खाली हो रहे हैं पहाड़

देविंदर शर्मा
हिमालय के पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं. पहाड़ों की ऊंचाई के कठिन और अविकसित इलाकों से लोग तेजी से रोजगार के अवसरों की तलाश में शहरों में पलायन कर रहे हैं. जीवंत और जिंदादिल कहे जाने वाले गांव अब भुतहा गांवों में तब्दील हो रहे हैं. अकेले उत्तराखंड में 2011 की जनगणना में पहले से चिह्नित 1,053 खाली गांवों की सूची में पिछले कुछ वर्षों 734 भुतहा गांव जुड़ गए हैं.

पिछले दशक में करीब 5.06 लाख लोग उत्तराखंड छोड़ गए हैं. उनमें से अधिकतर के वापस लौटने की संभावना नहीं है. घर पर बुजुर्गों और कभी-कभी छोटे बच्चों को छोड़कर वे औद्योगिक प्रतिष्ठानों और हाउसिंग सोसाइटियों में न्यूनतम तीन हजार रुपये के लिए गार्ड की नौकरी करते हैं.


उत्तराखंड ग्रामीण विकास एवं प्रवासन आयोग द्वारा सौंपी गई ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले सात साल में निर्जन गांवों की सूची में पौड़ी क्षेत्र शीर्ष पर है. पौड़ी के 186, बागेश्वर के 77, पिथौरागढ़ के 75, उत्तरकाशी के 70, चंपावत के 64, टिहरी के 58, अल्मोड़ा के 57, चमोली के 41, रुद्रप्रयाग के 20, हरिद्वार के 38, नैनीताल के 22, ऊधमसिंहनगर के 19 और देहरादून के सात गांव निर्जन गांव हैं.

प्रवासन से राज्य की 3,496 ग्राम पंचायतें बुरी तरह प्रभावित हुई हैं. यह रिपोर्ट जारी करते हुए आयोग के अध्यक्ष एस.एस. नेगी ने कहा कि ‘बेहतर नौकरी के अवसर, चिकित्सा सुविधाओं, शिक्षा और बुनियादी ढांचे के अभाव के कारण लोग पलायन कर गए.’

पलायन की रफ्तार से चिंतित मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा, यदि हम दूसरे पहाड़ी राज्यों से तुलना करें, तो उत्तराखंड की कुल आबादी का 36.2 हिस्सा प्रवासी बन गया है, जबकि हिमाचल प्रदेश में 36.1 फीसदी, सिक्किम में 34.6 और जम्मू-कश्मीर में 17.8 आबादी का पलायन हुआ है. हालांकि राज्य ने विकास कार्यों की शुरुआत के लिए नौ पहाड़ी जिलों में 35 ब्लॉक की पहचान की है, जो प्रवासन की प्रवृत्ति को उलट सकती है, पर यह कार्य कठिन है.

हाल में हिमाचल प्रदेश के ऊपरी इलाकों में (जहां माना जाता है कि बागवानी और बेमौसम सब्जियां उगाने के लिए करीब 15,000 करोड़ रुपये निवेश किया गया है) अपनी यात्रा के दौरान मैंने कई भुतहा गांव देखे. आलू और सेब की खेती से आई भारी समृद्धि के बावजूद प्रवासन की बढ़ती दर ने मुझे हैरान कर दिया.

हिमाचल में शिमला जिले के रोहरू तहसील में समृद्ध जुब्बल-कोटखाई क्षेत्र में एक छोटा-सा गांव है कियारी. इसे कभी एशिया का सबसे समृद्ध गांव माना जाता था. जुब्बल-कोटखाई क्षेत्र से गुजरते हुए मैंने पाया कि बाहर से जो चीजें दिखती हैं, वे सच नहीं हैं. गांव के गांव खाली पड़े हैं, जहां कुछ बुजुर्ग ही बचे हैं. ज्यादातर घरों के आउट हाउस में नेपाली प्रवासी श्रमिक रहते हैं, जबकि घरों के मुख्य हिस्सों में ताला जड़ा है.

