विकास रैली में कितने लोग?

नई दिल्ली | अभिषेक श्रीवास्तव: हाल ही में एक बुजुर्ग पत्रकार मित्र ने मशहूर शायर मीर की लखनऊ यात्रा पर एक किस्सा सुनाया था. हुआ यों कि मीर चारबाग स्टेशन पर उतरे, तो उन्हें पान की तलब लगी हुई थी.

वे एक ठीहे पर गए और बोले, ”ज़रा एक पान लगाइएगा.” पनवाड़ी ने उन्हें ऊपर से नीचे तक ग़ौर से देखा, फिर बोला, ”हमारे यहां तो जूते लगाए जाते हैं हुज़ूर.” दरअसल, यह बोलचाल की भाषा का फ़र्क था. लखनऊ में पान बनाया जाता है. लगाने और बनाने के इस फ़र्क को समझे बगैर दिल्ली से आया मीर जैसा अदीब भी गच्चा खा जाता है.

ग़ालिब, जो इस फ़र्क को बखूबी समझते थे, बावजूद खुद दिल्ली में ही अपनी आबरू का सबब पूछते रहे. दिल्ली और दिल्ली के बाहर के पानी का यही फ़र्क है, जिसे समझे बग़ैर ग़यासुद्दीन तुग़लक से दिल्ली, हमेशा के लिए दूर हो गई. गर्ज़ ये, कि इतिहास के चलन को जाने-समझे बग़ैर दिल्लील में कदम रखना या दिल्ली से बाहर जाना, दोनों ही ख़तरनाक हो सकता है. क्या नरेंद्र भाई दामोदरदास मोदी को यह बात कोई जाकर समझा सकता है? चौंकिए मत, समझाता हूं….

अगर आपने राजनीतिक जनसभाएं देखी हैं, तो ज़रा आज की संज्ञाओं का भारीपन तौलिए और मीडिया के जिमि जि़प कैमरों के दिखाए टीवी दृश्यों से मुक्त होकर ज़रा ठहर कर सोचिए: जगह दिल्ली, मौका राजधानी में विपक्षी पार्टी भाजपा की पहली चुनावी जनसभा और वक्ता इस देश के अगले प्रधानमंत्री का इकलौता घोषित प्रत्यापशी नरेंद्र मोदी. सब कुछ बड़ा-बड़ा. कटआउट तक सौ फुट ऊंचा. दावा भी पांच लाख लोगों के आने का था.

छोटे-छोटे शहरों में रैली होती है तो रात से ही कार्यकर्ता जमे रहते हैं और घोषित समय पर तो पहुंचने की सोचना ही मूर्खता होती है. मुख्या सड़कें जाम हो जाती हैं, प्रवेश द्वार पर धक्का-मुक्की् तो आम बात होती है. दिल्ली. में आज ऐसा कुछ नहीं हुआ. न कोई सड़क जाम, न ही कोई झड़प, न अव्यवस्था.

क्या इसका श्रेय जापानी पार्क में मौजूद करीब तीन हज़ार दिल्ली पुलिसबल, हज़ार एसआइएस निजी सिक्योरिटी और हज़ार के आसपास आरएएफ के बलों को दिया जाय, जिन्होंने कथित तौर पर पांच लाख सुनने आने वालों को अनुशासित रखा? दो शून्य, का फ़र्क बहुत होता है. अगर हम भाजपा कार्यकर्ताओं, स्वायंसेवकों, मीडिया को अलग रख दें तो भी सौ श्रोताओं पर एक सुरक्षाबल का हिसाब पड़ता है. ज़ाहिर है, पांच लाख की दाल में कुछ काला ज़रूर है.

आयोजन स्थाल पर जो कोई भी सवेरे से मौजूद रहा होगा, वह इस काले को नंगी आंखों से देख सकता था. मोदी की जनसभा का घोषित समय 10 बजे सवेरे था, जबकि वक्ता की लोकप्रियता और रैली में अपेक्षित भीड़ को देखते हुए मैं सवेरे सवा सात बजे जापानी पार्क पहुंच चुका था. उस वक्त ईएसआई अस्पताल के बगल वाले रोहिणी थाने के बाहर पुलिसवालों की हाजि़री लग रही थी. सभी प्रवेश द्वार बंद थे. न नेता थे, न कार्यकर्ता और न ही कोई जनता. रोहिणी पश्चिम मेट्रो स्टेशन वाली सड़क से पहले तक अंदाज़ा ही नहीं लगता था कि कुछ होने वाला है. अचानक मेट्रो स्टेशन वाली सड़क पर बैनर-पोस्टकर एक लाइन से लगे दिखे, जिससे रात भर की तैयारी का अंदाज़ा हुआ.

बहरहाल, आठ बजे के आसपास निजी सुरक्षा एजेंसी एसआइएस के करीब हज़ार जवान पहुंचे और उनकी हाजि़री हुई. नौ बजे तक ट्रैक सूट पहने कुछ कार्यकर्ता आने शुरू हुए. गेट नंबर 11, जहां से मीडिया को प्रवेश करना था, वहां नौ बजे तक काफी पत्रकार पहुंच चुके थे. गेट नंबर 1 से 4 तक अभी बंद ही थे.

सबसे ज्यादा चहल-पहल मीडिया वाले प्रवेश द्वार पर ही थी. दिलचस्प यह था कि तीन स्तरों के सुरक्षा घेरे का प्रत्यक्ष दायित्व तो दिल्ली पुलिस के पास था, लेकिन कोई मामला फंसने पर उसे भाजपा के कार्यकर्ता को भेज दिया जा रहा था. तीसरे स्तर के सुरक्षा द्वार पर भी भाजपा की कार्यकर्ता और एक स्थानीय नेतानुमा शख्स दिल्ली पुलिस को निर्देशित कर रहे थे.

यह अजीब था, लेकिन दिलचस्प. साढ़े नौ बजे पंडाल में बज रहे फिल्मी गीत ”आरंभ है प्रचंड” (गुलाल) और ”अब तो हमरी बारी रे” (चक्रव्यूबह) अनुराग कश्यीप व प्रकाश झा ब्रांड बॉलीवुड को उसका अक्सा दिखा रहे थे. इसके बाद ”महंगाई डायन” (पीपली लाइव) की बारी आई और भाजपा के सांस्कृतिक पिंजड़े में आमिर खान की आत्मा तड़पने लगी.

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