पीएम मोदी का ‘मिशन मैडिसन स्क्वॉयर’

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता: प्रधानमंत्री मोदी 28 सितंबर को मैडिसन स्क्वॉयर में भारतवंशियों को संबोधित करेंगे. भारत के लोकसभा चुनाव में अपने मिशन 272+ के माध्यम से सत्तारूढ़ होने वाले प्रधानमंत्री मोदी के सामने अब ‘मिशन मैडिसन स्क्वॉयर’ है. जिसके माध्यम से मोदी अपने विदेश नीति की धाक दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र, अमरीका में जमाने में जमाने जा रहें हैं. गौरतलब है कि 2005 में नरेन्द्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान इसी मैडिसन स्क्वॉयर में उनकी सभा होनी थी परन्तु अमरीकी प्रसासन ने उन्हें वीजा देने से इंकार कर दिया था. उसके बाद से न्यूयार्क के हडसन नदी तथा वाराणसी में गंगा का पानी काफी बह चुका है.

इस बीच नरेन्द्र मोदी, वाराणसी से सांसद बनकर भारत के प्रधानमंत्री के पद पर बैठे हैं. जाहिर सी बात है कि जिस मुख्यमंत्री मोदी को वीजा देने से इंकार कर दिया गया था वह अब सांसद गंगा किनारे वाला बन चुकें हैं. इससे अमरीकी नीतियों में बदलाव लाना खुद अमरीका के हित में है. उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी न्यूयार्क के मैनहटन के मैडिसन स्क्वॉयर में वर्ष 2005 में जिस कुर्सी पर बैठने वाले थे, 28 सितंबर को उसी कुर्सी पर बैठेंगे. अमरीका में उनके समर्थकों ने वह कुर्सी अब तक संभाल कर रखी हुई है.

प्रधानमंत्री मोदी के लिये एक घूमने वाले मंच की व्यवस्था विशेष तौर पर की गई है जिसमें खड़े होकर वे करीब 20हजार लोगों को संबोधित करेंगें. इससे पहले किसा देश के प्रधानमंत्री ने मैडिसन स्क्वॉयर में लोगों को संबोधित नहीं किया था. यह वही मैडिसन स्क्वॉयर है जिसमें मुक्केबाज कैसियस क्ले ने अपने प्रतिद्वंदी जो को पराजित किया था. इसी मैडिसन स्क्वॉयर में प्रसिद्ध पॉप गायक माइकल जैक्शन ने अपने शो के माध्यम से धमाका किया था. इसी मैडिसन स्क्वॉयर में पोप जॉन पाल द्वितीय ने अपने अनुयाइयों को संबोधित किया था. और तो और, इसी मैडिसन स्क्वॉयर में मर्लिन मुनरो ने अपना प्रसिद्ध गाना ‘हैप्पी बर्थ डे टू यू’ गाया था. जाहिर सी बात है कि मैडिसन स्क्वॉयर इतिहासिक तौर पर अपना अलग महत्व रखता है.

उल्लेखनीय है कि मोदी की छवि एक प्रखर राष्ट्रवादी नेता की है. केवल छवि ही नहीं उनके लोकसभा चुनाव प्रचार में इसकी स्पष्ट झलक भी मिली थी. राष्ट्रवाद अपने साथ सकारात्मक जिद लिये हुए होता है. इसे प्रधानमंत्री मोदी की उसी न्यूयार्क के उसी मैडिसन स्क्वॉयर में सभा करने की योजना से समझा जा सकता है जहां पर उन्हें जाने से 2005 में रोक दिया गया था.

प्रधानमंत्री मोदी की मैडिसन स्क्वॉयर के सभा के लिये जितनी तैयारी की जा रही है तथा जिस प्रकार से उसका प्रचार किया जा रहा है कि उसमें यह सत्य दब सा गया है कि वास्तव में वे 27 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र संघ के महासभा को संबोधित करने जा रहें हैं. प्रचार तंत्र इतना शक्तिशाली है कि प्रधानमंत्री मोदी की उपलब्धि केवल मैडिसन स्क्वॉयर में 20हजार की भीड़ को संबोधित करना ही है. प्रधानमंत्री मोदी 25 सितंबर को अपनी अमरीका के प्रवास पर रवाना हो रहें हैं. उनके 30 सितंबर तक अमरीका में करीब 50 कार्यक्रम होना है.

जाहिर सी बात है कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का भी एक छुपा हुआ ‘मिशन मोदी’ है जिसके तहत वह अमरीका के लिये भारत से बहुत कुछ बटोर कर ले जाने की उम्मीद लगाये बैठे हैं. अमरीकी प्रशासन इस बात के लिये भारतीय नीतियों की आलोचना करता रहता है कि उनके देश के बौद्धिक संपदा को भारत में उचित सम्मान नहीं दिया जा रहा है.

इसी बात को यदि बिना किसी लाग-लपेट के कहा जाये तो अमरीका चाहता है कि उसके देश की जीवन रक्षक दवाओं को भारत में एकाधिकार मिले जो भारतीय कानून के अनुसार संभव नहीं है. उलट पूर्व में तो मनमोहन सिंह के जमाने में विदेशी कैंसर की दवा के लिये एक भारतीय दवा कंपनी को अनिवार्य लाइसेंस के तहत उसे कम कीमत में बनाकर बेचने की अनुमति दी गई थी. यही वजह है कि अमरीका के विवादास्पद ‘स्पेशल 301’ की सूची में भारत को उन देशों में शामिल करके रखा गया है जिन पर कड़ी नजर रखी जानी चाहिये.

अब देखना यह है कि प्रधानमंत्री मोदी जिस तरह से मैडिसन स्क्वॉयर पर डंका बजाने जा रहें हैं उसी गति को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ चर्चा के दौरान भी बरकरार रख पाते हैं कि नहीं. प्रधानमंत्री मोदी के पास जिस तरह से ‘मिशन मैडिसन स्क्वॉयर’ है उसी तकह से अमरीकी राष्ट्रपति भी अपने ‘मिशन मोदी’ के लिये तैयारी कर रहें हैं अर्थात् टकराव दो मिशनों का है, देखते हैं कि कौन कितना सफल हो पाता है.

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