उत्तराखंड के सबक

उत्तराखंड में हरीश रावत ‘आफ्टर द ब्रेक’ मुख्यमंत्री पद संभालने जा रहे हैं. सर्वोच्च अदालत ने विधानसभा में बहुमत साबित होने के बाद कांग्रेस की तकदीर का फैसला कर दिया है. राज्य की कमान रावत के हाथ में ही रहेगी. अभी कांग्रेस के बागी 9 विधायकों पर फैसला हालांकि नहीं आया है. अदालत जुलाई में उस पर फैसला लेगी, लेकिन अब कांग्रेस की रावत सरकार पर कोई संकट नहीं है.

जिस केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की थी. उसी ने फिर महामहिम से अपने ही फैसले को बदलने की सिफारिश भेजी है. यह कैसी बिडंबना है!


सबसे बड़ा सवाल लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसकी आत्मा के साथ संवैधानिक अधिकारों का है. राजनीति की इस घिनौनी साजिश ने लोकतंत्र को बेनकाब किया है. दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था का तमगा हासिल करने वाली हमारी लोक और संवैधानिक व्यवस्था पर गहरा हथौड़ा चला है.

यह हथौड़ा क्यों चला, किसने चलाया? चलाने वाले हाथ चाहे भाजपा के हों या कांग्रेस के, कोई फर्क नहीं. यहां बहस का मसला राजनैतिक महत्वाकांक्षा और संवैधानिक अधिकारों का है.

50 दिन से अधिक चले इस नंगे नाच में किसको क्या मिला, यह तो विश्लेषण का विषय है, लेकिन सबसे अधिक लोकतंत्र और आम जनता का नुकसान हुआ है. उत्तराखंड में राजनीति ने लोकतंत्र का खुलेआम चीरहरण किया. लोकतंत्र कराह रहा था और उसका चीरहरण किया जा रहा था. इसे बेजह अदालत के चौखट पर घसीटा गया. बेगुनाह होते हुए भी इसे अदालत में अपनी बेगुनाही साबित करनी पड़ी.

भला हो उस सर्वोच्च अदालत का, जिसकी ओर से लोकतांत्रितक व्यवस्था और गरिमा का पूरा खयाल और सम्मान रखा गया. सियासत के इस गंदे खेल में कौन हंस और कौन कौवा की पहचान आखिर उसी व्यवस्था के तहत हुई जिसकी नींव 28 मार्च को राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति को अगवगत कराई गई थी.

सर्वोच्च अदालत ने जिस बात को 10 मई को साबित किया, उसी बात को उत्तराखंड का सदन 28 मार्च को ही करता, लेकिन इस ‘राजनीतिक नौटंकी’ का अभिप्राय क्या निकला, यह करनेवाले ही जानें.

लोक व्यवस्था के इतिहास में उत्तराखंड की राजनैतिक घटना हमें सबक देती है. जब राज्यपाल की तरफ से हरीश रावत सरकार को बहुमत सिद्ध करने का समय दिया गया था, उसके पहले ही केंद्रीय मंत्रिमंडल 27 मार्च को राष्ट्रपति शासन की सिफारिश क्यों की? मोदी सरकार की इस जल्दबाजी ने महामहिम के अधिकार और संवैधानिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया.

अदालत के इस फैसले से कहीं न कहीं से महामहिम भी चोटिल हुए होंगे. यह फैसला उन्हें भी कहीं न कहीं से नैतिक रूप से विचलित किया होगा, क्योंकि नैनीताल उच्च न्यायलय ने भी एक टिप्पणी की थी जिसके कोर्ट में कहा था कि राष्ट्रपति से भी गलती हो सकती है.

निश्चित तौर पर कोर्ट की इस टिप्पणी का कोई गहरा मतलब था. हलांकि हामहिम चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते थे. अगर वे केंद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले पर सवाल उठाते तो उनकी भी राजनैतिक नुक्ताचीनी होती, क्योंकि महामहिम कांग्रेसी पृष्ठभूमि से हैं. उस स्थिति में सरकार और महामहिम के अधिकारों के बीच टकराव होता.

दूसरी बात कि केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश को वे टाल भी नहीं सकते थे, क्योंकि उनके अधिकार सीमित हैं. इसका नतीजा था कि मंत्रिमंडल के फैसले पर उन्होंने अपनी मोहर लगा दी.

