बेकसूर को बारह बरस कैद, लोकतंत्र अपने बारे में सोचे

सुनील कुमार
बस्तर की एक फास्टट्रैक अदालत में नक्सल मामलों की सुनवाई के बाद कल एक महिला बारह बरस जेल में रहकर रिहा हुई है. अदालत में उसके खिलाफ कुछ भी साबित नहीं हुआ जबकि उस पर 157 मामले चल रहे थे.

संगीनों के साए में जीने वाले बस्तर के आदिवासियों के बीच इस तरह की नौबत इन बारह बरसों में कैसे आई, इस पर एक अलग जांच होनी चाहिए. लेकिन बस्तर की तानाशाह पुलिस ने बारह बरस तक डेढ़ सौ से अधिक मुकदमे चलाकर भी एक गरीब महिला पर कुछ भी साबित करने में कामयाबी नहीं पाई, तो यह लोकतंत्र और इंसाफ की नाकामयाबी अधिक है, पुलिस की नाकामयाबी कम.


क्या कोई शहरी, शिक्षित, संपन्न इंसान ऐसी कल्पना कर सकते हैं कि वे बारह बरस विचाराधीन कैदी की तरह जेल में रहें, डेढ़ सौ मुकदमे झेलें, और उसके बाद जिंदगी के वे बारह बरस छीनकर उन्हें वापिस दुनिया में लौटा दिया जाए!

ऐसी खबरें देश के कुछ मुस्लिमों के बारे में जरूर आती हैं, जिन्हें आतंक के जुर्म में पुलिस और एनआईए ने, सीबीआई ने दस-दस बरस रगड़कर, अदालत में उनके खिलाफ कुछ भी साबित करने में कामयाबी नहीं पाई.

आतंक के मामलों में मुकदमा झेल रहे दो-चार हिन्दुओं के साथ भी ऐसा हुआ है, लेकिन बस्तर में इस महिला के साथ जो हुआ है, जिस तरह उसके खिलाफ डेढ़ सौ से अधिक मुकदमे चलाए जाने की खबर है, उसे देखते हुए छत्तीसगढ़ राज्य को अपने लोकतंत्र के बारे में एक बार फिर सोचना चाहिए.

माओवादी होने की आरोपी निर्मलक्का
निर्मलक्का माओवादी होने के आरोप में 12 साल जेल में रहीं
जिस बेकसूर की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा इस तरह छीन लिया जाए, उसे अपने बच्चों और अपने परिवार से इस तरह अलग करके जेल में रखा जाए, उसकी लोकतंत्र पर क्या आस्था रह गई होगी?

और अगर ऐसे लोग आगे चलकर सचमुच ही बंदूक उठा लें, तो क्या उसे नाजायज कहा जा सकेगा? वह भारत के कानून की जुबान में गैरकानूनी तो हो सकता है, लेकिन सामाजिक न्याय की जुबान में क्या वह नाजायज भी होगा?

लोगों को याद होगा कि अभी कुछ ही दिन पहले दिल्ली की एक चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता और समाज विज्ञान पढ़ाने वाली प्राध्यापिका नंदिनी सुंदर सहित कुछ और प्राध्यापकों को बस्तर की एक अदालत से हत्या के एक मामले में बरी किया गया क्योंकि पुलिस ने ही अदालत में कहा कि उसके पास इन लोगों के खिलाफ कुछ भी नहीं है.

इसी बस्तर की पुलिस ने छत्तीसगढ़ के सीपीएम के एक नौजवान नेता संजय पराते को भी इसी मामले में गिरफ्तार करके उनके खिलाफ भी मुकदमा चलाया था, और उनको भी छोडऩा पड़ा.

लेकिन यह बात सोचकर भी दिल कांप उठता है कि किसी के खिलाफ डेढ़ सौ से अधिक मुकदमे दर्ज किए जाएं. कोई हैरानी नहीं है कि ऐसे बस्तर में कुछ लोग नक्सलियों के हमदर्द भी हो जाते हैं, और उनका साथ भी देते हैं.

पिछले बरसों में बस्तर में आईजी एसआरपी कल्लूरी के अलोकतांत्रिक राज में इस तरह के बहुत से नाजायज और गैरकानूनी काम हुए जिन पर राजधानी रायपुर में बैठी हुई रमन सरकार न सिर्फ मूकदर्शक बनी हुई थी, बल्कि वह कल्लूरी की, उनके तौर-तरीकों की वाहवाही करने वाली सरकार भी थी, बढ़ावा देने वाली सरकार भी थी.

उस सरकार के कुछ सबसे बड़े अफसर कल्लूरी को बढ़ावा देते रहे, उनके नाजायज कामों की हिफाजत भी करते रहे. इन बारह बरसों से जेल काट रही इस महिला की जिंदगी में लोकतंत्र का कोई हक अगर उसे नहीं मिला, तो यह छत्तीसगढ़ सरकार की जिम्मेदारी भी थी, इसकी तोहमत सरकार पर आती है.

छत्तीसगढ़ सरकार को इस मामले को एक मिसाल मानते हुए बस्तर में गरीब आदिवासियों, गरीब ग्रामीणों पर चल रहे ऐसे सभी मामलों की फिर से छानबीन करनी चाहिए क्योंकि बारह-बारह बरस का सामाजिक वनवास जेल में काटकर जो लोग निकलेंगे, वे लोकतंत्र पर भरोसा खोकर भी निकलेंगे.

किसी भी लोकतंत्र के लिए यह एक शर्मनाक नौबत है, और लोकतंत्र को दुबारा ऐसे गलत काम करने से बचने के लिए इस महिला को इस हद तक फंसाने वाले पुलिस अफसरों पर भी कार्रवाई करनी चाहिए.

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