यह उम्मीद अभी बाकि है…

सुरेश महापात्र | दंतेवाड़ा: बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा अपने निवास पर अपनी एक तस्वीर टांग रखी थी जिस पर लिखा था ‘युद्ध अभी खत्म हुआ नहीं, जग अभी जीता नहीं और मैं अभी हारा नहीं.’ वे कहते थे- योद्धा कभी नहीं मरते. बस यह याद रखने की बात है. आज से ठीक एक बरस पहले बस्तर के सपूत कर्म योद्धा महेंद्र कर्मा माओवादियों के हमले का शिकार हो गए.

आखिरकार एक-एक दिन कर गुजरते हुए पूरा एक बरस गुजर गया. बीते एक बरस में न कोई सीख न सबक. जिन माओवादियों के खिलाफ महेंद्र कर्मा ने बस्तर में आवाज बुलंद कर रखी थी, सीधे सामना को तैयार थे. उनकी शहादत ने बस्तर की आबो हवा को झकझोर कर रख दिया है. बीते बरस 25 मई को दरभा-झीरम घाट पर कांग्रेस के काफिले में माओवादियों के हमले में कांग्रेस के नेताओं, जवानों और आम लोगों की मौत की कहानी माओवादियों ने लिखी थी. जाबांज महेंद्र कर्मा ने अपने साथियों की जान बचाने की खातिर खुद होकर सीने पर गोलियां खाना अपने नसीब किया. इस हमले में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, वरिष्ठ कांगे्रस नेता विद्याचरण शुक्ल समेत कुल 32 लोगों की शहादत गिनी गई.


अविभाजित बस्तर के वरिष्ठ आदिवासी नेता होने के नाते महेंद्र कर्मा ने बस्तर की खातिर हमेशा एक नई तरह की राजनीति की रेखा खींची. इस रेखा के भीतर आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच न तो कोई दूरी थी और न ही ऐसा भाव. बस्तर के औद्योगिक विकास के पक्षधर होने के कारण भी वे ऐसी तमाम राजनीतिक दलों और संगठनों के निशाने पर रहे, जो इसका विरोध करते थे.

सीपीआई की राजनीति से निकलकर बस्तर में कांग्रेस राजनीति के शिखर पर पहुंचने वाले नेताओं में महेंद्र कर्मा सबसे ज्यादा लोकप्रिय रहे. वे अपने समय में अरविंद नेताम और मानकूराम सोढ़ी के राजनीतिक तिलस्म को भेद कर अपनी अलग जगह बनाने में कामयाब हो सके.

प्रखर वक्ता, प्रखर नेता और उससे ऊपर सजग नागरिक की भूमिका में स्व. कर्मा ने बस्तर को हमेशा मजबूत करने पर बल दिया. 1990 के दशक में माओवादियों के खिलाफ पहला जन जागरण अभियान चलाया. इस अभियान के माध्यम से बस्तर को माओवादियों के विचारों से अवगत कराते हुए हित-अहित की चिंता करना सिखाया. कुछ समय बाद यह अभियान बंद हो गया. पर माओवादियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने के कारण कर्मा दुश्मन नंबर एक घोषित हो गए.

पहले जन जागरण अभियान में शामिल करीब-करीब सभी नेताओं को माओवादियों ने मौत के घाट उतार दिया था. इसके बाद 2004 में दक्षिण बस्तर में एक बार फिर माओवादियों के खिलाफ जन सैलाब उठ खड़ा हुआ. इसकी अगुवाई करने के लिए कोई नेता तैयार नहीं था. छत्तीसगढ़ में प्रतिपक्ष के नेता होते हुए भी महेंद्र कर्मा ने इसे राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाए क्षेत्र हित में इस अभियान का नेतृत्व किया.

सलवा जुड़ूम अभियान में सीधे जुड़कर अपनी ही पार्टी का विरोध सहते हुए भी स्व. कर्मा अपने हथियार डालने के बजाए ज्यादा मुखर हुए. जन सैलाब के साथ पदयात्रा कर सभाएं ली और लोगों को माओवादियों से होने वाले नुकसान के प्रति आगाह करना जारी रखा.

यही वजह थी कि माओवादी महेंद्र कर्मा पर हमले की रणनीति पर लगातार काम करते रहे. माओवादी अपने विरोधी व बस्तर की इस बुलंद आवाज को हमेशा के लिए खामोश कर देना चाहते थे. स्व. कर्मा हमेशा कहते थे कि ‘मैं जब घर से निकलता हूं तो यह सोचकर निकलता हूं कि सकुशल लौट आया तो मेरी किस्मत!’ यानी वे जानते थे कि जिस संगठन के खिलाफ उनका संघर्ष जारी है वह कितना जानलेवा है.

सरकार ने महेंद्र कर्मा पर माओवादियों के हमले के अंदेशे को देखते हुए जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की थी. जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा के बावजूद माओवादी बस्तर के कद्दावर आदिवासी नेता और माओवादियों के प्रखर विरोधी महेंद्र कर्मा की सुरक्षा घेरा को तोड़कर हमला करने में सफल हो गये. सुरक्षा को लेकर बहस और चिंता का दौर पूरे साल चलता रहा.

इस हमले की बरसी से ठीक दो दिन पहले राज्य सरकार द्वारा जारी जांच एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट दे दी है. एनआईए की रिपोर्ट आनी अभी बाकि है. माओवादियों ने हमले को किस तरह से अंजाम तक पहुंचाया और वे सफल कैसे हो गए? इसका जवाब मिलना शेष है. हमले के दौरान और उससे पहले हमारी सुरक्षा एजेंसियां, खुफिया एजेंसियां क्या कर रही थीं? इसका जवाब फिलहाल मिला नहीं है.

चूंकि हमला बस्तर की धरा पर हुआ है. इसलिए सत्ता के खिलाफ विधानसभा चुनाव में जनादेश भी गया. बस्तर संभाग में जहां 12 में से 11 भाजपा के विधायक थे. वहां कांग्रेस परिवर्तन यात्रा में विपक्ष के नेताओं की शहादत ने बस्तर से भाजपा की 8 सीटें छीन लीं. हमले के बाद भी झीरम घाट पर हमले होते रहे. बस्तर की धरा छलनी होती रही. मौतों का आंकड़ा बढ़ता रहा. सरकार केंद्र की हो या राज्य की, माओवादी मोर्चे पर बेसुध ही दिख रही है. बड़ी बात यह है कि इस बरसी के ठीक दूसरे दिन 26 मई को केंद्र में नई सरकार शपथ लेगी. बदलाव की नई सुबह से पहले 25 मई को बस्तर टाइगर कहे जाने वाले महेंद्र कर्मा की पहली बरसी पर बस्तर एक बार फिर माओवादी मोर्चे पर अपनी विजय का संकल्प लेगा, यह उम्मीद अभी बाकि है….
*लेखक दंतेवाड़ा से प्रकाशित बस्तर इंपैक्ट के संपादक हैं.

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