संघ से निस्संग सरदार

कनक तिवारी
एक सर्वश्रुत कथा के अनुसार वेताल लगातार विक्रम से अपनी समझ के कठिन सवाल पूछता है. उसकी खोपड़ी टूटने की धमकी भी देता चलता है. हर बार उत्तर सही होने से वेताल विक्रम के कंधे से उचककर पेड़ पर बैठकर नए सवालों की साज़िश करने लगता है. पारम्परिक ज्ञान के अनुसार सांप बिल नहीं बनाते. जिसके बिल में घुसते हैं, उसका शिकार कर लेते हैं. फुफकारते तो लगातार रहते हैं.

ये मिथक राजनीति के सबसे मर्द बताए जा रहे सरदार पटेल पर लोग चस्पा करते हैं. वे अजेय हैं. उनके अहिंसक विचार गृह में विषमय धाराएं घुसपैठ कर रही हैं. उनकी मृत्यु 15 दिसम्बर 1950 के पिछले पांच बरसों में गांधी, नेहरू और पटेल की त्रयी ने भारतीय राजनीति को अपने कांधे पर उठा लिया था. पांच विधानसभा चुनावों और होने वाले लोकसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में संघ परिवार की नई खोज नरेन्द्र मोदी ने सरदार पटेल को, भगवान राम को नहीं, अपने ट्रम्पकार्ड के रूप की नई खोज बनाया है.


शतरंज की जबान में सभी विरोधियों को परास्त करने के लिए भाजपाई वज़ीरे आज़म सरदार के मोहरे को ढाई घर चल रहे हैं. उन्हें एक साथ गुजराती अस्मिता का राष्ट्रीय संस्करण, किसान नेता और पिछड़े वर्ग का मसीहा बनाकर संघ परिवार की चैपड़ में पौ बारह कहने के ठहाके लग रहे हैं. सरदार को कहां मालूम था कि उन्हें एक साथ गुजराती सरोवर के केन्द्र में वैश्विक तकाजों की सबसे ऊंची लौह मूर्ति बनना होगा. ओबामा यदि मोदी को अमेरिकी विसा दे देते, तो सरदार के बदले सरकार को तरजीह मिलती.

नरेन्द्र मोदी का हिन्दू राष्ट्रवादी फतवा है कि सरदार पहले प्रधानमंत्री होते तो देश की हालत और कुछ होती. आशय नेहरू के शासन की खुली भत्र्सना है. संगठन का बहुमत पटेल के साथ होने पर यह गांधी का निर्णय था. इस तरह गांधी नरेन्द्र मोदी की निन्दा के असली पात्र हैं. उनके कथन का उल्था यह भी हो सकता है कि यदि गांधी 15 अगस्त 1947 के पहले मार डाले गए होते तो संभव है पटेल उनके निकटतम शिष्य होने तथा कांग्रेस पर अपनी मज़बूत पकड़ के चलते प्रधानमंत्री बन सकते थे. यही वजह है कि छद्म हिंसा के युयुत्सु पैरोकार मोदी ने गांधी की स्मृति में गुजरात में अहिंसा विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा को अंतरिक्ष में बह जाने दिया.

चुनाव आचार संहिता का गुजरात में अनुपालन नहीं है. मोदी के नेहरू विरोधी तथा गांधी निन्दक भाषण के पूर्वाभास के चलते पहली बार प्रधानमंत्री ने कांग्रेसपार्टी का सदस्य होने में गौरव का इज़हार किया. डॉ. मनमोहन सिंह ने सरदार की धर्मनिरपेक्षता को भी मौज़ूदा संदर्भों में राष्ट्रीय आदर्श बताया. प्रोटोकॉल के चलते मोदी ने पहले भाषण दे दिया था. लिहाज़ा वल्लभभाई पटेल के जन्मदिन 31 अक्टूबर को प्रस्तावित लौह मूर्ति का शिलान्यास करते मोदी ने व्यंग्य को चबाते हुए कहा कि देश को सरदार पटेलनुमा धर्मनिरपेक्षता चाहिए, वोट बैंक की धर्मनिरपेक्षता नहीं.

सरदार का निधन पहले आम चुनाव के पहले ही हो गया था. उन्होंने तथाकथित अल्पसंख्यक वोट बैंक को इसीलिए संबोधित भी नहीं किया था. उनकी तथा नेहरू की धर्मनिरपेक्षता के गैरविद्यमान अंतर को तिल का ताड़ बनाया जा रहा है जो इतिहास में पटेल की सीधीसपाट, तल्ख और सत्यवादिता से भरी वाणी के कारण चैड़ा किया जा रहा है. मोदी सीधे 2013 में सरदार पटेल को जैसे का तैसा रोपने के फेर में उनको ऐतिहासिकता से च्युत कर देते हैं.

