माओवादियों ने फिर दी सफाई

रायपुर | संवाददाता: जीरम घाटी में कांग्रेसी नेताओं की हत्या को लेकर माओवादियों ने फिर से संशोधित बयान जारी किया है. कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर किये गये हमले को लेकर राज्य और देश भर में जितने सवाल उठे हैं, उसमें माओवादी अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं. कई सवाल हैं, जिन पर माओवादी चुप्पी साधे हुये हैं. राज्य और राज्य से बाहर एक बड़ा वर्ग है, जो निरपेक्ष तरीके से होने के बाद भी माओवादियों के कमजोर और लचर तर्क को निगल नहीं पा रहा है. आश्चर्य नहीं कि माओवादियों ने दरभा घाटी में किये गये अपने हमले को लेकर फिर से संशोधित बयान जारी किया है.

छत्तीसगढ़ खबर ने पहले भी माओवादियों का आंशिक रुप से संशोधित कर के पूरा बयान प्रकाशित किया था. हम एक लोकतांत्रिक समाज की मजबूती के लिये यह जरुरी समझते हैं कि जनता में सारे पक्ष बिना किसी आग्रह के सामने आयें, जिससे जनता को अपनी राय बनाने में सुविधा हो. यहां हम माओवादियों द्वारा जारी उनका संशोधित बयान भी प्रकाशित कर रहे हैं.


फासीवादी सलवा जुडूम के सरगना महेन्द्र कर्मा का सफाया – बस्तरिया आदिवासी जनता पर किए गए अमानवीय अत्याचारों, नृशंस हत्याकाण्डों और बेअंत आतंक की जायज प्रतिक्रिया है!
बड़े कांग्रेसी नेताओं पर हमला – यूपीए सरकार द्वारा विभिन्न राज्य सरकारों के साथ मिलकर चलाए जा रहे फासीवादी आपरेशन ग्रीनहंट का अनिवार्य प्रतिशोध है!

25 मई 2013 को जन मुक्ति गुरिल्ला सेना की एक टुकड़ी ने कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं के 20 गाड़ियों के काफिले पर भारी हमला कर बस्तर की उत्पीड़ित जनता के जानी दुश्मन महेन्द्र कर्मा, छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल समेत कुल कम से कम 27 कांग्रेसी नेताओं, कार्यकर्ताओं और पुलिस बलों का सफाया कर दिया.

यह हमला उस समय किया गया था जब आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस के दिग्गज नेता ‘परिवर्तन यात्रा’ चला रहे थे. इस कार्रवाई में भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल समेत कम से कम 30 लोग घायल हो गए. इस लड़ाई के दौरान पुलिसकर्मियों और सुरक्षा गार्डों से पीएलजीए ने नौ एके-47, सात इन्सास, दो एसएलआर और पांच पिस्तौल – कुल 23 हथियार छीन लिए. इसके अलावा 1,030 कारतूस और दस वाकीटाकी सेट भी जब्त कर लिए.

इस ऐतिहासिक हमले में * * * * बदनाम महेन्द्र कर्मा के *** की मौत मारे जाने से समूचे बस्तर क्षेत्र में जश्न का माहौल बन गया. पूर्व में गृहमंत्री के रूप में काम करने वाले नंदकुमार पटेल जनता पर दमनचक्र चलाने में आगे ही रहे थे. उनके समय में ही बस्तर क्षेत्र में पहली बार अर्द्धसैनिक बलों (सीआरपीएफ) की तैनाती की गई थी. यह भी किसी से छिपी हुई बात नहीं कि लम्बे समय तक केन्द्रीय मंत्रीमंडल में रहकर गृह विभाग समेत विभिन्न अहम मंत्रालयों को संभालने वाले वी.सी. शुक्ल भी जनता का दुश्मन है जिसने साम्राज्यवादियों, दलाल पूंजीपतियों और जमींदारों के वफादार प्रतिनिधि के रूप में शोषणकारी नीतियों को बनाने और लागू करने में सक्रिय भागीदारी ली.

इस हमले का लक्ष्य मुख्य रूप से महेन्द्र कर्मा तथा कुछ अहम प्रतिक्रियावादी कांग्रेस नेताओं का खात्मा करना था. हालांकि इस भारी हमले में जब हमारे गुरिल्ला बलों और सशस्त्र पुलिस बलों के बीच लगभग दो घण्टों तक भीषण गोलीबारी हुई थी उसमें फंसकर कुछ निर्दोष लोग और निचले स्तर के कांग्रेस कार्यकर्ता, जो हमारे दुश्मन नहीं थे, भी हताहत हुए. इनकी मृत्यु पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी खेद प्रकट करती है और उनके शोकसंतप्त परिवारजनों के प्रति संवेदना प्रकट करती है.

