मनमोहना बड़े झूठे !

कनक तिवारी कांग्रेस की सत्ता-च्युति के मूल संकट तो प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह रहे हैं. राजीव गांधी के निधन के बाद पी.वी. नरसिंह राव के मंत्रिमण्डल के वित्त मंत्री बनाए गए मनमोहन देश की अर्थव्यवस्था का समयसिद्ध अभिशाप हैं. प्रायोजित पैरवी के ज़रिए प्रचारित किया गया था कि भारत के कौटिल्य का नया अवतार विश्व बैंक से दीक्षित होकर लौटा है. इजारेदारों के बौद्धिक षड़यंत्र के तहत देश की आर्थिक हालत और बदइंतज़ामी की ज़िम्मेदारी समाजवादी नीतियों और सार्वजनिक क्षेत्र पर थोपी गई. अप्रत्यक्ष रूप से यह नेहरू-इन्दिरा नेतृत्व की नीतियों का अपमान था. राजग के सत्ता पतन के बाद इक्कीसवीं सदी के संस्थापक मूल्य-निर्माता बनने का ख्वाब लिए मनमोहन सिंह को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद पर बिठा दिया. एक गैरराजनीतिक व्यक्ति को दुनिया के सबसे बहुसंख्यक लोकतंत्र में देश के नेता के किरदार का अभिनय सौंपा गया. संविधान में प्रधानमंत्री देश की धड़कन होता है. जो व्यक्ति जनता से नहीं जुड़ा रहा. उसे देश की धड़कन कांग्रेस नेतृत्व ने बना दिया था.

नरसिंह राव के प्रधानमंत्री काल से कांग्रेस की गाड़ी उलट दिशा की ओर चल पड़ी. आर्थिक संकटों से लाचार देश को वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सोच का कायल बनाया गया. पच्चीस वर्षों तक मनमोहन सिंह की छाया देश की अर्थनीति पर आषाढ़ के बादलों की तरह तनी दिखती रही. वे बरसे कम लेकिन गरजते रहे. कांग्रेस की अपने इतिहास से छोड़छुट्टी कराई गई. लगा कोई नई पार्टी पैदा हुई है. आर्थिक नीतियों के डी. जे. जैसे शोर में कांग्रेस के सिद्धांतों, परंपराओं और प्रयोगों का बेड़ा गर्क कर दिया गया. कांग्रेस ने निर्गुट सम्मेलन के जरिए तीसरी दुनिया मसलन मिस्त्र और यूगोस्लाविया के साथ मिलकर रची थी. सोवियत रूस से गहरा दोस्ताना किया. चीन से धोखा भी हुआ. मनमोहन सरकार ने आर्थिक लाचारियों के अरण्य रोदन में अमेरिका के सामने घुटने टेक दिए. परमाणु करार और विदेशी प्रत्यक्ष पूंंजी निवेश सहित कई मसलों पर भारतीय मैना अमेरिकी गिद्ध के पंजों में फंस गई. हिन्दू राष्ट्रवाद के नए मसीहा नरेन्द्र मोदी भी अमेरिकी गोदपुत्र बनने के लिए हाथ जोड़े अब भी खड़े हैं. मनमोहन सिंह में अमेरिका जाना ससुराल जाने जैसा रोमांच पैदा करता है. गांधी ने भारत की आजादी के लिए अमेरिकी प्रेसिडेन्ट की मदद का प्रस्ताव ठुकरा दिया था.


डॉ.मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस पर कलंक चस्पा हो ही गया कि उसने अवाम-विरोधी नीतियां बनाई हैं. चतुर नौकरशाह ‘मीठा मीठा गप्प‘ और ‘कड़वा कड़वा थू‘ की कहावत का मर्म समझते हैं. वाहवाही बटोरने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय जागरूक रहा. विश्वस्त सहकर्मियों और कारिंदों ने मज़बूत अफवाहतंत्र बुना कि प्रधानमंत्री सभी निर्णय कांग्रेस आलाकमान की मर्ज़ी से करते हैं. बदनामी का ठीकरा कांग्रेस संगठन और सोनिया गांधी पर फूटता रहा. हकीकत यही थी कि डॉ. मनमोहन सिंह को जो फैसले अपनी बुद्धि और प्रतिष्ठा के अनुसार लेने ही होते थे, उनको लेकर उन्होंने किसी की कोई बात नहीं मानी. अमेरिका से परमाणु नीति करार को लेकर प्रधानमंत्री ने सरकार को ही दांव पर लगा दिया. वामपंथी पार्टियों के समर्थन खींच लेने पर जोड़ तोड़कर सरकार बचाई गई. अमेरिका समर्थक भाजपा ने भी संदिग्ध भूमिका अदा की. खुदरा और थोक व्यापार मंें विदेशी पूंजीनिवेश को लेकर भी मनमोहन सिंह ने सरकार की ज़िंदगी और पार्टी की प्रतिष्ठा को खतरे में डाला. कांग्रेस संगठन को झुकना पड़ा.

