माओवादियों से कैसे होगी बात?

विश्वरंजन
23 जून 2016 को रेवोल्यूशनरी आर्म्ड फोर्सेस आफ कोलंबिया, जिसे स्पैनिश भाषा में फ्यूरजाज आरमाडाज रेवोल्यूसिऔनायिस डी कोलंबिया या फार्फ के नाम से जाना जाता है, और कोलंबिया की सरकार के बीच संधि प्रस्ताव पर हस्ताक्षर हो गया. कोलंबिया की यह रेवोल्यूशनरी पार्टी जो मार्क्ससिस्ट-लेनिनिस्ट-माओवाद और चे गुवेरा के सिद्धांतों को मानती है, कोलंबिया में 1964 से शासन के साथ एक दीर्घकालीन हिंसात्मक युद्ध कर रही थी. 2015 में इस गुट ने एकतरफा शांति का प्रस्ताव रखा और युद्ध को रोक दिया. इसके बाद शासन से बातचीत के जरिए शांति बहाली की बात की तथा कोलंबिया के शासन से भी बहुत से इलाकों से सेना हटाने तथा आर्थिक सुधारों को जमीनी स्तर पर लाने हेतु पहल करने का आग्रह किया. साथ ही साथ गिरफ्तार रेवोल्यूशनरी समर्थकों के रिहाई की मांग भी की गई. शासन से वार्ता के लिये रेवोल्यूशनरी पार्टी का उच्चतम नेतृत्व सामने आया.

कोलंबिया का दीर्घकालीन माओवादी आंदोलन भारत के माओवादी सशस्त्र संघर्ष से बहुत मायनों में एक जैसा है. दोनों देशों में माओवादियों ने अपनी लड़ाई कमोबेश जंगलों में लड़ने का मन बनाया था. दोनों ने इस लड़ाई के लिये धन उन इलाकों में काम करने वाले कारखानों के मालिकों तथा व्यावसायियों पर दबाव डाल कर इकट्ठा किया. कोलंबिया के माओवादियों ने धन एकत्र करने के लिये ड्रग ट्रेड का भी इस्तेमाल किया. भारतीय माओवादियों ने भी बस्तर और झारखंड के कुछ इलाकों में गांजा और अफीम की खेती कराई, जिन्हें शासन द्वारा नष्ट किया गया. दोनों देशों के माओवादियों ने जंगल काटे और लकड़ियों को वन तस्करों को बेचा.


|| बस्तर में किसी भी बड़े माओवादी नेता ने आत्मसमर्पण नहीं किया है और न ही कनिष्ठ स्तर के माओवादियों के समर्पण से माओवादी हौसलों में कोई गिरावट आई है.||

दोनों देशों के माओवादियों ने अवयस्क बच्चों के हाथों में हथियार पकड़ाये और अपने दीर्घकालीन युद्ध में इस्तेमाल किया. दोनों माओवादी संगठनों के सशस्त्र गुरिल्लाओं की संख्या 11,000 से 18,000 के बीच आंकी जाती रही है. जाहिर है, कोलंबिया में माओवादियों के बीच युद्ध विराम और शासन के साथ बातचीत के जरिए शांति बहाली के कारण भारत में बहुत सारे बुद्धिजीवियों ने भी मांग उठाना शुरू कर दिया है कि भारत में माओवादियों के साथ बातचीत का रास्ता अपनाते हुए शांति स्थापित करने की पहल करनी चाहिए. क्या भारत में भी इस तरह का पहल करने का समय आ गया है, इस पर निर्णायक समझ के लिए दोनों देशों के माओवादी युद्ध के विभिन्न चरणों को समझना जरूरी है.

कोलंबिया में 1998 से 2002 तक शांति वार्ता के असंख्य असफल प्रयास किये गये थे. 2002-2005 में कोलंबिया मिलिटरी तथा पैरामिलिटरी फोर्सेस ने माओवादियों पर इतना दबाव बनाया कि माओवादियों को पीछे हटने पर बाध्य होना पड़ा. हालांकि माओवादी छुटपुट आतंकी घटनाओं को अंजाम देते रहे. इसी बीच कोलंबिया में माओवादियों के खिलाफ व्यापक राजनैतिक माहौल बनाने की कोशिश की गई. इस पूरी अवधि में कोलंबियन फौज ने माओवादियों के खिलाफ जबर्दस्त दबाव बनाये रखा, जिससे माओवादियों में बिखराव और थकान के लक्षण साफ परिलक्षित होने लगे. 2012-14 में फिर शांति बहाली के लिए माओवादियों और कोलंबिया शासन के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत शुरू हो गई.

