करुणानिधि के पैंतरे की प्रतीक्षा

नई दिल्ली | संवाददाता: भारत सरकार संसद में श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश नहीं करेगी. दूसरी और करुणानिधि किसी भी हालत में अपना यह पैंतरा हाथ से नहीं जाने देना चाहते. लेकिन साथी दलों का तमिलों को पूरा समर्थन दिये जाने के बाद भी श्रीलंका के खिलाफ कोई नहीं जाना चाहता. राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि द्रमुक द्वारा समर्थन वापसी के बाद भी सरकार को कोई खतरा नहीं है और समाजवादी पार्टी का समर्थन सरकार को खतरे में नहीं डालेगा. ऐसे में केवल द्रमुक के कहने से ऐसा कोई प्रस्ताव सरकार लाने की हड़बड़ी नहीं करेगी. श्रीलंका में मानवाधिकार के उल्लंघन के मुद्दे पर संसद में प्रस्ताव लाने को लेकर सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक बेनतीजा रही. अब सबकी निगाहें इस बात पर लगी हुई हैं कि करुणानिधि का रुख क्या होता है. द्रमुक और अन्नाद्रमुक अपनी मांग पर अड़े हुये हैं.

गौरतलब है कि संसद में श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने के मुद्दे पर मनमोहन सिंह की सरकार ने बैठक बुलाई थी. इस सर्वदलीय बैठक में द्रमुक और अन्नाद्रमुक ने श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव लाने के विचार का समर्थन किया. जबकि समाजवादी पार्टी ने इस बात पर जोर दिया कि श्रीलंका पड़ोसी देश है और उसके खिलाफ कोई भी इस तरह का कार्रवाई ठीक नहीं होगी.


पार्टी के सांसद रेवती रमण सिंह ने कहा कि हम श्रीलंकाई तमिलों के साथ हैं लेकिन संसद में किसी प्रस्ताव की जरुरत नहीं है क्योंकि चीन के खिलाफ वर्ष 1962 के युद्ध में सिर्फ श्रीलंका ही हमारे साथ खड़ा था. उन्होंने कहा कि हमने हाल ही में अफजल गुरु पर पाकिस्तानी संसद के प्रस्ताव को खारिज किया है. हम एक मित्र देश के साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत को वही करना चाहिए, जो राष्ट्रीय हित में और श्रीलंका के तमिलों के हित में हो.

जदयू नेता शरद यादव ने कहा कि इस तरह का कोई भी निर्णय ठीक नहीं है. जनता पार्टी की नेता सुषमा स्वराज ने सवाल उठाया कि सभी दलों को एक ऐसे मुद्दे पर विचार करने के लिए बैठक में क्यों बुलाया गया, जो पूरी तरह से सरकार और द्रमुक के बीच का मामला है. उन्होंने कहा कि हमने कभी गतिरोध उत्पन्न नहीं किया. गतिरोध सरकार और द्रमुक के बीच है और वक्त आ गया है अब दोनों आपस में बैठ कर उसे सुलझाएं.

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