अब क्या कहेंगे मोदी

लखनऊ | एजेंसी: उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी शहजादों की एक लंबी फेहरिस्त है. कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप लगाने वाले नरेंद्र मोदी की भाजपा इन शहजादों के बोझ तले दबती जा रही है क्योंकि इनके कार्यो से संगठन को फायदा पहुंचता नहीं दिख रहा है.

उप्र की भाजपा इकाई को इन शहजादों को उनके पिताओं के रसूख की वजह से तवज्जो देना पड़ रहा है. इसके चलते पार्टी का आम कार्यकर्ता पीछे छूट गया है. पार्टी सूत्रों की मानें तो जमीनी स्तर पर पार्टी के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता इन शहजादों से त्रस्त हैं, लेकिन इनके पिताओं के कद और रसूख के चलते कोई भी प्रदेश अध्यक्ष इनके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं दिखाता.

अपने पारिवारिक रसूख का इस्तेमाल करने शहजादे कहीं भी घुस जाते हैं और आम कार्यकर्ता जो दिन रात पार्टी के लिए काम करता है, उन्हें पार्टी में उचित सम्मान और स्थान नहीं मिल पाता जो उन्हें मिलना चाहिए.

उप्र भाजपा में शहजादों की एक लम्बी फेहरिस्त है. राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, स्थानीय सांसद लालजी टंडन के बेटे गोपाल टंडन, पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह, रमापति राम त्रिपाठी के बेटे शरद त्रिपाठी ऐसे ही शहजादे हैं.

राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज ने हालांकि अभी कहीं से चुनाव नहीं लड़ा है लेकिन इनकी प्रतिभा पर भी हमेशा से ही सवाल खड़े होते रहे हैं. प्रदेश महामंत्री की कुर्सी पर काबिज पंकज ने अपने कार्यकाल में ऐसा कोई काम नहीं किया है, जिससे उनकी एक अलग पहचान बन सके. पिता के रसूख की वजह से हमेशा वह पार्टी में महत्वपूर्ण पद पाने में कामयाब हो जाते हैं. इनके बारे में कार्यकर्ताओं की यही सोच है कि ये अपने आपको प्रदेश अध्यक्ष से भी बड़ा समझते हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पुत्र राजबीर सिंह भी उप्र भाजपा में उपाध्यक्ष के पद पर काबिज हैं. इनको भी इनके पिता की वजह से ही यह स्थान मिला है. इनके काम से भी न तो संगठन को कोई फायदा पहुंचता दिख रहा है और न कार्यकर्ताओं का विश्वास जीतने में ही वह कामयाब रहे हैं. इन शहजादों को सिर्फ ऊंचे पद और पद के रसूख से मतलब है.

राजबीर पिछले विधानसभा चुनावों में अपनी किस्मत आजमा चुके हैं, और काफी जद्दोजहद के बाद भी यह चुनाव हार चुके हैं.

राजबीर के अलावा राजधानी लखनऊ से सांसद लालजी टंडन के सपुत्र गोपाल टंडन भी पिछला विधानसभा चुनाव उत्तरी विधानसभा सीट से लड़े थे लेकिन जनता पर इनका भी जादू नहीं चल पाया. हार के बावजूद इनके पिता की रसूख की वजह से ही इन्हें वाजपेयी की टीम में प्रदेश उपाध्यक्ष की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई लेकिन अभी तक ये अपने काम से कार्यकर्ताओं के बीच भी लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाए हैं.

प्रदेश के एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं कि बात नेता पुत्रों को अहमियत देने की नहीं है, अगर इनमें काबिलियत है तो संगठन को जरूर इनको जिम्मेदारी देनी चाहिए. खास बात यह है कि ये सभी लोग अपने काम के दम पर छवि बनाने में नाकामयाब रहे हैं और शायद इसीलिए आज यह सवाल भी खड़ा हो रहा है. पिता के रसूख का फायदा तो सभी को मिलता है और इन्हें भी मिला है.

इनके अलावा उप्र चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी के सुपुत्र शरद त्रिपाठी भी एक चर्चित शहजादे के तौर पर उभरकर सामने आए हैं. पिछला लोकसभा चुनाव इन्होंने खलीलाबाद से लड़ा था लेकिन चुनाव हार गए. हालांकि तमाम कोशिशों के बावजूद संगठन में इन्हें कोई पद नहीं मिल पाया.

राजनाथ से करीबी रिश्ते होने के कारण इनके पिता को हालांकि उप्र चुनाव प्रबंध समिति का अध्यक्ष बना दिया गया.

इन नेता पुत्रों के अलावा पूर्व मंत्री प्रेमलता कटियार की पुत्री नीलिमा कटियार भी अपनी मां की बदौलत उप्र संगठन में अहम पद पाने में कामयाब रही हैं, लेकिन संगठन में इनका काम लोगों के गले नहीं उतर रहा है. नीलिमा इस समय प्रदेश मंत्री के पद पर काबिज हैं.

इधर, प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजेपयी ने कहा कि ऐसा नहीं है. जिन लोगों की आप बात कर रहे हैं, वह सभी अपने-अपने क्षेत्र में अच्छा काम कर रहे हैं. इनका काम सराहनीय है और इनके काम की बदौलत ही इन्हें अहम जिम्मेदारी दी गई है. इन सबके काम का संगठन को पूरा लाभ मिल रहा है.

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