चर्चा के दौरान यह बात उभरकर सामने आई कि समृद्धि के बावजूद ज्यादातर युवा बाहर चले गए. मैंने जब पूछा कि गांव निर्जन क्यों हैं, तो मुझे बताया गया कि शहरी जीवन युवाओं को आकर्षित करता है.

एक बुजुर्ग ने बताया कि बच्चों के लिए दुल्हन ढूंढना मुश्किल हो गया है. ‘आप भले ही सेब की खेती से एक करोड़ रुपये कमाते हों, पर लड़कियों को उसमें दिलचस्पी नहीं है. वे चाहती हैं कि उनका संभावित दूल्हा शहरों में नौकरी करता हो, भले उसकी कमाई कम ही क्यों न हो.’ यह पूछने पर कि आपके गांव की लड़कियां क्या चाहती हैं, उन्होंने बताया, ‘वे भी शहरों के दूल्हों से शादी करना चाहती हैं.’

पलायन

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश विशाल हिमालयी क्षेत्र का अकेला ऐसा हिस्सा नहीं है, जो पलायन की समस्या से जूझ रहा है. सिक्किम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिति इससे अलग नहीं है. आम तौर पर माना जाता है कि शिक्षा और चिकित्सा संबंधी बुनियादी ढांचों की कमी पहाड़ी राज्यों की सबसे बड़ी समस्या है, पर वह आर्थिक ढांचे की उचित समझ का अभाव है, जिसने पहाड़ों की आर्थिक संपत्ति को चूस लिया है.

उदाहरण के लिए, जल को ले लीजिए. हिमालय द्वारा प्रदान किया जाने वाला ताजा पानी एक बहुमूल्य पारिस्थितिकी सेवा है, जिसका उपयोग पर्वत शृंखला के दोनों ओर रहने वाले करीब बीस करोड़ लोग करते हैं और इसके अलावा दस नदी घाटी के निचले इलाकों में रहने वाले 1.3 अरब लोग भी इसका उपयोग करते हैं.

चूंकि ताजा पानी को मुफ्त बारहमासी संसाधन माना जाता है, इसलिए इसके संरक्षण और सुरक्षा के लिए ज्यादा निवेश नहीं किया जाता. तराई के क्षेत्रों में रहने वाले लोग पानी का लाभ उठाते हैं, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोग जल संकट का सामना करते हैं. तो पानी का आर्थिक मूल्य क्यों नहीं लगाया जाता?

एक बार पानी की कीमत निर्धारित हो जाने के बाद राज्य सरकारों को पानी से लाभ मिलने लगेगा, उसके बाद उन्हें पहाड़ी राज्यों में पानी के संरक्षण के लिए बराबर निवेश के लिए कहा जाना चाहिए. इससे पहाड़ी समुदायों के हाथों में ज्यादा पैसा आएगा, जो पहाड़ों पर पैदा होने वाली विशाल जैविक संपदा के संरक्षक हैं.

संयुक्त राष्ट्र ने ‘पारिस्थितिकी से मिलने वाली सेवा के लिए भुगतान’ की अवधारणा सामने रखी है, जिसका अर्थ है पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित, सुरक्षित करने वाले समुदायों को उचित वित्तीय सहायता प्रदान करना.

मेरी सलाह है कि सभी पहाड़ी राज्यों के उच्च न्यायालय इन पायलट प्रोजेक्ट्स की निगरानी करें. बैकों ने बड़े कॉरपोरेट घरानों को दिए 2.72 लाख करोड़ रुपये के बुरे ऋण को बट्टे खाते में डाल दिया, तो उतनी ही राशि पहाड़ी इलाकों को पुनर्जीवित करने के लिए क्यों नहीं दी जा सकती, ताकि ग्रामीण आबादी को आर्थिक रूप से व्यावहारिक आजीविका प्रदान की जा सके?

इसके साथ ही उच्च न्यायालयों को राज्यों की जीडीपी को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की योजना की निगरानी भी शुरू करनी चाहिए. उत्तराखंड ने ऐसी पहल शुरू कर दी है, और अदालत द्वारा एक विशेषज्ञ कमेटी बनाकर इसकी निगरानी करना बेहद उपयोगी होगा.

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