भारत में स्थिति भिन्न है. भारत में माओवादियों में न ही बिखराव नजर आ रहा है और न ही माओवादियों में कोई थकान का अनुभव किया जा रहा है. यह सच है कि झारखंड में माओवादी संगठन में कुछ बिखराव आया है परन्तु आज भी वहां का सबसे सशक्त माओवादी संगठन सीपीआई माओवादी ही है. बस्तर में काफी संख्या में माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया, इस तथ्य को सीपीआई माओवादी के महासचिव गणपति ने माना भी है परन्तु किसी भी बड़े माओवादी नेता ने आत्मसमर्पण नहीं किया है और न ही कनिष्ठ स्तर के माओवादियों के समर्पण से माओवादी हौसलों में कोई गिरावट आई है.

सुरक्षा बलों की हाल की कामयाबियां अन्दरूनी बस्तर, झारखंड और बिहार के अन्दरूनी इलाकों में माओवादी पकड़ को कमजोर करने में असफल रही हैं. जिस तरह कोलंबिया ने माओवादी विरोधी राजनैतिक एकता का परिचय दिया तथा माओवाद के खिलाफ जनमानस को संगठित किया गया, भारत में आज भी उसका नितांत अभाव है.

सबसे बड़ी बात यह है कि सीपीआई माओवादी के महासचिव गणपति, जो माओवादियों के सर्वोच्च नेता हैं; ने कभी भी शांति पहल की बात नहीं की. भारत में माओवादियों और शासन के बीच बातचीत की मध्यस्थता की बात कुछ सिविल सोसायटी के लोग करते रहे हैं जिसका कोई अर्थ नहीं निकलता. जब तक शांति-वार्तालाप का औपचारिक प्रस्ताव माओवादियों के पॉलित-ब्यूरो से नहीं आये तब तक यह माना जा सकता है कि माओवादी शांति-वार्ता के लिए कम से कम आज तो तैयार नहीं हैं.

अब प्रश्न उठता है कि क्या शासन माओवादियों से वार्तालाप के लिए तैयार है? अगर है तो क्या उसने माओवादियों के शीर्षस्थ नेतृत्व से संपर्क स्थापित करने में सफलता पाई है? क्या शासन ने अपनी इंटेलिजेंस एजेंसियों को इस काम में लगाया है? क्या सिविल सोसायटी, सोशल एक्टविस्ट तथा माओवाद समर्थकों के साथ शासन सार्थक बातचीत शांति स्थापना के लिए कर रही है? क्या शासन के पास कोई मसौदा तैयार है जिसके अंतर्गत शांति- वार्ता की शुरुआत की जा सके. आज की तारीख में ऐसा नहीं लगता है कि शासन ने इस ओर कोई भी सार्थक सोच की पहल की हो. बीच-बीच में शासकीय नुमाइंदों और राजनेताओं के ऐसे बयानों का कोई मतलब नहीं है कि माओवादी हमारे भटके हुए भाई हैं और उन्हें मुख्य धारा में जुड़ना चाहिए. इस बात का अर्थ तभी है, जब सरकार गंभीरतापूर्वक उपरोक्त प्रक्रियाओं पर विचार करे.

दूसरी ओर सरकार को यह भी समझना पड़ेगा कि माओवादी नेतृत्व किन स्थितियों में बातचीत करने के लिए राजी होगा? जब तक माओवादी नेतृत्व, पार्टी में बिखराव की स्थिति से सशंकित न हो जाये या पार्टी अपने आधार क्षेत्रों में लगातार तथा जबर्दस्त पुलिस दबाव महसूस न करने लगे तब तक वह क्यों शासन से बातचीत करने को राजी होगा? कोलंबिया में माओवादियों को अलग जमीनी हकीकत से मुखातिब होना पड़ा था, जिसके कारण उन्होंने शांति-संधि पर हस्ताक्षर किया. भारत में आज की तारीख में जमीनी हकीकत माओवादियों के बिल्कुल प्रतिकूल नहीं हुई है.

*लेखक छत्तीसगढ़ के पूर्व पुलिस महानिदेशक एवं स्वतंत्र सुरक्षा समीक्षक हैं.
नवभारत से साभार

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