इन जंजीरों को कम करने की जरूरत…

सुनील कुमार
ब्रिटेन और अमरीका में रियलिटी शो बनाने वाले एक बड़े निर्माता साइमन कॉवेल ने अभी राज खोला है कि उन्होंने पिछले दस महीनों से मोबाइल फोन छुआ भी नहीं है. उनका कहना है कि मोबाइल फोन की वजह से एक किसी और चीज का फोकस नहीं कर पा रहे थे, और इससे उनकी दिमागी सेहत पर असर पड़ रहा था. इस दौरान जिन लोगों ने उनके फोन पर कॉल की होगी या मैसेज भेजा होगा, वह सब बेजवाब रह गया होगा क्योंकि ऐसा भी नहीं कि उनकी जगह फोन कोई सहयोगी उठाते हों, फोन बंद ही कर दिया गया. उन्होंने यह भी कहा कि इन दिनों कोई मीटिंग होती है तो उसमें मौजूद तमाम लोग अपने-अपने फोन पर लगे रहते हैं.

यह बात इतनी कट्टरता से अमल के लायक न सही, लेकिन सोचने लायक तो है ही. इन दिनों कई ऐसी पार्टियां भी होती हैं जिनमें लोग अपने फोन इकट्ठे करके मेज पर एक के ऊपर एक धर देते हैं, और यह शर्त लगा देते हैं कि सबसे पहले जो अपना फोन उठाए, वही बिल का भुगतान करे. कई जगहों पर ऐसे नोटिस लिखते दिखते हैं कि वहां पर वाईफाई नहीं है और लोग पुराने दिनों की तरह आपस में बात करें.


अभी कल ही ऐसे एक किसी नौजवान आदमी की खबर आई थी कि वह किस तरह आज तक सिर्फ पुराना छोटा सा मोबाइल फोन, नोकिया 215, ही इस्तेमाल करता है जिसमें महज टेलीफोन कॉल और एसएमएस का ही इंतजाम है. वह अपने आपको नॉनड्राइड कहता है, यानी ऐसा आदमी जो एन्ड्रॉइड इस्तेमाल न करता हो. यह आदमी चेन्नई का एक डिजाइन इंजीनियर है, लेकिन उसने आज तक अपनी एक भी सेल्फी नहीं ली है क्योंकि उसके फोन में ऐसा कैमरा ही नहीं रहा. उसका कहना है कि वह चैन से रात 9 से सुबह 5 तक सोता है, और उसे फोन पर कोई वॉट्सऐप मैसेज या ईमेल देखने का काम नहीं रहता.

कम्प्यूटर टेक्नालॉजी की दुनिया में काम करने वाले कई ऐसे लोग हैं जो अपने फोन अधिक वक्त तक बंद रखने लगे हैं, और इनमें से कुछ का कहना है कि फोन का एयरोप्लेन मोड उनका पसंदीदा मोड है. लोग घंटों अपने फोन को बंद कर देते हैं, और महज संगीत सुनते हुए सफर करते हैं, या खाली वक्त गुजारते हैं.

फ्रांस जैसे देश में कुछ कंपनियों ने कंपनी के ईमेल में ऐसा इंतजाम कर रखा है कि उसके कर्मचारी छुट्टी के वक्त चाहकर भी अपना ईमेल नहीं खोल सकते, और दफ्तर के बाद के वक्त कोई एक-दूसरे को दफ्तर के काम से फोन भी नहीं कर सकते. वजह यह है कि जिंदगी में लोग अगर चाहें तो उनका एक पल भी किसी संदेश या ईमेल के बिना नहीं रह जाता. हर पल किसी कॉल या मैसेज का इंतजार कुछ लोगों पर इतना भारी पड़ता है कि वे पल-पल अपना फोन देखते रहते हैं कि कुछ आया तो नहीं.

बरसों पहले की एक असल जिंदगी की घटना है जिसमें एक क्रूज की सैर पर गई हुई एक कामयाब और संपन्न युवती को जब वहां अपना ईमेल चेक करने की सहूलियत नहीं मिली, तो उसने पास के बंदरगाह से हेलीकॉप्टर बुलवाया, उससे बंदरगाह के शहर तक गई, वहां साइबर कैफे में ईमेल चेक किया जिसमें कि काम का कुछ भी नहीं निकला. लेकिन इसके बाद उसकी बेचैनी खत्म हुई, और वह आगे क्रूज पर सफर का मजा ले पाई.

