कुपोषित छत्तीसगढ़ में पोषण का कानून

रायपुर | संवाददाता: कुपोषण में बदनाम छत्तीसगढ़ अब कुपोषण दूर करेगा. देश के 32 राज्यों में छत्तीसगढ़ 19 वें नंबर पर होने के बाद रमन सरकार ने पोषण का तमगा लगा लिया है. इस सप्ताह विधानसभा में विपक्ष की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए रमन सरकार ने तय किया कि अब छत्तीसगढ़ के खाद्य कानून को छत्तीसगढ़ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम,2012 के नाम से जाना जायेगा.

केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में 38.47 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. देश में सबसे कम कुपोषण अरुणाचल प्रदेश में 2 प्रतिशत है. देश के पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिति छत्तीसगढ़ से बेहतर है. जबकि पूर्वोत्तर राज्यों को पिछड़ा माना जाता है लेकिन कुपोषण के मामलों में छत्तीसगढ़ उनसे पिछड़ा हुआ है.


पूर्वोत्तर राज्यों में नागालैंड में 8.38 प्रतिशत, सिक्किम में 10.72 प्रतिशत, मणिपुर में 13.83 प्रतिशत, मिजोरम में 23.26 प्रतिशत, मेघालय में 29.13 प्रतिशत, आसोम में 31.32 प्रतिशत तथा त्रिपुरा में 36.89 प्रतिशत है. यहां तक कि छत्तीसगढ़ के साथ अस्तित्व में आये उत्तराखंड में भी तुलनात्मक रूप से कम कुपोषण 24.93 प्रतिशत है. जिस मध्यप्रदेश का छत्तीसगढ़ कभी हिस्सा रहा है, वहां भी कुपोषण तुलनात्मक रूप से कम यानी 28.49 प्रतिशत है. ये आंकड़े 2011 के हैं. यदि बच्चों में रक्तअल्पता की बात की जाये तो छत्तीसगढ़ में 2012 में 70 प्रतिशत से ज्यादा बच्चों में यह समस्या थी.

हालांकि राज्य सरकार की छत्तीसगढ़ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम में भी कई पेंच हैं. दावा है कि इस अधिनियम के तहत 90 प्रतिशत आबादी को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से अनाज लेने का अधिकार होगा. मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा ‘योजना में चना, दाल और आयोडीन युक्त नमक दिये जायेंगे, जिनमें अधिक मात्रा में पोषक तत्व मौजूद होंगे. पोषण सुरक्षा शामिल करने के लिये अधिनियम में संशोधन किया गया है.’

गौरतलब है कि माइक्रो न्यूट्रिएंट इनीशिएटीव के भारत चेप्टर के अनुसार भारत में बच्चों की पोषकता बढ़ाने के लिये 9 से 59 माह के बच्चों को साल में दो बार विटामिन ए की खुराक देना चाहिये. पतले दस्त को रोकने के लिये दिये जाने वाले जीवन रक्षक घोल, ओआरएस में जिंक मिलाया जाना आवश्यक है. जिससे बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता का विकास हो सके. रक्त अल्पता को रोकने के लिये आयरन तथा फोलिक एसिड की गोली बच्चों को दी जानी चाहिये. यह तमाम उपाय चिकित्सीय दृष्टिकोण से अनिवार्य हैं. जबकि छत्तीसगढ़ के पोषण सुरक्षा में इनका उल्लेख तक नही है. इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि झोले में से कौन सी बिल्ली बाहर आने वाली है.

कुपोषण दूर करने के लिये गर्भवती एवं दुग्धपान कराने वाली महिलाओं, अत्यंत गरीब लोग और पिछड़े वर्ग को मुफ्त भोजन देना ही पर्याप्त नही है. उन्हे पोषित आहार मिल रहा है कि नहीं यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेवारी है.

राज्य के बस्तर इलाके को लेकर विधानसभा में पेश आंकड़े भी गौरतलब है. बस्तर में पिछले चार सालों में कुपोषित बच्चों की संख्या 1,15,093 है. जिनमें मध्यम कुपोषित बच्चों की संख्या 84,059 और गंभीर कुपोषित बच्चों की संख्या 31,034 है. बस्तर जिले में सबसे ज्यादा 35,034 बच्चे कुपोषित पाए गए, जबकि नारायणपुर में सबसे कम 5504 बच्चे कुपोषित हैं.

अब एक नजर कैग की रिपोर्ट पर. इस रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में आंगनवाड़ी खोलने को लेकर जो लक्ष्य रखा गया था, उसमें छत्तीसगढ़ सबसे पीछे है. राज्य को जो लक्ष्य दिया गया था, उसमें राज्य ने 39 प्रतिशत आंगनवाड़ी कम खोले.

देश भर में केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2011 तक 13.67 लाख आंगनवाड़ी खोलने को मंजूरी दी थी लेकिन छत्तीसगढ़ में लक्ष्य से 39 प्रतिशत आंगनवाड़ी कम खुले. इसी तरह एकीकृत बाल विकास सेवा केंद्र के लक्ष्य में भी छत्तीसगढ़ 26 प्रतिशत कम रहा.

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक विनोद राय और महानिदेशक एसीए राज मथरानी द्वारा जारी रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ के बस्तर, बिलासपुर और रायपुर के एकीकृत बाल विकास सेवाओं के सर्वे का हवाला देते हुये कहा गया है कि 2006-07 में 45.61 करोड़ रुपये अनुमोदित किये गये थे लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने इस पर 70.46 करोड़ रुपये खर्च कर दिये. इसी तरह 2007-08 में 94.98 करोड़ रुपये के मुकाबले 83.68 करोड़, 2008-09 में 89.92 करोड़ के मुकाबले 122.89 करोड़, 2009-10 में 142.94 करोड़ की तुलना में 143.81 करोड़ रुपये और 2010-11 में 120.65 करोड़ की तुलना में 162.33 करोड़ रुपये खर्च किये.

लेकिन इतनी लंबी-चौड़ी रकम खर्च करने के बाद भी योजनाओं का हाल देखने लायक है. 2006 से 2011 तक 23,345 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण का लक्ष्य रखा गया था लेकिन 14,324 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को ही प्रशिक्षण दिया गया. इसी तरह 36250 आंगनवाड़ी सहायिकाओं को प्रशिक्षण देने के लक्ष्य से लगभग आधे 18,873 को ही प्रशिक्षित किया गया. आंगनवाड़ी सुपरवाइजरों का हाल तो और भी बुरा है. आंकड़े बताते हैं कि राज्य में केवल 2 प्रतिशत सुपरवाइजर ही प्रशिक्षित हैं.

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