मई दिवस की याद

वैश्विक मजदूर एकता के लिए क्या हमें हेमार्केट शहीदों का सम्मान नहीं करना चाहिए?
चार दशकों से कामगार वर्ग पर पूंजीवादी वर्ग का जिस तरह का अत्याचार हो रहा है उससे मजदूर खुद अपना क्रांतिकारी अतीत भूलने को मजबूर हो गए हैं. आखिर कैसे श्रमिक वर्ग मई दिवस की शुरुआत को भूल सकता है? संभव है कि इसका इतिहास हाल के दिनों में मजदूरों को नहीं बताया गया हो. आज जिस तरह से श्रमिकों का दमन हो रहा है, उसे देखते हुए इन्हें एकजुट होने और प्रतिरोध करने में सक्षम होने की सबसे अधिक जरूरत है.

19वीं सदी के आखिरी दिनों में कहा जाता था कि रोजगार में होने से बुरा बस एक ही चीज है और वह है बेरोजगार होना. जैसा की आज की पूंजीवादी व्यवस्था में वैसा ही उस वक्त था और मजदूर एक उत्पादन लागत मात्र थे. लेकिन मजदूरों ने हिम्मत की, अपने अधिकारों के लिए लड़े. उन लोगों ने आठ घंटे के कार्यदिवस के लिए संघर्ष किया.


पहले मई दिवस यानी 1 मई, 1886 को उत्तरी अमेरिका के हजारों मजदूरों ने मिलकर आठ घंटे के कार्यदिवस के लिए हड़ताल किया. उस वक्त शिकागो श्रमिक संगठनों का केंद्र था. वाम रुझान वाले श्रमिक अभियानों का केंद्र भी यही था. अराजक मानी जानी वाली संस्था इंटरनेशनल वर्किंग पीपल्स एसोसिएशन यहां मुख्य भूमिका में थी. उम्मीद के मुताबिक श्रमिकों को पूंजीपति वर्ग, कारोबारी मीडिया और दमनकारी पुलिस के विरोध का सामना करना पड़ा.

चार निर्दोष लोगों को फांसी दे दी गई. उन पर शिकागो के हेमार्केट चैक पर मई, 1886 में बम फोड़ने का झूठा आरोप मढ़ दिया गया था. इनमें ऑगस्ट स्पाइस और अल्बर्ट पार्सन भी थे. इन दोनों की गलती बस यह थी कि ये दोनों अतिवादी तरीकों से मजदूरों के अधिकार के लिए लड़ने के लिए जाने जाते थे. इनकी मांगों में आठ घंटे का कार्यदिवस भी था.

हालांकि, कई राज्यों में आठ घंटे के कार्यदिवस का कानून था. इसके बावजूद पूंजीपति वर्ग इसे लागू नहीं करना चाह रहा था. कानून बनाने वाले और कानून लागू करने वाले पूंजीपतियों के इस रुख को लगातार दरकिनार कर रहे थे. मजदूरों के पास 1 मई से हड़ताल पर जाने के अलावा और कोई विकल्प बचा नहीं.
economic and political weeklyसुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने गुस्से में कहा, ‘कानून ट्रायल पर है. अराजकता ट्रायल पर है. इन लोगों को दोषी ठहराइए. इन्हें उदाहरण बनाइए. इन्हें सूली पर चढ़ाइए. आप हमारे संस्थानों को और समाज को बचाइए.’ लेकिन स्पाइस ने चेतावनी दी थी, ‘अगर आपको लगता है कि आप हमें फांसी देकर मजदूर अभियान को खत्म कर देंगे तो हमें सूली पर चढ़ा दीजिए. यह आंदोलन लाखों लोगों के दमन से निकला है और वे अब मुक्ति चाहते हैं. हमें फांसी देकर आप एक चिंगारी पैदा करेंगे और आपके सामने हर तरफ इसकी लपटें उठेंगी. जिसे आप बुझा नहीं पाएंगे.’