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी इस हमले की पूर्ण जिम्मेदारी लेती है. इस बहादुराना हमले का नेतृत्व करने वाले पीएलजीए के कमाण्डरों, हमले को सफल बनाने वाले वीरयोद्धाओं, इसे सफल बनाने में प्रत्यक्ष और परोक्ष सहयोग देने वाली जनता और समूची बस्तरिया क्रांतिकारी जनता का दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी इस मौके पर क्रांतिकारी अभिनंदन करती है. इस वीरतापूर्ण हमले से यह सच्चाई फिर एक बार साबित हो गई कि जनता पर अमानवीय हिंसा, जुल्म और कत्लेआम करने वाले फासीवादियों को जनता कभी माफ नहीं करेगी, चाहे वे कितने बड़े तीसमारखां भी क्यों न हो आखिर जनता के हाथों सजा भुगतनी ही होगी.

आदिवासी नेता कहलाने वाले महेन्द्र कर्मा का ताल्लुक दरअसल एक सामंती मांझी परिवार से रहा. इसका दादा मासा कर्मा था और बाप बोड्डा मांझी था जो अपने समय में जनता के उत्पीड़क और विदेशी शासकों के गुर्गे रहे थे. इसके दादा के जमाने में नवब्याहाता लड़कियों को उसके घर पर भेजने का रिवाज रहा. इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसका खानदान कितना कुख्यात था. इनका परिवार पूरा बड़े भूस्वामी होने के साथ-साथ आदिवासियों का अमानवीय शोषक व उत्पीड़क रहा.

महेन्द्र कर्मा की राजनीतिक जिंदगी की शुरूआत 1975 में एआईएसएफ के सदस्य के रूप में हुई थी जब वह वकालत की पढ़ाई कर रहा था. 1978 में पहली बार भाकपा की तरफ से विधायक बना था. बाद में 1981 में जब उसे भाकपा की टिकट नहीं मिली थी तो कांग्रेस में चला गया. बीच में जब कांग्रेस में फूट पड़ी थी तो वह माधवराव सिंधिया द्वारा बनाई गई पार्टी में शामिल होकर 1996 में लोकसभा सदस्य बना था. बाद में फिर कांग्रेस में आ गया. 1996 में बस्तर में छठवीं अनुसूची लागू करने की मांग से एक बड़ा आंदोलन चला था. हालांकि उस आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से भाकपा ने किया था, उस समय की हमारी पार्टी भाकपा (माले) (पीपुल्सवार) ने भी उसमें सक्रिय रूप से भाग लेकर जनता को बड़े पैमाने पर गोलबंद किया था. लेकिन महेन्द्र कर्मा ने बाहर के इलाकों से आकर बस्तर में डेरा जमाकर करोड़पति बने स्वार्थी शहरी व्यापारियों का प्रतिनिधित्व करते हुए उस आंदोलन का पुरजोर विरोध किया था. इस तरह उसी समय उसके आदिवासी विरोधी व दलाल चरित्र को जनता ने साफ तौर पर पहचाना था. हालांकि 1980 के दशक से ही बस्तर के बड़े व्यापारी व पूंजीपति वर्गों से उसके सम्बन्ध मजबूत थे.

उसके बाद 1999 में ‘मालिक मकबूजा’ के नाम से चर्चित एक घोटाले में कर्मा का नाम सामने आया था. 1992-96 के बीच उसने लगभग 56 गांवों में फर्जीवाड़े से आदिवासियों की जमीनों को सस्ते में खरीदकर, राजस्व व वन अधिकारियों से सांठगांठ कर उन जमीनों के अंदर मौजूद बेशकीमती पेड़ों को कटवाया था. चोर व्यापारियों को लकड़ी बेचकर महेन्द्र कर्मा ने करोड़ों रुपए कमा लिए थे, इस बात का खुलासा लोकायुक्त की रिपोर्ट से हुआ था. हालांकि इस पर सीबीआई जांच का आदेश भी हुआ था लेकिन सहज ही दोषियों को सजा नहीं हुई.

दलाल पूंजीपतियों और बस्तर के बड़े व्यापारियों के प्रतिनिधि के रूप में कांग्रेस की ओर से चुनाव जीतने के बाद महेन्द्र कर्मा को अविभाजित मध्यप्रदेश शासन में जेल मंत्री और छत्तीसगढ़ के गठन के बाद उद्योग व वाणिज्य मंत्री बनाया गया था. उस समय सरकार ने नगरनार में रोमेल्ट/एनएमडीसी द्वारा प्रस्तावित इस्पात संयंत्र के निर्माण के लिए जबरिया जमीन अधिग्रहण का निर्णय लिया था. स्थानीय जनता ने अपनी जमीनें देने से इनकार करते हुए आंदोलन छेड़ दिया जबकि महेन्द्र कर्मा ने जन विरोधी रवैया अपनाया था. तीखे दमन का प्रयोग कर, जनता के साथ मारपीट कर, फर्जी केसों में जेलों में कैद कर आखिर में जमीनें बलपूर्वक छीन ली गईं जिसमें कर्मा की मुख्य भूमिका रही. नगरनार में जमीनें गंवाने वाली जनता को आज तक न तो मुआवजा मिला, न ही रोजगार मिला जैसे कि सरकार ने वादा किया था. वो सब तितर-बितर हो गए.

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