सब धान बाइस पसेरी नहीं

जयंत जिज्ञासु | फेसबुक: योगेन्द्र यादव जी कई बार विचित्रतम विश्लेषण करते हैं. वो कांग्रेस-जेडीएस के पोस्ट पोल अलायंस को अनहोली अलायंस बता रहे हैं और दूसरी तरफ होर्स ट्रेडिंग के ख़तरे गिना रहे हैं. और कहते हैं कि कर्नाटक को तय करना है कि कौन ज़्यादा बुरा है.

योगेन्द्र जिस आदर्शवादी मन: स्थिति में जीते हैं, उसमें मुझे नहीं लगता कि उन्हें नहीं पता होगा कि जिस आम आदमी पार्टी के लिए एक वक़्त वो बैटिंग कर रहे थे, उसके जन्म के पीछे पूरी तरह आरएसएस का हाथ था. क्या यह सच नहीं है कि वो विचारधारा के गौण हो जाने को भी समकालीन राजनीति में बुरा नहीं मान रहे थे और बढ़चढ़ कर पोस्ट-आइडियोलॉजी एरा की बात कर रहे थे. गुड गवर्नेंस, डिवलपमेंट, आदि उनकी ज़बान पर चढ़ चुके थे, मगर अफर्मेटिव एक्शन को लेकर अक्सर वो रहस्यमयी चुप्पी ओढ़ लेते थे या गोल-गोल बातें करते थे.


बिहार में जब चुनाव हो रहे थे, तब भी इसी ज़हनियत के साथ टाइम्स अॉफ इंडिया में एक बड़ा ही विचित्र-सा आलेख लिखा. उनके तर्क कई बार भाजपा को बहुत सुट करते हैं. मुझे नहीं मालूम कि वो किस पैटर्न पर काम करते हैं, पर विकल्पहीन नहीं है दुनिया का ऐलान करने वाले किशन पटनायक का तो वह रास्ता बिल्कुल नहीं था जिसे वो केजरीवाल के साथ मिलकर तलाशने की जद्दोजहद कर रहे थे.

क्या उन्हें मालूम नहीं था कि आरक्षण और सामाजिक न्याय को लेकर केजरीवाल के ख़याल कितने वाहियात रहे हैं या फिर ख़ुद योगेन्द्र भी उसी सोच के थे और केजरीवाल को एंडोर्स करते हुए उन्हें मज़ा आ रहा था?

ख़ुद साबरमती ढाबे पर एक पब्लिक मीटिंग में जब उनसे आरक्षण पर एक सवाल किया तो उन्होंने लगभग नाकभौं सिकोड़ते हुए कहा कि आरक्षण एक अहम मुद्दा हो सकता है, पर एकमात्र मुद्दा नहीं. न जाने क्यों हमारे युवा आरक्षण के पीछे ही सारी ऊर्जा लगाए रहते हैं और बाक़ी मुद्दे गौण हो जाते हैं.

ऐसे जवाब के बाद उन्हें दोबारा जहमत देना मुझे उचित नहीं लगा. कुल मिला कर योगेन्द्र जी सुमधुरभाषी हैं, पर कई मौकों पर स्टैंड लेने के मामले में बहुत ढुलमुल और कदाचित कैलकुलेटिव. उन्हें अपना वह समाज बचा के रखना है जिसमें उन्हें दिनरात बैठना है और न जाने क्यों उससे उन्हें स्वीकार्यता चाहिए, बावजूद इसके कि वो अपने विषय के अद्भुत जानकार हैं और अपनी बात कहने के लिए उन्हें किसी बैसाखी की ज़रूरत नहीं. पर, वंचितों के सवालों पर वो छात्र जीवन में भी बचते-बचाते चलते रहे (ख़ुद उन्हीं की स्वीकारोक्ति है) और आज भी कमोबेश वही काम कर रहे हैं.

योगेन्द्र जी, सब धान बाइस पसेरी की मानसिकता ख़तरनाक है, आप युजीसी और नेशनल एडवाइजरी काउंसिल के भी मेंबर रहे हैं (शायद), और चीज़ों को क़रीब से देखा है, इसलिए थोड़ा ठीकठाक से दिल पर हाथ रखके चीज़ों को हमारे सामने परोसें. आप जैसे विवेकशील लोग बार-बार नहीं आते. अपनी बौद्धिकता का उपयोग थोड़ा उपेक्षित समाज के लिए भी कर लें, तो कोई हर्ज नहीं होना चाहिए.

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