ऐप बचायेगा जच्चा-बच्चा की जान

नई दिल्ली | इंडिया साइंस वायर: क्या कोई मोबाइल ऐप बच्चे की जान बचा सकता है? ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कवरेज और गुणवत्ता में सुधार करके मातृ और शिशु मृत्यु दर कम करने में मोबाइल ऐप मददगार हो सकता है.

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान संस्थान (आईसीएमआर), डब्ल्यूएचओ और गुजरात की गैर सरकारी संस्था सेवा द्वारा संचालित एक मोबाइल ऐप आधारित परियोजना में यह बात उभरकर आयी है.


इस परियोजना के अंतर्गत आशा कार्यकर्ताओं को इम्टेको नामक मोबाइल फोन एप्लीकेशन दिया गया है. यह ऐप प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारियों और डॉक्टरों को मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़े उन आंकड़ों पर नजर रखने में मदद करता है, जिसे आशा कार्यकर्ताओं द्वारा ऐप में फीड किया जाता है.

इस अध्ययन के अंतर्गत आशा कार्यकर्ताओं को ऐप के उपयोग के लिए प्रशिक्षित किया गया था. तकनीकी सपोर्ट से लैस आशा कार्यकर्ताओं की पहुंच जिन घरों में थी, वहां नवजात शिशुओं की देखभाल की कवरेज 56 प्रतिशत थी.

जबकि, अन्य आशा कार्यकर्ताओं के मामले में कवरेज का दायरा महज 10 प्रतिशत पाया गया है. स्तनपान (44 प्रतिशत बनाम 23 प्रतिशत) और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं की सूचना देने के मामले (78 प्रतिशत बनाम 27 प्रतिशत) में भी इस ऐप को प्रभावी पाया गया है.

वर्ष 2013 में शुरू की गई परियोजना के तहत ऐप का उपयोग शुरू किया गया था. कुछ समय पूर्व पूरे गुजरात में इस परियोजना को विस्तारित किया गया है और ऐप का संशोधित संस्करण पूरे राज्य में शुरू किया गया है.

इस वर्ष जनवरी तक राज्य की 4.9 लाख गर्भवती महिलाओं और एक साल तक की उम्र के 6.4 लाख शिशुओं का नामांकन ऐप में किया गया है.

मददगार ऐप

यह ऐप मां एवं उसके बच्चे की निगरानी एवं देखरेख करने में आशा कार्यकर्ताओं, नर्सों और डॉक्टरों की मदद करता है. इस ऐप के उपयोग से जोखिम वाले मामलों को ट्रैक करने, जन्म एवं मृत्यु के पंजीकरण, आशा कार्यकर्ताओं को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि की गणना एवं भुगतान और प्रशिक्षण सामग्री का प्रसार किया जा सकता है.

प्रमुख शोधकर्ता पंकज शाह के अनुसार, “इस अध्ययन से स्पष्ट हो गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत आग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा मोबाइल ऐप के उपयोग से दूरदाज के जनजातीय इलाकों में भी बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और परिणामों की कवरेज में सुधार हो सकता है. हालांकि, इस प्रयोग की सफलता के लिए अच्छा प्रशिक्षण, सहायक पर्यवेक्षण और तकनीकी समस्याओं का तत्काल समाधान जरूरी है.”

राष्ट्रीय हेल्थ मिशन, गुजरात के प्रबंध निदेशक डॉ गौरव दहिया के मुताबिक, “स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के साथ-साथ इस डिजिटल परियोजना का उद्देश्य कामकाज में कागज के उपयोग को कम करना भी है.”

वे कहते हैं- “ऐप के उपयोग से एएनएम और आशा कार्यकर्ताओं के ज्ञान में बढ़ोतरी होने के साथ उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है.”

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