कहते हैं बड़े गम में छोटे छोटे दुख डूब जाते हैं. मनमोहन सरकार का दानवी भ्रष्टाचार और अट्टहास करती डायन महंगाई दूसरी पार्टियों के भ्रष्टाचारों, अकुशलताओं और असफलताओं तक पर परदा ढांकती रही. पार्टी को हार की गोपनीय आंतरिक समीक्षा के बदले जनसमीक्षा का आह्वान करना था. यह कैसा उद्दाम है कि एक मुख्यमंत्री महत्वाकांक्षाओं के चलते संघ परिवार की मदद से अपने गुरु रहे लालकृष्ण आडवाणी को हाशिए पर डालकर प्रधानमंत्री बनने के लिए ताल ठोंकता रहा. दूसरी ओर देश के सबसे बड़े राजनीतिक कुल के राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद को लगभग तश्तरी पर रखा देखकर भी साहस, समझ और संयोग नहीं जुटा पाए.

कांग्रेस दक्षिणपंथी मनमोहन सिंह की अगुवाई में कॉरपोरेट संंस्कृति का लालनपालन करे और विरोधाभास में मुफलिस अवाम से उम्मीद रखे कि वह उसकी प्राण रक्षा करे-तो यह कैसे होता. राहुल गांधी को भी कांग्रेस की अपनी दादी की पुरानी पुस्तकों के पाठ के बदले आम आदमी पार्टी का नया पाठ्यक्रम पढ़ने की ज़रूरत महसूस होती रही. कांग्रेसी नेताओंे का अहंकार उनके नथुनों का गुस्सा बनकर निष्पक्ष संस्थाओं पर टूटता रहा. कैग की टू.जी. स्पेक्ट्रम वाली रिपोर्ट बड़े वकील कपिल सिब्बल द्वारा मज़ाक का लक्ष्य बनाई गई. वे करोड़ों भारतीयों की नज़र में कांग्रेस की लुटिया डुबोते रहे. कॉमनवेल्थ खेल घोटाला का सुरेश कलमाड़ी वाला कीचड़ अपने वस्त्रों से शीला दीक्षित झाड़ती रहीं. साफ होने पर भी कीचड़ का दाग जनता के जे़ेहन में विधानसभा चुनाव में उभर गया. प्रधानमंत्री बहैसियत कोयला मंत्री अपने हाथ काले करते रहे. उज्जवल होने का प्रमाणपत्र खुद ही लिखते रहे.

इन विचित्र स्थितियों में आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल की राजनीतिक समझ स्पेस पाकर फलने फूलने का मौका क्यों गंवाना चाहती? ‘आप‘ का तेजी से उद्भव अंकगणितीय आंकड़ों की अनोखी घटना बनी. केजरीवाल को लोकप्रियता अन्ना आंदोलन के कंधों पर चढ़कर मिली थी. अन्ना नहीं चाहते थे कि आंदोलन को राजनीतिक पार्टी में ढाला जाए.