शिकागो के उन मजदूरों के पास सक्षम नेता और वाम रुझान वाला सक्रिय पे्रस था. इनमें स्पाइस द्वारा संपादिक जर्मन दैनिक अर्बेटियर-जेतुंग भी शामिल था. उस वक्त के धनी लोग मजदूरों को खतरनाक वर्ग मानते थे. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज का मजदूर वर्ग मोटे तौर पर असंगठित है. वास्तविकता तो यह है कि श्रम संघर्षों की पहचान वाले राज्य जैसे आइओवा, मिशिगन, ओहियो, पेन्सिलवानिया और विस्कोंसिन के मजदूरों ने डोनल्ड ट्रंप के पक्ष में मतदान किया. जबकि ट्रंप नस्लवाद, संरक्षणवाद और संकुचित राष्ट्रवाद की बात करते हैं.

ट्रंप जैसी ताकतें ही दूसरे देशों में भी मजबूत हो रही हैं. इनमें फ्रांस में राष्ट्रीय मोर्चे का उदय और ब्रेक्जिट अभियान की ब्रिटेन में अगुवाई करने इंडिपेंडेंस पार्टी की लोकप्रियता इसी का उदाहरण है. ऐसे ही इटली में फाइव स्टार मूवमेंट मजबूत हुआ है और जर्मनी में पेडिगा. जर्मनी में अल्टर्नेटिव फॉर जर्मनी ने शरणार्थी विरोधी अभियान चलाकर भी लोकप्रियता हासिल की है.

भारत में भी नरेंद्र मोदी की मेक इन इंडिया की सफलता ठेके के मजदूरों पर ही टिकी हुई है. जिन्हें स्थाई मजदूरों के मुकाबले एक ही काम के लिए एक चैथाई या उससे भी कम मजदूरी मिलती है और जिनके काम की कोई सुरक्षा नहीं है. किसी भी स्वतंत्र मजदूर संघ को काम करने की अनुमति नहीं है. ये लोग कठपुतली मजदूर संघ चाहते हैं. कंपनी और पुलिस और कंपनी के अधिकारी गठजोड़ कर ले रहे हैं.

हरियाणा के मानेसर में मारुति सुजूकी कंपनी में मजदूरों के दमन के लिए यही दिखा. भारत सरकार भी एक नियोक्ता के तौर पर वैसे लाखों लोगों को भी मान्यता देने को तैयार नहीं है जो सामाजिक सेवाएं मुहैया करा रहे हैं. इनमें आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, पारा शिक्षक और स्वास्थ्य कार्यकर्ता शामिल हैं.

दुखद यह भी है कि मजदूर संगठन भी बंटे हुए हैं और वे एकजुट नहीं हो रहे हैं. आज की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि वे एक होकर ठेके वाली मजदूरी प्रथा के खिलाफ, कम मजदूरी के खिलाफ, लंबे समय तक काम करवाने के खिलाफ और खराब कामकाजी परिस्थितियों के खिलाफ आंदोलन खड़ा करें.

सच्चाई यह है कि अधिकांश श्रम संगठनों के लिए मई दिवस एक ऐसा दिन भी नहीं है जब वे अतीत के शहीदों को श्रद्धांजति अर्पित करें. पूंजीपति वर्ग के खिलाफ संघर्ष की बात तो दूर है. जरूरत है कि उन्हें आठ घंटे के कार्यदिवस के लिए शिकागो में 1880 के दशक में गाए जाने वाले गाने की याद दिलाई जाए. इस गाने की आखिरी पंक्तियां कुछ ऐसे हैः

हम सूर्य की चमक को महसूस करना चाहते हैं, हम फूलों की खुशबू लेना चाहते हैं;
हमें यकीन है कि ईश्वर भी ऐसा ही चाहते हैं, और हम चाहते हैं आठ घंटे.
हम अपनी ताकतों को एकत्रित कर रहे हैं नावों से, दुकानों से और मीलों सेः
आठ घंटे के काम के लिए, आठ घंटे के आराम के लिए और आठ घंटे जो हम करना चाहें उसके लिए.

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