कहां गई फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’

रायपुर | संवाददाता: विद्याचरण शुक्ल के साथ ही फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ का किस्सा भी हमेशा-हमेशा के लिये खत्म हो गया. 25 मई को हुये नक्सली हमले में नक्सलियों की गोली के शिकार हुये विद्याचरण शुक्ल आपातकाल के दौर में सूचना प्रसारण मंत्री थे और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी के सबसे खासम खास. आपातकाल के उसी दौर में इंदिरा गांधी को लेकर सांसद अमृत नाहटा ने एक फिल्म बनाई थी- ‘किस्सा कुर्सी का’.

थोड़ी बातचीत इस फिल्म के निर्माण की. फिल्म के निर्माता अमृत नाहटा लिखते हैं- “दिल्ली में हमें न तो योग्य अभिनेत्रियाँ ही मिल पायीं और न ही एक युवा रोमांटिक चेहरा. हम बम्बई चले गये. FTII से ट्रेनिंग पायी हुयी शबाना आज़मी और रेहाना सुल्तान फिल्म में मुख्य भूमिकायें निभाने के लिये राजी हो गयीं. FTII से ही उसी समय पास होकर आने वाले आदिल में हमें फिल्म के लिये रोमांटिक चेहरा मिल गया. बम्बई में ही हमें एक अन्य चरित्र के लिये मनहर देसाई मिल गया और उसने अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया.


तकनीशियनों के मामले में हमें परेशानी नहीं थी और हमने तय कर लिया था कि FTII से ट्रेनिंग पाये हुये तकनीशियनों को ही हम अपनी फिल्म में लेंगे. लंच करते करते के.के महाजन ने कहानी सुनी और तुरंत फिल्म के लिये सिनेमेटोग्राफर बनने को राजी हो गया. देशपांडे, फिल्म का एडिटर, स्क्रिप्ट को आखिरी रुप देने के लिये हमारे साथ बैठा और उसने कुछ उल्लेखनीय सुझाव दिये. चतुर्वेदी ने साऊण्ड इंजीनियर का काम संभाला और बाबा, शिवेंद्र जी का सहायक बनने को राजी हो गया.

बहुत विचार-विमर्श के बाद हमने फिल्म के लिये एक थीम सॉंग निश्चित किया. फिल्म्स डिवीज़न के रघुनाथ सेठ, जिन्होने “फिर भी” में भी संगीत दिया था, हमारी फिल्म के संगीत निर्देशक बने. मैंने गीत के बोल लिखे और आशा भोसले और महेंद्र कपूर ने गीत को गाया. बहरहाल, सबसे बड़ी चुनौती थी फिल्म का स्तर और प्रभाव बनाये रखने के लिये एक उपयुक्त्त पार्श्व संगीत (बैक-ग्राऊण्ड म्यूजिक) तैयार करने की. रघुनाथ जी ने झिंझोड़ने वाला संगीत तैयार किया.

हमने तय किया था कि फिल्म में वास्तविकता का पुट लाने के लिये दिल्ली में ही शूटिंग की जायेगी. सौभाग्य से फोर्ड फाऊण्डेशन, कुतुब होटल और विज्ञान भवन की इमारतों में हमें उपयुक्त्त लोकेशंस मिल गयीं और इन स्थलों ने फिल्म को राजनीतिक रुप देने में पूरी सहायता की. दिल्ली में टीवी से जुड़े रावत के रुप में हमें एक बेहद परिश्रमी और कल्पनाशील आर्ट- डायरेक्टर मिल गया. शिवेंद्र जी बहुत बारीकी से सब पहलुओं पर निगाह रखते थे और रावन ने उनकी योजनाओं मूर्त रुप देने में कसर न छोड़ी.

1974 के जूलाई माह तक धन को छोड़कर सभी कुछ तैयार था. कोई भी ऐसी फिल्म को खरीदने या इसमें निवेश करने आगे नहीं आया. इस फिल्म में न सैक्स था, न क्राइम, न हिंसा, न रोमांस, न हॉरर, न मेलोड्रामा और न ही कोई फॉर्मूला. यह एक अव्यवसायिक किस्म की फिल्म थी जो वितरकों को केवल पूरी होने के पश्चात ही बेची जा सकती थी. न ही यह कला-फिल्म थी, अगर ऐसे शब्द से मतलब ऐसी फिल्म से हो जिसे इलीट वर्ग के ऊँचे दिमाग वाले चुनींदा दर्शक देखते हों. मैं इसे ऐसे माध्यम से बनाना चाहता था जो मैं जानता था कि बहुत शक्तिशाली है.