केजरीवाल ने धैयपूर्ण सबक लेने के बदले सत्तानशीनों को सबक सिखाने का फौरी दायित्व ओढ़ लिया. उन्होंने आधुनिक तकनीकी, सोशल मीडिया, इंटरनेट, फेसबुक, गूगल, ट्विटर, ब्लॉग आदि पर ज़्यादा भरोसा किया. देश विदेश के लोग नौकरी से छुट्टी लेकर मदद करने आए. कॉरपोरेटी नौजवान राजनीति के कड़ियल यथार्थ और लाचार गांवों के मुफलिस लोगों की हालत से अपरिचित हैं. उन्हें महानगरों की चकाचैंध में अमेरिकी नस्ल के चुनावी पैतरों का प्रयोग करना रोमांटिक लगा. समर्थ, धनाड्य और उच्चकुलीन लोग राजनीति में देश के नागरिकों में किसी तथाकथित व्यापक परिवर्तन का जज़्बा आंशिक रूप से ही भर पाए. केजरीवाल के विदेशी और आप्रवासी भारतीय समर्थक अगले किसी जोखिम के लिए वह उद्दाम बार बार नहीं दिखा पाएंगे.

उद्योगपतियों ने लाइसेंस परमिट राज में विपरीत स्थितियों के चलते अपने हुनर और छोटी मोटी बेईमानी के साथ काफी दौलत कमाई. टाटा, अदानी, बिड़ला, अंबानी, रुइया, वेदांता, जिन्दल, मित्तल जैसे कई परिवार सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण बनते गए हैं. पितृ पुरुषों के नक्शे कदम पर चलने के बदले उनके वंशज उनसे ज़्यादा तरक्की इसलिए नहीं कर रहे हैं कि वे बेहतर हैं. वे दिन दूनी रात चैगुनी तरक्की इसलिए कर रहे हैं कि एन.डी.ए. तथा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संसद ने ऐसे अधिनियम रचे जिनके कारण देश की संपत्ति और प्राकृतिक संसाधनों पर आर्थिक डाका डालने का कानूनी अधिकार इजारेदारों को मिल गया है. जबरिया भूमि हड़पना और विशेष आर्थिक क्षेत्र इसके उदाहरण हैं. ऊर्जा क्षेत्र में भी निजी निवेशकों की चांदी है.

भारतीय पूंजीवाद वैश्विक पूंजीवाद का सहोदर बल्कि एजेन्ट है. उसकी कोई स्वतंत्र इयत्ता नहीं है. जनमानस विचलित होता रहा कि प्रधानमंत्री मोण्टेक सिंह अहलूवालिया को मंत्री बनाना चाहते थे और कुछ और पूर्व नौकरशाहों या कथित विशेषज्ञों को. देश राजनीति के गैरराजनीतिकीकरण से भी जूझता रहा. राजनीतिक जीवन में उस स्पंदन की कमी रही जो लोकतंत्र का असली अर्थ है. एक व्यक्ति इतिहास में इतना बड़ा नहीं होता कि देश या समाज के लिए निर्विकल्प हो जाए. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को इन सवालों से जूझने की नीयत तक नहीं हुई. ये चुनौतियां हर चुनाव में सघन होकर मुखरित होती रहेंगी. यदि नौकरशाह, भ्रष्टाचारी, किताबी बुद्धिजीवी, पांच सितारा संस्कृति के लोग और खरबपति देश पर हावी हो जाएंगे तो देश का क्या होगा.

दिलचस्प यह है कि अमेरिकापरस्त अर्थशास्त्री को अनाज सड़ने पर दुख, क्रोध या पश्चाताप तक नहीं हुआ. प्रधानमंत्री कॉमनवेल्थ खेलों की बदहाली देखने गए जो उपनिवेशवादी गुलामी के अलावा क्या हैं. वे भ्रष्ट सुरेश कलमाड़ी एण्ड कम्पनी की पीठ ठोंकते भी दिखाई दिए जो अरबों रुपयों के घोटालों के आरोपी हैं. प्रधानमंत्री सड़ते अनाज के गोदामों को देखने नहीं गए. वे ठेकेदारों की बेईमानी देखने गए. वे किसानों के कड़े परिश्रम के उत्पाद को भ्रष्ट नौकरशाही की बदइंतजामी के चलते कूड़ा बना दिए जाने को देखने नहीं गए. भ्रष्ट ठेकेदार मेहनतकश किसानों पर तरजीह पा गए. प्रधानमंत्री को विकास पर दहाई प्रतिशत तक पहुंचाने की अंतर्राष्ट्रीय चिन्ता रही. उनमें देश के गरीबों, मुफलिसों, आदिवासियों, किसानों की शत प्रतिशत बदहाली की चिन्ता नहीं दिखी. अरबों रुपयों का प्रचार होता रहा कि मनमोहन सिंह ईमानदार हैं. अरबों रुपयों का अनाज सड़ता रहा. अरबों रुपयों की शक्कर की कालाबाजारी होती रही. अरबों रुपयों के खनिज घोटाले होते रहे. ऐसी कोरी ईमानदारी से क्या होता है.