मोबाइल की कैद
मोबाइल की कैद
कहने के लिए अरबपति और खरबपति लोग तो फोन के बिना रह सकते हैं क्योंकि वे कम ही लोगों के लिए जवाबदेह होते हैं, या शायद किसी के लिए भी नहीं. लेकिन लोग जितने छोटे ओहदों पर रहते हैं, उनकी जवाबदेही उतनी अधिक रहती है, और उन्हें अपने मालिक या सीनियर, ग्राहक या किसी अफसर के कॉल पूरे ही समय उठाने होते हैं. ऐसे मजबूर लोगों को छोड़ दें, तो बाकी लोगों को यह जरूर सोचना चाहिए कि क्या वे अपने मोबाइल फोन के गुलाम नहीं हो गए हैं? एक औजार के गुलाम. जिस औजार को बनाया तो गया था सहूलियत के लिए, लेकिन जिसने थोड़ी सी जरूरी सहूलियत के बाद बाकी का वक्त अपने मालिक को गुलाम बनाने में लगा दिया है.

आज जो बात कुछ बहुत बड़े लोगों के बारे में की जा रही है, उसकी थोड़ी-बहुत नौबत आमलोगों की जिंदगी को भी तबाह कर रही है. अभी कुछ अरसा पहले किसी ने घरों का हाल लिखा था कि अगर परिवार के तमाम लोगों को एक कमरे में इकट्ठा करना हो, तो वाईफाई बंद कर देना एक कारगर तरीका होता है, और सारे लोग यह देखने आ जाते हैं कि उनके फोन या लैपटॉप, या टीवी पर इंटरनेट काम क्यों नहीं कर रहा. इसी तरह खाने की मेज पर भी जब तमाम लोग अपने-अपने फोन पर जुटे रहते हैं तब भी यह बात कही जाती है कि परिवार को कम से कम इतनी देर के लिए सारे फोन बंद करके अलग रख देने का काम करना चाहिए.

जो लोग फोन के बिना चैन से रह नहीं सकते, उन्हीं लोगों को फोन के बिना रहना सीखने की अधिक जरूरत दिखती है. ऐसे लोगों को यह तय करना चाहिए कि वे दिन के कितने घंटे डिजिटल-उपवास कर सकते हैं? और ऐसा करते हुए जब वे अपनी बेचैनी पर काबू पाने लगेंगे, तो वे अपना ध्यान दूसरी चीजों पर, दूसरी बातों पर, जिंदगी के दूसरे खूबसूरत पहलुओं पर लगा पाएंगे. आज हालत यह है कि लोग अगर सैर-सपाटे को भी जाते हैं, तो वहां उनका ध्यान उन जगहों को देखने के बजाय उन जगहों के सामने अपने आपको देखने में लगे रहता है, अपने फोन के कैमरे के रास्ते. जहां आसपास का कुछ और खुली आंखों से दिखना ही कम होने लगे, और लोग बिना कैमरा-फोन के अपने आपको अधूरा महसूस करने लगें, वहां पर लोगों को अपनी जीवनशैली में ऐसे फेरबदल की जरूरत है जिससे कल को जाकर किसी इलाज की जरूरत से बचा जा सके.

फोन तो महज एक मिसाल है, फोन, लैपटॉप, सोशल मीडिया, डिजिटल संगीत, ये जिंदगी को कैद करके रखने वाले जंगले की ऐसी सलाखे हैं जो कि दिखने में सुहानी लगती हैं, लेकिन जो असल जिंदगी से दूर, एक डिजिटल और साइबर जेल में कैद करके रख देती हैं. आज बहुत से लोगों को यह सोचने की जरूरत है कि क्या उनके सोशल मीडिया के ऑनलाईन दोस्त असल जिंदगी के दोस्तों के मुकाबले न सिर्फ गिनती में अधिक हैं, बल्कि वे ही उनके असली दोस्त रह गए हैं, और असल जिंदगी का दायरा किस तरह से गैरजरूरी लगने लगा है. इस सिलसिले में जापान की नई पीढ़ी का हाल देखने की जरूरत है जहां पर वे तमाम बातें, तमाम काम ऑनलाईन करते हुए सामाजिक अंतरसंबंधों से इस कदर कट गए हैं कि न किसी को असल जिंदगी की दोस्ती की जरूरत लग रही, न प्रेम संबंध जरूरी लग रहे, न ही सेक्स की जरूरत लग रही, और इन तमाम बातों के चलते शादी भी गैरजरूरी हो गई है. नौबत इतनी खराब हो गई है कि जापान में अगली पीढ़ी आएगी कहां से, यह फिक्र हो चली है.

हर किसी को अपनी-अपनी जिंदगी में इन जंजीरों को कम करने की जरूरत है, और परिवार, दोस्ती के संबंधों की डोर को याद रखने, भूल जाने से बचने की भी जरूरत है. डिजिटल-साइबर दुनिया एक आभासी दुनिया है, और दिन के अधिक घंटे इसमें गुजारना असल जिंदगी के उतने घंटे असल जिंदगी से छीन लेने सरीखा है.

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