निश्चित तौर पर इसके पीछे भाजपा की राजनैतिक महत्वाकांक्षा थी. क्योंकि कांग्रेस के सभी बागी विधायकों और भाजपा के बीच सरकार बनाने का रास्ता साफ हो चुका था. जिस तरह राज्य भाजपा नेताओं न के साथ बागी कांग्रेस विधायक देखे गए और सीधे दिल्ली की उड़ान भरी, उससे यह साफ हो गया था कि रावत सरकार के पतन के बाद राज्य में भाजपा सत्ता की कमान संभाल सकती है.

लेकिन विधाता और न्याय को कुछ और ही मंजूर था. बागियों की साजिश नाकाम हो गई और विधायिका की सदस्यता से वे खुद हाथ धो बैठे. हालांकि अभी बागियों पर अदालत का फैसला आना है.

राज्य में इस राजनीतिक नौटंकी की कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि राज्य में ठीक आठ माह बाद चुनाव होना है. ऐसी स्थिति में किसी सरकार के बनने और बिगड़ने का क्या मतलब था? लेकिन मोदी सरकार की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने जिस तरह लोकतंत्र का गला घोंटा, उसे कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता.

आंकड़ों के इस खेल में जय और पराजय जिस किसी की हुई, लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान उत्तराखंड की आम जनता और उसके विकास का हुआ है. उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग राज्य को बर्बाद कर रही थी, इधर सियासी खेल खेला जा रहा था.

चारधाम यात्रा प्रारंभ हो गई है, लेकिन वहां सरकार नाम की कोई चीज नहीं थी. जबकि राज्य तीन साल पूर्व कितनी भयावह प्राकृतिक त्रासदी झेल चुका है. राजनीति को अपना सर्वोपरि धर्म मानने वाले धर्मियों की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

अब उन बागियों का क्या होगा? जाहिर सी बात है, बेचारे बागियों को काफी छटपटाहट होगी. अपने किए पर पछता रहे होंगे. बेचारों की अनायास कुर्सी चली गई. अभी उनके पास आठ माह का वक्त था. तब तक रुतबा कायम रहता, लेकिन अब क्या करेंगे? भाजपा का दामन थामने के सिवाय उनके पास बचा ही क्या है.

उत्तराखंड की जनता क्या इन बागियों को सबक सिखाएगी? जिन लोगों ने राज्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था को खाई में ढकेलने का षड्यंत्र रचा, क्या उसका दंड उन्हें मिलेगा? संभवत: ऐसा होने से रहा.

हमें दुख है कि उत्तराखंड में जीत कर भी लोकतंत्र हार गया. इस घटना से सबक लेने की आवश्यकता है. कम से कम अब ऐसा नहीं होना चाहिए. लोकतांत्रिक व्यवस्था से चुनी गई सरकारों को काम करने का पूरा मौका दिया जाना चाहिए. दलबदल कानून को और प्रभावी बनाया जाना चाहिए.

केंद्र और राज्य के संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने की जरुरत है. हितों के टकराव से व्यवस्था की बलि नहीं होनी चाहिए. संवैधानिक मर्यादा और लोकतांत्रित व्यवस्था में सभी को काम करने का अधिकार होना चाहिए. लोकतांत्रित व्यवस्था में साम्राज्यवादी और सत्ता विस्तारवादी नीति का अंकुरण नहीं होना चाहिए. यह लोकतंत्र के लिए घातक है.

लोकतंत्रात्मक प्रणाली में विस्तारवादी नीति का नहीं विकासवादी नीति का महत्व होना चाहिए. यहीं सभ्य और संवैधानिक व्यवस्था वाले लोकतंत्रात्मक प्रणाली के लिए शुभ संकेत है. अब वक्त आ गया है, जब इस घटना से सबक लेते हुए हमें राजनीति की दिशा बदलने की जरूरत है.

हमें राज्य-विस्तारवादी नीति में कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखना बंद करना चाहिए. अगर यह जरूरी है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के जरिए देखिए, जिसमें किसी के खोने या डूब जाने का डर न हो. वह चाहे लोकतंत्र हो या संविधान.(एजेंसी)

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