नमो का मनमोहनी बजट

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के लोगों की बजट पर मिली-जुली प्रतिक्रिया है. गुरुवार को पेश किये गया बजट पर कृषि मामलों के जानकार छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के नंद कुमार कश्यप का कहना है कि बजट में रोजगार सृजन के लिये चिंता जरूर जताई गई है परन्तु रोजगार बढ़ाने के लिये किसी ठोस योजना की घोषणा नहीं की गई है.

कृषि के गोदामों के लिये 500 करोड़ रुपये आबंटित किये जाने पर उन्होंने इसे भारत जैसे विशाल देश के लिये ऊंट के मुंह में जीरा बताया है. इसके अलावा कृषि के ढ़ांचा के विकास के लिये 100 करोड़ रुपये देने की बात को भी उन्होंने महज एक औपचारिकता करार दिया है.

मोदी सरकार के पहले बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए बीमा कर्मचारी यूनियन के सेन्ट्रल जोन के महासचिव तथा छत्तीसगढ़ के रायपुर निवासी बी सान्याल ने कहा कि बीमा क्षेत्र में कांग्रेस ने जब 49 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लाने की कोशिश की थी तब भाजपा ने उसका विरोध किया था. आज वहीं भाजपा सत्ता में आने के बाद बीमा में 49 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने जा रही है. एस सान्याल ने पूरे बजट को चुनावी घोषणाओं के विपरीत बताया है.

सान्याल सवाल करते हैं कि गरीबी तथा महंगाई को कम करने के लिये कौन से कदम उठाये जा रहें हैं. उन्होंने पूछा कि कंम्प्यूटर को सस्ता करने से भूख नहीं मिटती है. भूख को मिटाने के लिये आटा-चावल-दाल और नमक का मूल्य कम करना होगा. जिसके लिये आम बजट में किसी तरह का भी दिशा-निर्देश नहीं दिया गया है.

छत्तीसगढ़ के दुर्ग शहर में रहने वाली महिला सामाजिक कार्यकर्ता बानी सोनी ने एनडीए द्वारा पेश बजट को कमोबेश सही ठहराया है. उन्होंने सरकार के बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओं योजना की तारीफ करते हुए इसे समाजिक उत्थान लाने वाला कदम बताया है. महंगाई पर उनका कहना है कि इन दिनों में महंगाई बढ़ी है तथा उसमें कमी भी आयी है.

बानी सोनी, सरकार को महंगाई कम करने के लिये समय देना चाहती है. उनका कहना है कि सरकार गठन के तुरंत बाद ही उससे महंगाई को गायब कर देने की आशा करना ठीक नहीं है.

सामाजिक कार्यकर्ता बानी सोनी ने महंगाई का संबंध रसोई घर से स्वीकारते हुए कहा है कि देश की अर्थव्यवस्था में जब तक सुधार नहीं हो जाता है, महंगाई बनी रहेगी.

छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहने वाले धर्मेंद्र महापात्र जिन्हे राजधानी की सड़कों पर जनता के लिये आवाज उठाते अकसर देखा जा सकता है का कहना है कि बजट में राजकोषीय घाटे को 3.6 फीसदी पर लाने की बात की जा रही है. इनके अनुसार इसके लिये सरकारी खर्च को कम किया जाने वाला है. जाहिर है कि सरकारी खर्च को सब्सिडी में कटौती के माध्यम से ही कम किया जाना है. जिसका बोझ सीधे-सीधे जनता पर पड़ना तय है.

इसके अलावा धन जुटाने के लिये बैंको का निजीकरण करने का भी प्रस्ताव है. कुल मिलाकर उन्होंने इसे मनमोहन सिंह के बजट के समान ही माना है जिससे अच्छे दिन आना मुश्किल है.

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