यक्ष प्रश्न है कि देश लाल बहादुर शास्त्री को नेता माने जिन्होंने अनाज की कमी के कारण पूरे देश को स्वेच्छा से सोमवार का उपवास रखना सिखाया था अथवा मनमोहन सिंह को जो अनाज सड़ाने के अपराधिक कृत्य के लिए देश से माफी तक नहीं मांग पाए. यह प्रचार अलबत्ता करते रहे कि उनका मंत्रिमंडल नेहरू और इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडलों से ज्यादा संसक्तिशील और घना बुना हुआ है.

ए. राजा थे जिन्हें भ्रष्टाचार-रत्न कहा जा रहा है. शरद पवार रहे जो कहते रहे कि चीनी महंगी हो तो लोग चीनी खाना छोड़ दें. ममता थीं जो जो लाल बहादुर शास्त्री की तरह रेल दुर्घटना या रेल पर नक्सली हमलों को लेकर इस्तीफा नहीं दे पाईं. एस.एम. कृष्णा थे जो गलतबयानी करते रहे. चिदम्बरम थे जो मंदिरों में पूजा करते हैं और ‘भगवा आतंकवाद‘ जैसा शोध भी. वारेन एंडरसन की उत्तराधिकारी कम्पनी की मंत्री की हैसियत से पैरवी करते हैं. फिर भोपाल गैस त्रासदी की मंत्रिमंडलीय विचार समिति के सदस्य भी बन जाते हैं. कांग्रेस में खाप पंचायतों के समर्थक भी रहे और नक्सलियों के भी.

नेहरू तीसरी दुनिया के संस्थापक नेता थे. पटेल देशी रियासतों के भारत संघ में विलय के पुरोधा. जिस मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री खुद मनोनीत हों. दिल्ली में रहकर लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाएंं. असम से राज्यसभा में आएँ. वे नेहरू, पटेल, मोरारजी, शास्त्री जी वगैरह का गलत उल्लेख करें. दिल्ली मोरियों के कारण बजबजाती रही. दस जनपथ तक में पानी घुसा आता रहा. डेंगू फैलता रहा. किसान धरना देते रहे. ट्रेड यूनियनें भारत बंद करती रहीं. नक्सलवादी बरसात में हरी भरी दूब की तरह तृणमूल होते रहे. राजा निश्शंक बने रहे. पवार खेती और अनाज से ज्यादा क्रिकेट के विश्वरत्न होते रहे. चीन है कि बस आना ही चाहता है. कश्मीर है कि सुलग रहा है. पाकिस्तान के आतंकवादी अमेरिका की भी शह पर पिकनिक पर आने का कार्यक्रम बना रहे हैं. बाढ़ में देश डूबता रहा. बाकी जगह सूखा रहा. फिर भी देश के सामने अहम सरकारी तर्क रहा कि सुप्रीम कोर्ट को नीतिगत मामलों में दखल नहीं देना चाहिए. कॉमनवेल्थ खेल की सफलता के लिए सेक्स रैकेट के दलाल भी सक्रिय रहे. ईमानदार प्रधानमंत्री देश का कितना बड़ा कर्णधार होता है, यह सड़ता हुआ अनाज बताता रहा.

आज आलम है कि भारत अमेरिका का पिछलग्गू है. हर मंत्री के लिए अमेरिका जाना मक्का मदीना जाने जैसा पुण्य है. अमेरिका के राष्ट्रपति का भारत में ऐसा सम्मान हुआ, मानो कोई देवदूत आया हो. अमेरिका ने एशिया, अफ्रीका, यूरोप और दक्षिण अमेरिका के कई मुल्कों में तबाही मचा रखी है. झूठे आरोप लगाकर ईराक के सद्दाम हुसैन का कत्ल किया. पाकिस्तान को बताए बिना घुसकर ओसामा बिन लादेन को मारा. ईरान की मुश्कें बांधता रहता है.

