एनसीपी के कारण शिवसेना विपक्ष में

मुंबई | एजेंसी: महाराष्ट्र में एनसीपी ने जो दांव खेला है उससे शिवसेना विपक्ष में बैठने को मजबूर है. हालांकि शिवसेना के विधायकों को कितने दिनों तक विपक्ष में बैठना पड़ेगा यह सब कुछ निर्भर करता है उसके भाजपा के साथ चल रहे मोल-भाव पर. इतना जरूर है कि महाराष्ट्र के राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार ने शिवसेना की भाजपा से सौदेबाजी की क्षमता को कम कर दिया है. यह दिगर बात है कि इसमें एनसीपी को भी अपना फायदा नजर आ रहा है.

एनसीपी ने महाराष्ट्र में स्थिर सरकार देने के नाम पर भाजपा को बाहर से समर्थन की घोषणा की थी. जाहिर है कि इससे भाजपा को बहुमत सिद्ध करने में कोई परेशानी नहीं होने जा रही है. उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र में भाजपा की देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली अल्पमत सरकार के विश्वास मत साबित करने से मात्र दो दिन पहले उसकी पूर्व सहयोगी शिवसेना ने विपक्ष में बैठने का फैसला लिया है. फडणवीस सरकार को हालांकि अभी कोई खतरा नहीं है, क्योंकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने राज्य को राजनीतिक अस्थिरता से बचाने के लिए वोटिंग की स्थिति में 41 विधायकों के साथ भाजपा सरकार को बिना शर्त समर्थन देने का फैसला लिया है.


शिवसेना की नीति की घोषणा करते हुए पार्टी प्रवक्ता नीलम गोर्हे ने कहा, “हमने विधानसभा सचिवालय को इस आशय के संबंध में शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे का हस्ताक्षर किया हुआ एक पत्र भेजा है. उस पत्र में हमने मांग की है कि विधानसभा में पार्टी के नेता एकनाथ शिंदे का नाम नेता विपक्ष के तौर पर घोषित किया जाए.”

उन्होंने साथ ही कहा कि शिवसेना ने यह दावा 287 सदस्यों वाली विधानसभा में 67 विधायकों के साथ दूसरे नंबर की पार्टी के आधार पर की है. राज्य विधानसभा में कांग्रेस के पास 42 विधायक हैं वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के पास 41 विधायक हैं.

हाल ही में एक विधायक की मृत्यु होने के कारण विधानसभा में भाजपा 121 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है. साथ ही उसे अपने गठबंधन की घटक राष्ट्रीय समाज पार्टी के एक विधायक का समर्थन प्राप्त है.

शिवसेना का यह फैसला तब आया है जब रविवार को उद्धव ने भाजपा को विश्वास मत साबित करने के लिए एनसीपी का समर्थन न लेने की घोषणा करने के लिए दो दिनों का समय दिया था.

राजस्व मंत्री एकनाथ खडसे ने हालांकि, उम्मीद जताई कि भाजपा न केवल विश्वास मत साबित करने में सफल होगी बल्कि वह अपनी सरकार के पांच साल भी पूरे करेगी.

आने वाले रविवार को 144 विधायकों के समर्थन की बात पर खडसे ने कहा, “यह शिवसेना का फैसला है..हमें किसी बात की चिंता नहीं है क्योंकि उनके कई विधायक पहले ही हमें समर्थन देने की बात कह चुके हैं. एक सुरक्षित बहुमत पाने के लिए हमारे पास कई विधायकों का समर्थन है.”

इससे पहले दिन में गोर्हे ने यह कहते हुए पार्टी का रुख साफ कर दिया था कि भाजपा के साथ सरकार सत्ता में साझेदारी और अन्य लंबित मामलों पर बातचीत ठप कर दी गई है.

सोमवार को शुरू हुए महाराष्ट्र विधानसभा के तीन दिवसीय सत्र में शिवसेना के सभी 63 विधायक पारंपरिक नारंगी रंग की पगड़ी पहनकर विधानभवन पहुंचे. सदन में वह नारे लगा रहे थे और प्रतीकात्मक तौर पर उन्होंने विपक्ष की सीटों पर कब्जा कर लिया.

इसके अलावा शिवसेना ने सदन के अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी पेश करने का भी फैसला लिया है, जिसका चुनाव बुधवार को विश्वास मत साबित करने से पहले होगा.

शिवसेना के इस कदम पर एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए दोहराया कि राज्य में दोबारा चुनाव न हो, इसलिए राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने के लिए वह अपनी तरफ से भाजपा को बिना शर्त समर्थन देंगे.

पवार ने कहा, “हम सरकार को अस्थिर नहीं करना चाहते. हम राज्य में एक स्थिर सरकार चाहते हैं. एनसीपी विधायक उचित समय पर कोई निर्णय लेंगे कि किसके पक्ष में वोट देना है या नहीं.” उन्होंने कहा कि सरकार के अस्तित्व के लिए एनसीपी महत्वपूर्ण है.

पवार ने यहां अपराह्न् में मीडिया को संबोधित करते कहा कि किसका समर्थन करना है, किसका नहीं, इसके लिए उन्हें किसी की सलाह की जरूरत नहीं है. पवार का इशारा शिवसेना की तरफ था.

उन्होंने कहा, “हमें कोई भी यह सलाह नहीं दे सकता कि हमें किसे वोट देना चाहिए, किसे नहीं देना चाहिए. हम महाराष्ट्र में राजनीतिक स्थिरता के लिए इस सरकार का समर्थन कर रहे हैं. इसका अर्थ यह नहीं कि हम उन्हें सभी मुद्दों पर समर्थन देंगे.”

पवार का समर्थन पर यह बयान भाजपा के लिए और शर्मसार करने वाला है, क्योंकि शिवसेना पहले उससे खफा है और उसने चेतावनी तक दे डाली है कि यदि विश्वासमत जीतने के लिए 12 नवंबर को एनसीपी का समर्थन लिया तो वह विपक्ष में बैठना पसंद करेगी. इस बात के भी आसार हैं कि एनसीपी मतदान में भाग न लेकर भाजपा के लिये बहुमत साबित करने में मदद करें.

कुल मिलाकर भाजपा ने चुनाव के पहले शिवसेना की मांग न मानकर उसे जो झटका दिया था, एनसीपी का चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद दिये जाने वाले झटका शिवसेना को बड़ा महंगा पड़ रहा है.

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