आए. दूसरी ओर, मेरे मुस्लिम तथा ईसाई मित्र इसके लिए उत्सुक थे कि मैं मीडिया के जरिए अपने विचारों को सार्वजनिक स्तर पर लाऊं. विभाजन तीखे हो रहे हैं. और यह कोई अच्छा लक्षण नहीं है.

(इंडियन एक्सप्रैस, 18 मई 2016 में छपी तथा लोकलहर से साभार)
(प्रस्तुत लेख में विचार लेखक के निजी हैं. सीजीखबर किसी भी तरह से इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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