मैंने दोस्तों, रिश्तेदारों और परिचितों से धन उधार लिया. बिल्कुल हैंड-टू-माऊथ किस्म की शूटिंग थी हमारी फिल्म की. हालांकि हमारी फिल्म छोटे बजट की फिल्म थी तब भी मैं जितना हो सकता था और कम खर्चे में काम चलाने की कोशिश करता था. सारी यूनिट किराये पर लिये गये एक बंगले में ठहरी और वहीं सबके लिये किचन स्थापित की गयी. ईस्ट्मैनकलर में फिल्माने क बावजूद निगेटिव की लागत नौ लाख रुपये आयी. यह रकम किसी भी स्तर से बहुत कम थी. सभी ने पूरी तरह से सहयोग दिया. इतनी समर्पित टीम के साथ काम करना एक बहुत अच्छा अनुभव था.

कोई भी फिल्म वास्तव में एडिटिंग टेबल पर बनती है. शूटिंग तो अक्टुबर तक खत्म हो गयी थी लेकिन एडिटिंग, डबिंग, पार्श्व संगीत, मिक्सिंग और स्पेशल इफेक्ट्स आदि ने पांच महीनों से ज्यादा समय लिया.”

लेकिन फिल्म रिलीज होती, उससे पहले देश में आपातकाल लगा दिया गया. सेंसर बोर्ड ने फिल्म पर आपत्ति की. नाहटा अदालत गये. अदालत ने कहा कि प्रिंट को सरकार सुरक्षित रखे. लेकिन फिर जो कुछ हुआ, वह इतिहास है. इंदिरा गांधी की सरकार बदलने के बाद सूचना प्रसारण मंत्री बने लालकृष्ण आडवाणी को 29 मार्च 1977 को लिखा अमृत नाहटा का पत्र पूरी कहानी कह देता है.

बकौल नाहटा-“ मैंने 1974-75 में एक रंगीन फीचर फिल्म बनायी थी, जिसका नाम था “किस्सा कुर्सी का“. फिल्म इस थीम पर आधारित थी कि “कैसे अनैतिक राजनीतिज्ञ हमारे देश की गूँगी जनता के साथ बलात्कार करते हैं“. फिल्म सत्ता के भूखे राजनीतिज्ञों के तौर-तरीकों के ऊपर एक तीखा व्यंग्य थी. यह एक अव्यवसायिक श्रेणी की फिल्म थी और इसे बनाने का उद्देश्य मतदाताओं को जागरुक बनाना था. मैं इसे चेतना की फिल्म कहता हूँ.

19 अप्रैल 1975 को मैंने केन्द्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड, बम्बई के समक्ष फिल्म के प्रदर्शन हेतु प्रमाणपत्र देने के लिये आवेदन किया. पहले तो बोर्ड के कार्यकारी चेयरमैन ने इसे रिवाज़िंग कमेटी के सुपुर्द कर दिया और जब उसने पाया कि सदस्यों का बहुमत फिल्म को प्रदर्शन हेतु प्रमाणपत्र देने के पक्ष में था तो इस निम्न सोच के अधिकारी ने मेरी फिल्म को केन्द्रीय सरकार के पास भेज दिया.

ढ़ाई महीनों तक सूचना एवम प्रसारण मंत्रालय के अधिकारी मेरी फिल्म के ऊपर कुंडली मारे बैठे रहे. आखिरकार उन्होने मुझे 40 आपत्तियाँ बतायीं और मुझसे 11 जुलाई 1975 को उन आपत्तियों के जवाब देने को कहा. उनकी सारी आपत्तियाँ, अनर्गल, निराधार और बकवास किस्म की थीं. मैंने अपने जवाब 11 जुलाई 1975 को भेज दिये. मेरे जवाबों को बिना देखे ही संयुक्त्त सचिव ने उसी दिन मेरी फिल्म को प्रदशन के लिये प्रमाणपत्र न देने का आदेश जारी कर दिया.

इस बीच इमेरजैंसी लग चुकी थी. 14 जुलाई 1975 को मेरी फिल्म को अवांछित फिल्म घोषित कर दिया गया और DIR के अंतर्गत सरकार ने मेरी फिल्म को जब्त करने के आदेश दे दिये. मैं तुरंत सुप्रीम कोर्ट की शरण में गया और निवेदन किया कि सरकार को मेरी फिल्म जब्त करने से रोका जाये क्योंकि मुझे डर था कि मेरी फिल्म को नष्ट कर दिया जायेगा. 18 जुलाई 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने मुझे निर्देश दिये कि मै फिल्म, निगेटिव, और फिल्म से जुड़ी अन्य सामग्री सरकार को सौंप दूँ और कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिये कि मेरी फिल्म, निगेटिव और प्रिंट्स आदि को तब तक सुरक्षित रखा जाये जब तक कि सुनवाई पूरी नहीं हो जाती.

कुछ दिनों के बाद ट्रक में भर कर पुलिस वाले आये और बॉम्बे फिल्म्स लेबोरेटरी प्राइवेट लिमिटेड की इमारत पर रेड डालकर मेरी फिल्म, उसके निगेटिव, साऊण्ड ट्रैक, रशेज प्रिंट्स और यहाँ तक कि एडिटर द्वारा काटकर कर अलग फेंकी गयी बेकार फिल्म और अन्य सब कुछ अपने साथ ले गये.