आज़ादी के पहले और बाद के अढ़ाई अढ़ाई वर्षों में नेहरू के अतिरिक्त पटेल को ही संविधान सभा के गठन और कार्यवाही, भारत विभाजन की त्रासदी, सांप्रदायिक दंगों की श्रृंखला, ब्रिटिश बुद्धि की कूटनीति, देसी रियासतों के विलीनीकरण, कश्मीर में कबायली आक्रमण, गांधी हत्या से उपजी परिस्थितियां और धुर दक्षिण तथा वामपंथ की गतिविधियों से एक राय होकर जूझना पड़ा था. नेहरू कम्युनिस्टों और मुस्लिमों के प्रति उतने मुखर नहीं थे.

सरदार नेहरू के मुकाबले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और हिन्दू महासभा के प्रति नहीं. यही वह बारीक छिद्र है जिसमें अपनी खोजी दूरबीन लेकर घुसने से संघ परिवार को एक वृहद अंधेरी गुफा में प्रवेश कर नायाब तर्क ढूंढ़ लाने का वाचाल आत्म गौरव प्राप्त होने लगता है.

विभाजन के चार दिन पहले दिल्ली में सरदार ने कहा था कि सरकारी ओहदे पर बैठे कई मुसलमानों की सहानुभूति मुस्लिम लीग के साथ है. यह भी कि देश को विनाश से बचाने के लिए कांग्रेस ने बहुत मजबूर होकर मुल्क का विभाजन स्वीकार किया है. मुसलमानों की जड़ें हिन्दुस्तान में ही हैं. यहीं उनके धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल इतिहास के गर्भगृह में हैं.

आज़ादी के छह महीने बाद वल्लभभाई ने मेहरौली की सभा में उदास मन से कहा था कि सांप्रदायिक दंगों के कारण वे शर्मसार हैं. हिन्दुओं को चाहिए कि वे मुसलमानों को इस देश में असुरक्षित महसूस नहीं होने दें. साफगोई के प्रवक्ता सरदार ने गांधी की हत्या के पहले कलकत्ता की जनसभा में माना था कि देश में हिन्दू राज्य कभी स्थापित नहीं होगा. लेकिन इस देश के साढ़े चार करोड़ मुसलमानों में से कई पाकिस्तान के निर्माण के समर्थक रहे हैं. यह कैसे भरोसा किया जाए कि उनकी धारणा रातों रात बदल गई होगी. मुसलमान कहते हैं कि वे भारत के प्रति वफादार हैं. इसे कहने की क्या ज़रूरत है. उन्हें खुद अपनी आत्मा में झांकना चाहिए.

सरदार इस तरह की टिप्पणियां बेहद निष्कपट भाव से करते थे. उनके व्याख्याकार तत्कालीन परिस्थितियों से केन्द्रीय नेता के रूप में जूझ रहे लौह पुरुष की कठिनाई को समझे बिना उसे मौज़ूदा हिन्दुस्तान के हालात में अंतरित करते हैं. उन्होंने गांधी की हत्या के एक पखवाड़े पहले मुंबई में दो विरोधाभासी बातें देशभक्ति के तरन्नुम में डूबकर की थीं. एक ओर उन्होंने कहा कि यहां कुछ लोग मुस्लिम विरोधी नारे लगा रहे हैं. ऐसे वहशी इरादों वाले क्रोधियों से तो पागल ज़्यादा अच्छे हैं जिनका इलाज तो किया जा सकता है.

फिर ठहरकर उन्होंने मुसलमानों को भी झिड़का और कहा कि वे मुसलमानों के दोस्त हैं. मुसलमान यदि उन्हें वैसा नहीं आंकते तो वे भी पागल आदमियों की तरह हैं क्योंकि उनमें सही और गलत को समझने का विवेक नहीं है.

सबसे मुश्किल और महत्व का काम वल्लभभाई के लिए हैदराबाद में प्रतीक्षा कर रहा था. देसी रियासतों के विलीनीकरण के कर्ताधर्ता ने आज़ादी के दो बरस बाद हैदराबाद की जनसभाओं में हिन्दू-मुस्लिम एकता की पुरज़ोर समझाइश दी. अलबत्ता यह ज़रूर कहा कि मुसलमानों को भी अपना हृदय परिवर्तन करना चाहिए. उन्हंें पाकिस्तान और कश्मीरी मुसलमानों को भी हिंसा से विरत होने की समझाइश देनी चाहिए. भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में हिन्दू और मुसलमान के संवैधानिक अधिकारों में कोई फर्क नहीं है.

