नक्सलियों ने कहा-जघन्य अपराध

सुरेश महापात्र
दैनिक भास्कर के साथ बहुत कुछ अच्छा चल रहा था. यह भी समझ में आया कि अगर आप प्रोफेशनल की तरह व्यवहार करते हैं तो ही आप सफल हो सकते हैं. इसमें बहानेबाजी की गुंजाईश कम होती है. दैनिक भास्कर जगदलपुर में कई बातें समझ में आईं. पहली यह कि संस्थान जितना बड़ा होगा, उसमें अंदरूनी राजनीति उतनी ही बड़ी होगी. चुनौती भी.

इस संस्मरण का पहला भाग यहां पढ़ें ओह, ये ही होते हैं पत्रकार !

सही मायने में बालाजी वार्ड में स्थित दैनिक भास्कर के दफ्तर में जब मैं पहुंचा तो उसमें अजीब सी कसमसाहट थी. जगदलपुर का पुराना बंदा था. सो खुद बखुद लोग प्रतिद्वंदी समझने लगे थे. उनकी यही समझ थी कि जो मुझे हर रोज नया कुछ करने, सीखने के लिए प्रेरित करती. पत्रकारिता की अंतिम रेखा पार कर पहुंचने के कारण यह भी पता था कि बैनर का भी बड़ा मतलब होता है. उसमें अगर आप सफल होते हैं तो अपनी पहचान बढ़ा सकते हैं. हुआ भी यही.

हर दिन सुबह मीटिंग होती. इसमें खबरों को लेकर चर्चा होती. पहले सुदीप ने हाईवे चैनल में सिखाया था. उसे दैनिक भास्कर में अनिवार्य देखा. पहले तो मुझे बीट ही नहीं दी गई. कहा गया कि विज्ञप्तियां बनाने वाला कोई नहीं है. इसे बनाओ. पेज लगाकर भेजना होता था. मुझे टाइपिंग आती थी पर गति नहीं थी. कम्प्यूटर के संबंध में जनरल नॉलेज ही था. कहीं इसे सीखा तो था नहीं. सो पहले सुबह पहले पहुंच कर विज्ञप्तियां निपटाता उसके बाद कोशिश करता कि किसी भी तरह से एक-दो खबरें निकालूं. क्योंकि यही पहचान बनाती. मुझे दफ्तर से बाहर निकलने का वक्त ना मिले, इसकी अलग आंतरिक कोशिशें भी होतीं. दो महीने तक एक भी खबर बाईलाइन नहीं लगी.

दैनिक भास्कर में पहली बाईलाइन
दैनिक भास्कर में बाईलाइन खबरों के लिए मारा-मारी होती. कई बार तो रायपुर से ही नाम हटा देते. कहते कि बाईलाइन के लायक नहीं था. मेरा नाम तो भेजा ही नहीं जाता. भास्कर न्यूज ही चलता था. डाक्टर सतीश यह काम देखा करते. भाषा विज्ञानी होने के कारण उनकी महत्ता बेहद ज्यादा थी. शब्दों से खेलते, उसे खौलते पानी में उबालते और टंच मारते. बड़ी टीस लगती. पर क्या करें अब पत्रकारिता मजबूरी हो चुकी थी. भास्कर से बड़ा कोई बैनर था नहीं. हालांकि ब्यूरो प्रमुख भंवर बोथरा का भारी विश्वास था मुझ पर. नगरपालिका को लेकर लिखी एक खबर बाईलाइन में दी. डा. सतीश ने पेज लगाया था. अंदर के पन्ने पर डेढ़ टांग पर खबर को टांग दिया. अखबारी लहजे में कहा जाए तो इसे खबर की तौहीन समझते हैं.

मैंने तय किया कि लिखना बंद नहीं करुंगा. रही बात बाईलाइन की, तो जब खबर लिखने के अच्छे पैसे मिल रहे हैं तो खबर बोले जगह चाहिए तो कोई कैसे रोकेगा? इसी सोच के साथ आगे बढ़ता गया. दौड़ में पिछड़ ना जाउं, यह सोचकर मैं सुबह आठ बजे तोकापाल से खाना खाकर निकलता, रात को करीब 10 बजे वापस पहुंचता. यही रूटिन था.

सुबह पहुंचते ही पहले विज्ञप्तियां बनाता. फिर दो घंटे के लिए सिटी में निकलता. खबरें निकालता और दो बजे तक वापस आफिस. यहां खबरें टाइप करता. वहीं पेज लगाना सीखा. भास्कर में कई बार खबर को लेकर बहुत किच—किच होती. पुल आउट में फ्रंट पेज में जगह पाने के लिए भारी संघर्ष होता. खुद पेज लगाने के कारण कई बार मेरी खबरों को अच्छी जगह मिलने लगी. प्रयोग के लिए भी काफी मौका मिला. उसके बाद दूसरे दिन रायपुर के पन्ने पर किसकी कितनी खबरें ली गई हैं, यह देखने में मजा आता. जिसकी खबरें ज्यादा लगती वह मजे से ब्यूरो चीफ को दिखाता. यानी अपने होने का एहसास कराने की कोशिश.

दो तीन खबरें…
शहर में कोई बड़ा इवेंट हो तो उसमें समाचार संकलन करना हर पत्रकार चाहता है. पहली बात इसमें मेहनत ज्यादा नहीं लगती. एक सब्जेक्ट होता है, जिस पर आप थोड़ी-सी मेहनत से खबर निकाल लेते हैं. जिन अखबारों में सिटी में बड़ी टीम होती है, सभी यही चाहते हैं कि ऐसा इंवेट हमें मिले. बीट भी बांटी जाती है ताकि अपने बीट के इवेंट को पत्रकार खुद कवर करे. कई दफा ऐसा होता भी नहीं है.

जगदलपुर में रेल रोको आंदोलन को लेकर सांसद बलीराम कश्यप ने घोषणा की थी. सीनियर पत्रकार सुरेश रावल पॉलिटिकल बीट देखते थे, सो उन्हें ही इस इवेंट को कव्हर करना था. सुबह की बैठक में अचानक भंवर बोथरा जी ने कह दिया कि इसे सुरेश महापात्र कव्हर करेंगे.

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