29 अक्टुबर 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिये कि उसके सामने फिल्म का प्रदर्शन किया जाये. फिल्म की स्क्रीनिंग के लिये 17 नवम्बर 1975 की तारीख दी गयी. इस तारीख से दो हफ़्ते पहले ही सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि सरकार के पास मौजूद फिल्म का एकमात्र पॉजीटिव प्रिंट गायब है और इसलिये सुप्रीम कोर्ट के समक्ष फिल्म का प्रदर्शन किया जाना संभव नहीं है.

3 जनवरी 1976 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिये कि प्रिंट की तलाश की जाये और अगर प्रिंट नहीं मिल पाता है तो निगेटिव से प्रिंट बनवाकर कोर्ट के समक्ष फिल्म का प्रदर्शन किया जाना चाहिये.

22 मार्च 1976 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि फिल्म का निगेटिव भी गायब है.

सूचना एवम प्रसारण मंत्रालय की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया गया प्रत्येक हलफनामा झूठ का पुलिंदामात्र था. सबसे बड़ी बात यह है कि अगर फिल्म का प्रिंट और निगेटिव दोनों ही गायब हो गये थे तो यह न केवल सरकार की लापरवाही दिखाता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना की और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना भी की.

यह पूरा ऑपरेशन क्रूरता, जबरदस्ती, और गैरकानूनी गतिविधियों से भरा था और ऐसी ही घटनाओं से इमेरजैंसी का पूरा काल सराबोर रहा है. मेरी फिल्म के साथ घटित यह बताता है कि कैसे कला के क्षेत्र में भी रचनात्मक स्वतंत्रता को कुचला गया.

आप शायद इस बात से अवगत हों कि हाल ही में सम्पन्न हुये चुनावों में मेरी फिल्म का मुद्दा बड़े जोर शोर से उछला था और प्रैस, और जननेताओं ने इस मसले को जोर देकर उठाया.

मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि श्रीमति इंदिरा गाँधी और उनके अधिनस्थ श्री विद्या चरण शुक्ल द्वारा किये गये मेरे प्रति अन्याय का प्रतिकार किया जाये.

मेरी आपसे विनती है कि मेरी फिल्म का प्रिंट, इसका निगेटिव, साऊण्ड ट्रैक, और मेरी फिल्म से जुड़ी अन्य सामग्री, जो कि केंद्र सरकार ने जब्त कर ली थी, मुझे वापिस कर दी जाये, ताकि मैं अपनी फिल्म कम से कम अब प्रदर्शित कर सकूँ.

हालाँकि मुझे आशंका है कि मेरी फिल्म से जुड़ी सभी सामग्रियाँ, श्रीमति गाँधी के व्यक्तिगत निर्देश पर पहले ही नष्ट की जा चुकी हैं. यदि मेरी आशंका सच साबित होती है तो रचनात्मक स्वतंत्रता के खिलाफ इससे बड़ा जुर्म और कोई नहीं हो सकता. इस दशा में मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि एक उच्च स्तरीय जाँच की जाये जो कि निष्पक्ष ढ़ंग से मेरी फिल्म के मामले की जांच करे, और इस जघन्य अपराध करने वालों की जवाबदेही तय करे, दोषियों को उचित सजा निश्चित करे और मुझे हुये नुकसान की भरपाई के लिये उचित मुआवजा तय करे.”

बहरहाल 1977 में जनता पार्टी की टिकट पर संसद पहुंचे अमृत नाहटा की शिकायतों के आदार पर आडवाणी ने यह मामला सीबीआई के संयुक्त निर्देशक निर्मल कुमार सिंह को सौंप दिया, जिनकी रिपोर्ट के बाद संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल के खिलाफ मामला दर्ज किया गया. सत्र न्यायालय ने दोनों को जुर्माना एवं सजा सुनाई. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. लेकिन तब तक मोरारजी देसाई पीएम पद को अलविदा कह चुके थे और चौधरी चरण सिंह कांग्रेस के समर्थन से पीएम के पद पर काबिज थे. दृश्य बदल चुका था और बदले हुये दृश्य में अमृत नाहटा सुप्रीम कोर्ट में अपने आरोपों से ही पलट गये. जाहिर है, संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल दोनों को बाइज्जत बरी कर दिया गया. हालांकि समय-समय पर यह बात उठती रही कि ‘किस्सा कुर्सी का’ के प्रिंट आज भी कहीं सुरक्षित हैं.

23 जून 1980 को संजय गांधी एक दुर्घटना में मारे गये. दो बार कांग्रेस और एक बार जनता पार्टी से सांसद बने अमृत नाहटा ने 73 साल की उम्र में 26 अप्रैल 2001 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया और विद्याचरण शुक्ल 25 मई 2013 को नक्सली हमले में घायल होने के बाद 11 जून 2013 को जिंदगी की जंग हार गये.

लेकिन जो बात राज रह गई, वह यह कि किस्सा कुर्सी का फिल्म के प्रिंट क्या कहीं सुरक्षित बचे हुये थे?

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