मप्र: शिवराज राज में घट गईं भांजिया!

भोपाल | समाचार डेस्क: मध्यप्रदेश में बच्चों के मामा शिवराज के राज में उऩकी भांजियों की संख्या घटती जा रही है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 4 के अनुसार मध्यप्रदेश में लड़कियों का अनुपात पहले की तुलना में घटा है. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पहचान भले ही बालिका जन्म को प्रोत्साहित करने के लिए कई योजनाएं चलाने वाले राजनेता की हो, मगर इन योजनाओं के बावजूद राज्य में लिंगानुपात की स्थिति में सुधार नहीं आया है, बल्कि इस मामले में हालत और बदतर हुई है.

शिवराज के 10 वर्ष के शासनकाल में बालिकाओं के अनुपात में 33 अंकों की गिरावट आई है.


राज्य में भारतीय जनता पार्टी वर्ष 2003 में सत्ता में आई थी और शिवराज के हाथ में राज्य की कमान वर्ष 2005 में आई थी. भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने वर्ष 2005-06 में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-3 किया था, उस समय राज्य में बालक लिंगानुपात (जन्म से पांच वर्ष तक) प्रति हजार में 960 बालिकाएं थीं.

सत्ता में आने के बाद शिवराज ने राज्य में बालिका जन्म को प्रोत्साहित करने लिए लाड़ली लक्ष्मी योजना, लाड़ो योजना, मुख्यमंत्री साइकिल योजना, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना, निकाह योजना आदि को अमली जामा पहनाया गया. ये योजनाएं बालिका के जन्म से लेकर जीवनर्पयत के लिए हैं.

इन योजनाओं के कारण ही राज्य में शिवराज की पहचान बालिकाओं के ‘मामा’ और महिलाओं के ‘भाई’ की बन गई.

राज्य सरकार की ओर से इन योजनाओं को इस तरह से प्रचारित किया गया कि समाज का नजरिया बदल जाए और लिंगानुपात में सुधार आए.

शिवराज के शासनकाल को 10 वर्ष पूरे हो गए हैं. इस दौरान स्वास्थ्य मंत्रालय का वर्ष 2015-16 का एनएफएएचएस-चार सार्वजनिक हुआ है. यह राज्य में बालिकाओं की स्थिति को उजागर करने वाला है.

यह सर्वेक्षण बताता है कि राज्य में बालिका लिंगानुपात बीते दस वर्षो में 960 से घटकर 927 प्रति हजार रह गया है. इस तरह शिवराज के कार्यकाल में 10 वर्षो में बालिकाओं की संख्या में प्रति हजार 33 अंकों की गिरावट आई है.

एक तरफ जहां बालिका लिंगानुपात में गिरावट आई है, वहीं कुल आबादी में महिलाओं की संख्या भी बीते 10 वर्षो में कम हुई है. वर्ष 2005-06 में यह 961 प्रति हजार हुआ करती थी, जो 2015-16 में घटकर 948 रह गई है. इस तरह महिलाओं की संख्या में 13 अंकों की गिरावट आई है.

एनएफएचएस-4 इस बात का भी खुलासा करता है कि महिला लिंगानुपात और बालिका लिंगानुपात की स्थिति शहरी इलाकों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में ज्यादा बेहतर है. शहरी इलाकों में जहां प्रति हजार 899 बालिकाएं हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा 937 है. इसी तरह महिलाओं की संख्या शहरी क्षेत्र में प्रति हजार 933 है, तो ग्रामीण क्षेत्र में यह संख्या 955 प्रति हजार है.

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी किया गया सर्वेक्षण एकेडमी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज और इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मेनेजमेंट रिसर्च ने 29 जनवरी से 24 जुलाई 2015 के मध्य किया था. इसके लिए कुल 52 हजार 042 घरों (हाउस होल्ड) की 62 हजार 803 महिलाओं और 9510 पुरुषों से संपर्क किया गया.

यहां बताना लाजिमी होगा कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च को मुख्यमंत्री शिवराज ने अपने ब्लॉग और महिला व बाल विकास मंत्री माया सिंह ने एक आलेख के जरिए यह बताया था कि ‘राज्य में बालिकाओं और महिलाओं की स्थिति सुधर रही है, उनका मान सम्मान बढ़ा है, लिंगानुपात में भी सुधार आया है’, मगर एनएफएचएस-चार कुछ और ही कहानी कह रहा है.

महिलाओं और बालिकाओं की संख्या में आई गिरावट के एनएफएचएस-4 के ये आंकड़े सरकार को सचेत करने वाले हैं, क्योंकि इन दिनों राज्य सरकार अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस से एक सप्ताह तक कार्यक्रम आयोजित कर रही है, जो बालिका जन्म को प्रोत्साहित करने वाली योजनाओं की एक दशक की उपलब्धियों पर केंद्रित हैं.

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