सरदार आर. एस. एस. की भूमिका को लेकर एक साथ आशंकित और आशान्वित थे. यह मनःस्थिति उन्हें नेहरू से अलग करती है. संघ परिवार और मोदी को ऐसे दृष्टिकोणीय अंतर को वैचारिक दरार कहना बहुत सुहा रहा है. सरदार ने ही जयपुर में कहा था कि उन्हें संघ के खिलाफ कई शिकायतें मिली हैं. यदि आग नहीं होगी तो धुआं कैसे होगा. संघ की लाठियों से मुट्ठी भर मुसलमानों के सिर तोड़ देने से देश की प्रगति नहीं होती. यदि नौजवान संघ के अनुयायी हो जाएंगे तो वह देश की कुसेवा होगी.

लखनऊ की बहुचर्चित सभा में पटेल ने संघ को कांग्रेस में शामिल होने का निमंत्रण भी दिया था. ऐसा आज तक किसी अन्य कांग्रेसी नेता ने नहीं किया. उन्होंने कांग्रेसियों से भी कहा कि वे संघ के स्वयंसेवकों को चोर या डाकू नहीं समझें. वे देशभक्त हैं. इसलिए उन्हें डंडे से हकालने का ख्याल ही छोड़ देना चाहिए. चूंकि लखनऊ में ही भारत विभाजन का विचार मुसलमानों के बीच पनपा था. इसलिए सरदार ने तल्खी में उनसे सवाल किया कि वे अपने सम्मेलनों में पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में चलाई जा रही हिंसक गतिविधियों का विरोध क्यों नहीं करते.

इस मुद्दे को लेकर मुस्लिम संगठनों ने गांधी जी से सरदार पटेल की शिकायत भी की थी. स्पष्टवादी के बदले इतिहास में मुंहफट करार दे दिए गए सरदार ने मद्रास की जनसभा में यह भी तो कहा था कि संघ इस देश में जबरिया हिन्दू राज्य अथवा हिन्दू संस्कृति को थोपना चाहता है. उसे कोई सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी. उन्होंने आर. एस. एस. को यह भी झिड़की दी थी कि वह अपने कार्यक्रम बदले. गोपनीयता को तिलांजलि दे. सांप्रदायिक संघर्ष से हटे. संविधान का सम्मान करे और राष्ट्रध्वज के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करे जिससे सरकार का उस पर भरोसा कायम हो. कहना कुछ और करना कुछ की शैली उसे छोड़नी होगी.

ऐसी ही समझाइश उन्होंने कम्युनिस्टों को भी दी थी. इससे ज़ाहिर है कि प्रतिबंध हटाने के बावज़ूद संघ सरदार के लिए वह विश्वसनीयता पैदा नहीं कर सका जिसकी वे उम्मीद करते थे. ऐसे में सरदार पटेल ब्रांड धर्मनिरपेक्षता और नेहरू ब्रांड धर्मनिरपेक्षता इतिहास की दो अलग अलग अवधारणाएं कैसे ठहराई जा सकती हैं.

‘एक तीर से दो शिकार‘ के मुहावरे का पहाड़ा मोदी को खूब आता है. गांधी तो उपेक्षा, विस्मृति और हिकारत की अंधेरी गलियों में गुजरात में धकेले ही जा रहे हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी सत्तानशीन नेहरू-गांधी परिवार पर हमला करना मोदी के लिए डार्विन की थ्योरी को श्रद्धांजलि देना है. विश्व की उच्चतम लौह-प्रतिमा के चरणों के पुजारी मोदी ने अपने अग्रज तथाकथित लौह पुरुष आडवाणी को भी उनके विशेषण-पदक से वंचित कर दिया है.

सरदार के बाद नरेन्द्र मोदी इतिहास के लौह पुरुष बनने की महत्वाकांक्षा और गलतफहमी के बीच पेंगें भर रहे हैं. केन्द्र की कांग्रेसी सरकारों पर सरदार की स्मृति की उपेक्षा का आरोप लग सकता है. लेकिन गुजरात में ही सत्ता की हैट्रिक लगाने वाले मोदी अब तक कहां थे? आडवाणी ने सोमनाथ का राजनीतिक शोषण किया. कृष्ण द्वारिका पहुंचकर रणछोड़दास हो गए. इसलिए राम का मंदिर बनाना मुफीद लगा. सुप्रीम कोर्ट और देश के मतदाता राम मंदिर के प्रयोजन को क्लिक नहीं करने देते. तब किसी दीवाने खास में बैठकर सरदार पटेल का यश-चंदन अपने माथे लीपने की जुगत बनी. सच है सरदार! केवल अंगरेज़ ही ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति के अन्वेषक नहीं हैं.

*लेखक देश के महत्वपूर्ण गांधीवादी चिंतक और संविधान विशेषज्ञ हैं.

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