झीरम 2 : हादसे का सच

दंतेवाड़ा | सुरेश महापात्र : झीरम 2 को लेकर कई रहस्य उजागर होते जा रहे हैं. तोंगपाल थाना की सीमा से करीब 500 मीटर दूर हुए इस हमले में जवानों की शहादत के बाद सीआरपीएफ की सर्चिंग सिस्टम में गंभीर लापरवाही सामने दिखाई दे रही है. इस मामले को लेकर तोंगपाल के ग्रामीणों से हुई चर्चा के मुताबिक जो तथ्य सामने आए हैं, उससे साफ है कि फोर्स और लोकल पुलिस पूरी तरह से गंभीर लापरवाही बरत रही थी. जिसका फायदा नक्सलियों ने रेकी करने के बाद उठाया.

फिर श्यामगिरी की गलती
जो गलती करीब 10 दिन पहले दंतेवाड़ा जिले के श्यामगिरी इलाके में पुलिस ने की थी, वही गलती यहां भी दुहराई गई. श्यामगिरी में एक नियत समय पर नियत मार्ग से नियमित रूप से आवा—जाही की रेकी नक्सलियों ने की थी. इसके बाद हमले को अंजाम दिया था. इस हमले में कुआकोंडा थानेदार विवेक शुक्ला समेत 6 जवान शहीद हो गए थे. यही गलती तोंगपाल में बीते 20 दिनों से सीआरपीएफ और लोकल पुलिस की संयुक्त पार्टी नियमित रूप से कर रहे थी. सर्चिंग में निकलने से पहले कभी भी गंतव्य की जानकारी लेने की कोशिश नही की जाती थी. सड़क के दोनों ओर समानांतर चलते जवान निश्चित दूरी तो बनाकर रखते थे पर रुटिन के चलते वे सजग नहीं होते थे. अक्सर हथियार कंधे पर लटका कर अथवा पूरी लापरवाही के साथ लेकर चलते थे. माना जा रहा है इसकी पूरी पड़ताल नक्सलियों ने हमले से पहले कर ली थी.

झीरम में तैनात फोर्स ने क्या किया?
जिस जगह पर पिछले साल 25 मई को नक्सलियों ने एंबुश कर झीरम 1 में कांग्रेस के काफिले पर हमला किया था. उस स्थान पर सड़क निर्माण और सुरक्षा की भावना को लेकर दरभा से एक सीआरपीएफ की कंपनी तैनात की गई है. इस कंपनी की जिम्मेदारी घाट पर और सड़क निर्माण में सुरक्षा मुहैया करवाना है. कल जिस समय नक्सलियों ने तोंगपाल से निकली सर्चिंग पार्टी पर अटैक किया था, उस दौरान घटना स्थल से करीब 700 मीटर दूरी पर सीआरपीएफ की कंपनी सड़क पर तैनात थी. क्या वहां जवानों ने बारुदी विस्फोट और फायरिंग की आवाजें नहीं सुनी? या सुनकर भी अनसुना कर दिया? यह बड़ा सवाल है.

हमले के बाद फूंके वाहन
सुबह साढ़े 9 बजे के बाद नक्सलियों ने जब अटैक किया तब पहले वाहनों को आग नहीं लगाई गई थी. बल्कि हमले को अंजाम देने के बाद वाहनों को फूंका गया. इस बात की जानकारी एक युवक ने दी जो ठीक साढ़े 9 बजे टहकवाड़ा में घटना स्थल से दो सौ मीटर की दूरी पर जवानों को देखते हुए जगदलपुर की ओर निकला था. उसी युवक ने यह भी देखा कि रास्ते में टिप्पर टहकवाड़ा की ओर जा रहे हैं. उसी युवक ने तोंगपाल थाना सीमा समाप्त बोर्ड से करीब दो सौ मीटर दूर सीआरपीएफ जवानों को सड़क पर तैनात देखा था. यानी युवक के निकलने के बाद फायरिंग शुरू हुई. फायरिंग के बाद वाहनों को आग लगाई गई.

पीछे आ रही पार्टी का सर्पोट नहीं
अगर इस बात को मान भी लिया जाए कि जो पार्टी फंस गई थी, उसके पीछे आ रही पार्टी ने पूरी तरह से सर्पोट किया तो नक्सली इतने इत्मीनान के साथ असलहा व जवानों की व्यक्तिगत सामग्री लूटने में कैसे कामयाब हो गए? इसका मतलब साफ है कि पीछे आ रही पार्टी फायरिंग के बाद खुद को संभालने में लग गई. दरभा की ओर से बस्तर जिला की सीमा पर सुरक्षा के लिए तैनात जवानों ने खुद को बचाने में अपना पूरा जोर लगाया. अगर ऐसा नहीं होता तो बड़े नुकसान से बचा जा सकता था.

कहां गए एसयूवी जैसे उपकरण?
जब सीआरपीएफ को पास आसमान से सुरक्षा के संसाधन एसयूवी जैसे उपकरण उपलब्ध हैं. तो वे किसी भी सर्चिंग ऑपरेशन में निकलने से पहले उसका या तो उपयोग नहीं करते अथवा इस बात का कभी ध्यान रखने की कोशिश नहीं की गई. इस उपकरण के माध्यम से 5 किलोमीटर के दायरे में आसमान से निगरानी रखी जाती है. सर्चिंग से पहले नक्सलियों की मौजूदगी देखने और उसके मुताबिक रणनीति बनाकर आगे बढ़ने के लिए इसे मुहैया करवाया गया है. अगर राज्य सरकार की खुफिया एजेंसी ने अलर्ट जारी किया था तो कम से कम इस उपकरण का उपयोग कर सर्चिंग ऑपरेशन में सुरक्षा मापदंडों का ध्यान रखा जा सकता था.

* लेखक दंतेवाड़ा से प्रकाशित दैनिक ‘बस्तर इंपैक्ट’ के संपादक हैं.

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