चीन को दुश्मन बताकर भी व्यापारिक रिश्ते रखता है. चीनी ललनाओं को विश्व सुंदरियों का खिताब दिलाता है. वह समर्थ देशों के राष्ट्राध्यक्षों तक की जासूसी करता है. सुरक्षा के नाम पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति, मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस, अभिनेता शाहरुख खान और राजनयिक देवयानी खोबरागड़े का अपमान करता है. मनमोहन सरकार अमेरिका से खौफ खाती रही. देश की आर्थिक नीतियों की बनावट में अमेरिका के सहयोग की ज़रूरत महसूस करती रही.

कांग्रेस लापरवाह रही अथवा बाखबर होते हुए भी उदासीन. राहुल गलत आर्थिक नीतियों की गठरी सिर पर लादे घूम घूमकर कांग्रेस की ईमानदारी और निष्ठा का प्रचार करते रहे. यह रुई की वह गठरी थी जो दलालनुमा कांग्रेसियों और मनमोहन सिंह द्वारा भिगा दी गई है. संविधान की घोषणाओं, मनमोहन सिंह सरकार के कर्मों और कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्रों के बीच कोई तालमेल नहीं रहता. संविधान समाजवाद के साथ है. मनमोहन सिंह अमेरिका परस्त परमाणु नीति और खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी निवेश के साथ, कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्रों में इन दोनों से अलग हटकर दार्शनिक घोषणाएं. ऐसे में देश की जनता अपने भविष्य और कांग्रेस के वर्तमान को आपस में जोड़कर क्यों नहीं समझती? संकुल समय में तश्तरी पर रखकर प्रधानमंत्री का पद डॉ. मनमोहन सिंह राहुल गांधी को देने से रहे. 7 रेसकोर्स का नायक भारत से ज्यादा अमेरिका में पैठ रखता था. उसने राहुल का कद छोटा करने के लिए अपनी मंत्रिपरिषद में शामिल करने की चतुर पेशकश की.

खुशफहमियों के बरक्स कड़ियल जिंदगी का यथार्थ भी प्रतिधारा की तरह साथ साथ बहता है. अर्थशास्त्री को सोनिया गांधी ने अहिंसक प्राणी समझकर प्रधानमंत्री बनवाया था, वह तो घाघ निकला. वह कांग्रेस पार्टी के मंसूबों को चाहे जितनी पटखनी देता, उसे प्रधानमंत्री के पद से हटाया जाना मुश्किल लगता रहा. भ्रष्टाचार का क्वथनांक जनता के धैर्य का थर्मामीटर तोड़ता रहा. विदेशों में पड़ा काला धन देश के माथे पर कालिख की तरह पुतता रहा. उद्योगपति जोंक और पिस्सुओं की तरह जनता के खून के साथ आचरण करते रहे. आई. पी. एल. की क्रिकेट-संस्कृति देश का बैरोमीटर है. अय्याशी को सत्ता प्रतिष्ठान के चरित्र का मुलम्मा समझा जा रहा है.

डॉ. मनमोहन सिंह की फितरत के कारण बिजली, कोयला, लोहा, अल्यूमिनियम वगैरह के सरकारी क्षेत्र के कारखानों और संसाधनों का बेतरह और बेवजह निजीकरण कर दिया गया. मुकेश अंबानी की एंटीलिया दुनिया की सबसे कीमती निजी इमारत है. टाटा-साम्राज्य नीरा राडिया जैसे दलालों की मदद से वीर संघवी और बरखा दत्त जैसे पत्रकारों को शामिल करते हुए ए. राजा जैसे मंत्री को दूरसंचार विभाग मनमोहन मंत्रिमंडल में दिलाने का आरोपी बनाया गया. राहुल गांधी को मनमोहन सिंह का उत्तराधिकारी बनाने भर से कौन सी क्रांति हो जाती? एक गैरराजनीतिक, अनाकर्षक, चलताऊ प्रधानमंत्री को देश के इतिहास पर लादा गया. यूरो-अमेरिकी, पूंजीवादी, जनविरोधी, निजीकरण-समर्थक मूल्यों को तरजीह देने के कारण कांग्रेस अपने पाथेय तक पहुंचने के बदले आज तफरीह करती दिखाई दे रही है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!