किसान खुदकुशी और 50 लाख का कृषि गान!

भोपाल | समाचार डेस्क: बहुत पहले से सुनते आ रहे हैं कि जब रोम जल रहा था तो सम्राट नीरो बांसुरी बजा रहा था. और जब फ्रांस की जनता को रोटी के लाले पडे हुए थे तो वहां की रानी ने उन्हें केक या पेस्ट्री खाने की सलाह दे डाली थी. उसी तरह से मध्य प्रदेश में एक ओर किसान कर्ज न चुका पाने के बाद अपने बच्चे गिरवी रखने को मजबूर हैं तथा आत्महत्या कर रहें हैं वहीं, शिवराज सरकार 50 लाख रुपयों से कृषि गान तैयार करवा रही है. जाहिर है कि किसान इस कृषि गान को सुनकर अपनी व्यथा भूलने से रहें. जनता की गाढ़ी कमाई के पैसों से यदि कृषि गान के लिये 50 लाख रुपयों का भुगतान किया जाता है तो सवाल करने का मन करता है कि इस रुपयों से कितने आत्महत्या की कगार पर पहुंच चुके किसानों की जान बचाई जा सकती थी. मध्य प्रदेश में किसान बदहाल हैं, कोई बच्चे गिरवी रख रहा है तो कोई कर्ज और फसल चौपट होने से आत्महत्या जैसे कदम उठाने से नहीं हिचक रहा है, वहीं राज्य की शिवराज सरकार ‘कृषि महोत्सव’ मनाने में लगी है. इतना ही नहीं, भाजपा सरकार ने सिर्फ ‘कृषि गान’ पर 50 लाख रुपये खर्च कर दिए गए हैं.

एक किसान नेता ने तो यहां तक कहा दिया है कि सरकार 72 किसानों की मौतों का जश्न मना रही है.


राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार लगातार खेती को फायदे का धंधा बनाने के दावे करती आ रही है, इसके लिए उसने कई योजनाएं अमल में लाई हैं, शून्य प्रतिशत पर किसानों को कर्ज दिया जा रहा है, सरकार का दावा है कि सिंचाई रकबा भी बढ़ा है, गेहूं की पैदावार में भी इजाफा हुआ है.

एक तरफ जहां सरकार किसानों को सुविधाएं देने का दावा और वादा करती है, वहीं यह भी सच है कि किसानों को अपनी उपज का पूरा दाम नहीं मिल रहा है, फसल की बर्बादी पर मुआवजा ‘ऊंट के मुंह मे जीरे’ के समान है. किसानों को गेहूं पर मिलने वाला बोनस भी बंद कर दिया गया है. फसल की बर्बादी और कर्ज के बोझ से परेशान होकर अन्नदाताओं की आत्महत्या के मामले हर बार की तरह इस साल भी लगातार आ रहे हैं.

किसानों की बर्बादी और बदहाली को बयां करने के लिए खरगोन के मोहनपुरा के किसान लल्लू सिंह ही काफी हैं, जिन्होंने खेत की सिंचाई के लिए पंप खरीदने के लिए कर्ज लेकर अमानत के तौर पर दो बेटों को मवेशी चराने वाले के पास गिरवी रख दिया था. इतना ही नहीं, किसानों की आत्महत्या की खबरें आना आम है.

राज्य में सोमवार से कृषि महोत्सव की शुरुआत हुई, पूरे प्रदेश में यह महोत्सव 15 जून तक मनाया जाएगा. इस दौरान कृषि क्रांति रथ घूमेंगे तो रंगारंग कार्यक्रम भी होंगे. राज्य में खेती के क्षेत्र में आए बदलाव और किसानों में आई खुशहाली को बयां करने के लिए ‘कृषि गान’ तैयार कराया गया है. इसे बॉलीवुड के गायक शंकर महादेवन एवं गायक समूह ने स्वर दिया है.

कृषि गान तैयार कराने को जिम्मा एडफैक्टर पीआर कंपनी को दिया गया है. इस गीत के एवज में महादेवन ग्रुप को 50 लाख रुपये भुगतान किया जाना तय हुआ है. इस गीत को महेश श्रीवास्तव ने लिखा है. उनका कहना है कि उन्होंने सिर्फ गीत लिखा है, इसके गायक को कितनी राशि दी गई है, इससे उनका कोई वास्ता नहीं है, एडफैक्टर कंपनी से उनकी बात गीत के स्वर व ताल को लेकर जरूर हुई थी.

राज्य में शुरू हुए कृषि महोत्सव को लेकर किसान नेता शिवकुमार शर्मा ‘कक्काजी’ गुस्से में हैं. उन्होंने कहा कि कृषि महोत्सव के जरिए सरकार 72 किसानों की मौतों का जश्न मना रही है. किसानों से खाद्यान्न की खरीदी में टैक्स के रूप में मंडी को मिली राशि इस आयोजन में खर्च किया जा रहा है.

उन्होंने कहा, “यह कैसी सरकार है कि उसके राज्य का किसान मर रहा है और वह उत्सव मनाने के साथ एक गाने पर 50 लाख रुपये खर्च कर रही है.”

एडफैक्टर पीआर कंपनी के वाइस प्रेसीडेंट तुषार पांचाल ने कहा, “यह बात सही है कि इस गीत की रिकार्डिग हमारी कंपनी के जरिए हुई है, हमने फैसीलिटेड किया है. इसमें हमारी भूमिका कंसल्टेंट की है, हमारा काम बायर और सेलर से संपर्क करना होता है.”

जब उनसे पूछा गया कि क्या इस गीत की रिकार्डिग पर शंकर महादेवन को 50 लाख रुपये दिए गए हैं? तो उनका जवाब था, “मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता, इसके लिए जनसंपर्क आयुक्त या जनसंपर्क विभाग के उपक्रम ‘माध्यम’ से पूछिए.”

जनसंपर्क आयुक्त एस.के. मिश्रा ने कहा, “कृषि गान शंकर महादेवन के ग्रुप ने गाया. इस ग्रुप को रकम का भुगतान कर दिया गया है. पूरी रकम कितनी दी गई है, मुझे याद नहीं है.”

किसानों की बदहाली के बीच कृषि महोत्सव मनाकर सरकार भले ही ‘किसान हितैषी’ होने का दावा करे, लेकिन परेशान किसानों के कानों में जब ‘कृषि गान’ के शब्द पहुंचेंगे, तब उनका ठीक वैसा ही हाल होगा, जैसा मातमी घर के बाहर से बारात के गुजरने पर होता है.

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