‘मेक इन छत्तीसगढ़’ बनाम ‘सिप्रोसीन कांड’

रायपुर | विशेष संवाददाता: सिप्रोसीन कांड ने ‘मेक इन छत्तीसगढ़’ को धक्का पहुंचाया है. एक तरफ राज्य सरकार छत्तीसगढ़ में मैनुफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिये उद्योग नीति बना रही है वहीं, दूसरी ओर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के नाक के तले जीवन रक्षक दवा सिप्रोफ्लाक्सासिन की जगह पर चूहे मारने का जहर जिंक फास्फाइट पाया जाता है. जिससे नसबंदी कराने वाले तथा सर्दी-खांसी का इलाज कराने सरकारी अस्पताल गये करीब 18 लोग काल के गाल में समा गये हैं. इसके बाद भी बिलासपुर के गनियारी के एक निजी आयुर्वेदिक चिकित्सक द्वारा इस सिप्रोसीन दवा के उपयोग से लोगों के मरने की खबर है.

शुरुआती तौर पर चिकित्सकों को निलंबित करने के बाद अब छत्तीसगढ़ सरकार के निशाने पर सिप्रोसीन 500 मिलीग्राम बनाने वाली रायपुर की दवा कंपनी महावर फार्मा है. इस महावर फार्मा के परिसर में छापे के समय जिंक फास्फाइट की बोरी मिली है. जाहिर है कि दवा में सिप्रोफ्लाक्सासिन के सफेद पावडर के स्थान पर जिंक फास्फाइट के सफेद पावडर को मिला दिया गया था. ऐसा जाहिर होता है कि इस दवा कंपनी में अप्रशिक्षित कर्मचारी काम करते हैं जिन्हें जीवन रक्षक दवा तथा चूहे मारने के जहर में फर्क करना नहीं आता है. गौर करने वाली बात यह भी है कि इस महावर फार्मा को जीएमपी का प्रमाण पत्र मिला हुआ है.

हैरत की बात है कि पांच प्रकरण वर्ष 2012 से न्यायालय में लम्बित होने के बावजूद अनुज्ञापन अधिकारी द्वारा वर्ष 2004 में राजधानी रायपुर के व्हीआईपी रोड खम्हारडीह स्थित इस औषधि निर्माता कम्पनी को गुड मेन्युफेक्चरिंग प्रेक्टिस, जीएमपी का प्रमाण पत्र प्रदान किया गया था. रविवार को छत्तीसगढ़ सरकार ने इसके लिये खाद्य एवं औषधि प्रशासन के रायपुर स्थित मुख्यालय के सहायक औषधि निरीक्षक हेमंत श्रीवास्तव को तत्काल प्रभाव से निलम्बित कर दिया है.

यह कृत्य छत्तीसगढ़ सिविल सेवा, आचरण नियम 1965 का उल्लंघन और गंभीर कदाचार की श्रेणी में आता है. अतः छत्तीसगढ़ शासन द्वारा हेमंत श्रीवास्तव, सहायक औषधि निरीक्षक खाद्य और औषधि प्रशासन रायपुर को छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियम 1966 के नियम नौ के तहत तत्काल प्रभाव से निलम्बित किया गया है. इससे पहले छत्तीसगढ़ सरकार ने चार चिकित्सकों को निलंबित कर दिया था तथा उनमें से दो को सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया था.

‘सिप्रोसीन कांड’ की गूंज विदेशी मीडिया फाक्स टीवी, बीबीसी वर्ल्ड, अलजजीरा तथा वाशिंगटन पोस्ट होते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ तक पहुंच गई. जाहिर है कि इसी के साथ विदेशों तक छत्तीसगढ़ के ‘सिप्रोसीन कांड’ की गूंज पहुंच गई. जिसे पहले ‘नसबंदी कांड’ कहा जा रहा था अब वह ‘सिप्रोसीन कांड’ के रूप में बदनाम हो रहा है. इसी के साथ छत्तीसगढ़ के दवा कंपनी में दवा के स्थान पर चूहे मारने की दवा को पैक करके वितरित करने का समाचार भी विस्फोटक ढ़ंग से दुनिया के कई देशों में फैल गया है.

उसके बाद सरकारी माध्यम से छत्तीसगढ़ में भ्रष्ट तरीके से गुड मेन्युफेक्चरिंग प्रेक्टिस, जीएमपी प्रमाण पत्र देने की बात भी फैलने वाली है. उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ के माध्यम से देश को एक मैनुफैक्चरिंग हब में परिवर्तित करने की शुरुआत की है जिससे विदेशी कंपनिया अपना उत्पादन भारत में करवाने लगे. जाहिर है कि ‘मेक इन इंडिया’ के परवान चढ़ने से देश को नौजवानों को रोजगार मिलेगा तथा विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी होगी.

‘मेक इन इंडिया’ की तर्ज पर छत्तीसगढ़ सरकार ने भी अक्टूबर 2014 से ‘मेक इन छत्तीसगढ़’ की पहल शुरु की है. अब छत्तीसगढ़ की उद्योग नीति इसी के आधार पर बनाने की बात चल रही. इल सब के बीच में रायपुर के महावर फार्मा के
‘सिप्रोसीन कांड’ ने छत्तीसगढ़ की विश्वसनीयता पर निश्चित तौर पर चोट किया है. जहां इससे कई जाने गई हैं वहीं, इससे छत्तीसगढ़ में उत्पादन के लिये आने वाले उद्योगपतियों को यह सोचने के लिये मजबूर कर देगा कि छत्तीसगढ़ में माल बनवाने से कहीं उसे बेचने में मुश्किलों का सामना तो नहीं करना पड़ेगा.

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