जब ‘चुस्त’ हुआ ‘सुस्त’ मंत्रालय

नई दिल्ली | बीबीसी: मोदी सरकार का पर्यावरण और वन मंत्रालय सबसे तेज गति से काम निपटा रहा है. इसी कारण से यह आलोचना का केन्द्र भी बनता जा रहा है. इस मंत्रालय ने अपने पास आये 1116 प्रोजेक्ट में से 737 को अंतिम मंजूरी के लिये भेजा है. इस दरमियान महाराष्ट्र तथा गुजरात के पर्यावरण और वन मंत्रालय से संबंधित प्रोजेक्टों की सबसे ज्यादा हरी झंडी दी गई है. भारत के पर्यावरण और वन मंत्रालय को लेकर पिछले कई वर्षों से एक लंबी बहस छिड़ी है. पिछली यूपीए सरकार में एक के बाद एक कई मंत्रियों ने इस मंत्रालय को अपने तरीके से चलाया और उसके बाद वो यहाँ से दूसरी जगह ‘भेज’ भी दिए गए.

जयराम रमेश, जयंती नटराजन और वीरप्पा मोइली समेत फ़ेहरिस्त लंबी है.


जब बारी भाजपा सरकार के मंत्री प्रकाश जावडेकर की आई तो एकाएक माहौल में बदलाव भी दिखा और आलोचना के मुद्दे भी बदले. पर्यावरण और वन मंत्रालय एक ऐसा ही मंत्रालय है जिस पर अब ये सवाल भी उठने लगे हैं कि यहाँ प्रस्तावों को मंज़ूरी मिलने का सिलसिला कुछ ज़्यादा ही तेज़ है.

हालांकि ख़ुद केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर इन आरोपों को ये कह कर नकारते हैं, “पिछली सरकार में मंज़ूरी मिलने की प्रक्रिया लचर थी इसलिए अब एक गलत राय बनती जा रही है.”

‘हरी झंडी का दौर’
मोदी सरकार के सत्ता सँभालते ही पर्यावरण मंत्रालय पर सबकी नज़र थी. 4 जुलाई से लेकर अब तक हरियाणा के 18, उत्तराखंड के 11, बिहार के 1, पश्चिम बंगाल के 10, गुजरात के 44, ओडीशा के 6, तेलंगना के 12, असम के 1, तमिलनाडु के 12, आंध्रप्रदेश के 8, कर्नायक के 7, महाराष्ट्र के 78, राजस्थान के 9, दिल्ली के 9, उत्तरप्रदेश के 5, झारखंड के 3, केरल के 7, पंजाब के 5, छत्तीसगढ़ के 5, मध्यप्रदेश के 2 तथा हिमाचल प्रदेश के 1 प्रोजेक्ट पास किये गये.

पिछली यूपीए सरकार में कई मंत्रियों का ‘तबादला’ इसलिए किया गया था कि सरकार के भीतर और विपक्ष से आरोप लग रहे थे कि फ़ैसले रुकने से देश-दुनिया में नकारात्मक संदेश जा रहा है.

साथ ही तमाम विदेशी निवेशकों ने भारत में ‘रुकी हुई फ़ाइलों’ के चलते अपना पैसा कहीं और लगाना शुरू कर दिया था.

शायद यही वजह रही कि प्रकाश जावडेकर के मंत्रालय ने शुरू से ही मामलों के जल्द निपटारे पर ध्यान दिया.

आरोप भी लगे हैं
पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कई बार कहा है कि उनके मंत्रालय में परियोजनाओं को हरी झंडी देने के लिए किसी तरह का ‘पर्यावरण टैक्स’ नहीं लगता.

जावडेकर के निशाने पर यूपीए सरकार रही है क्योंकि ख़ुद नरेंद्र मोदी ने प्रचार के समय पर्यावरण मंत्रालय के फ़ैसलों पर आरोप लगाए थे.

बहरहाल, प्रकाश जावडेकर के मंत्रालय में एकाएक आई ‘स्फूर्ति’ को अब कांग्रेस भी निशाना बना रही है.

पूर्व पर्यावरण मंत्री और कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बीबीसी से बातचीत में ‘भाजपा की पर्यावरण संबंधी जल्दबाज़ी’ पर सवाल उठाए थे’.

पर्यावरण के ‘मायने’
जाने माने पर्यावणविद् हिमांशु ठक्कर को लगता है कि सैकड़ों ग्रीन परियोजनाओं को पास कर देने भर से समस्या का निदान नहीं होगा.

उन्होंने कहा, “पर्यावरण सिर्फ़ बाघ, पेड़ों या जंगलों को बचाना नहीं है. पर्यावरण में लाखों-करोड़ों ग़रीब भी शामिल हैं जिनकी ज़िंदगी इस पर निर्भर रहती है. अगर सरकार ये कहे कि इन फ़ैसलों से उन ग़रीबों की भी भलाई होगी तब तो कोई बात है.”

अब रहा सवाल कि पर्यावरण सम्बन्धी परियोजनाओं को हरी या लाल झंडी दिखाने में यूपीए और एनडीए में से किसका रोल कैसा रहा है.

हिमांशु ठक्कर के अनुसार दोनों के फ़ैसलों को एक दूसरे से बेहतर कहना बिलकुल ग़लत होगा.

उन्होंने कहा, “प्रस्तावों को नकारने में दोनों ही सरकारों की औसत दर लगभग समान ही रही है. लेकिन अगर भाजपा सरकार को कुछ सकारात्मक करना है तो इन हरी झंडियों का असर भारत के जीडीपी और विकास दर में दिखाई देना चाहिए”.

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