विकास का मोदीवाद

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता: नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा का चुनाव विकास के वादे पर जीता है. इसलिये उन्हें आने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी, भाजपा को विजय दिलाने के लिये तथा 2019 के अप्रैल-मई माह में होने वाले लोकसभा चुनाव की नैया पार लगाने के लिये विकास तो करना ही पड़ेगा. इसमें कोई संशय की बात नहीं है. अब विकास गुजरात की तर्ज पर होगा या देश के लिये कोई अन्य मॉडल सामने लाया जाता है इसकी भविष्यवाणी करना अभी जल्दबाजी होगी.

विकास के नाम पर नरेन्द्र मोदी के कार्यप्रणाली पर गौर जरूर किया जा सकता है. जिससे आने वाले समय की पदचाप पर जरूर कयास लगाये जा सकते हैं. आगे बढ़ने के लिये हम घटनाओं को क्रमवार ढ़ंग से उल्लेखित कर उसके सार को समझने की कोशिश करेंगे जिससे किसी नतीजों की ओर इशारा तो किया ही जा सकता है.


प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने सबसे पहले अपने प्रधान सचिव की नियुक्ति के लिये एक अध्यादेश लाया. इसी अध्यादेश के माध्यम से ही नृपेन्द्र मिश्र को उनका प्रधान सचिव नियुक्त किया जा सका है. नरेन्द्र मोदी ने संसद के पहले सत्र तक का इंतजार न करके उन्हें अध्यादेश के माध्यम से अपना प्रधान सचिव नियुक्त करने का गंभीर निहितार्थ है. इससे यह समझा जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी ने नृपेन्द्र मिश्र के लिये कानून को भी बदल डाला.

गौरतलब है कि नृपेन्द्र मिश्र 2006 से 2009 के बीच भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण, ट्राई के अध्यक्ष रहें हैं. ट्राई के कानून के अनुसार इसके अध्यक्षों और सदस्यों को पद छोडने के बाद केंद्र या राज्य सरकारों में किसी अन्य पद पर नियुक्ति नहीं किया जा सकता है. हालांकि, नृपेन्द्र मिश्र के काबलियत पर सवाल कोई नहीं उठा सकता है परन्तु प्रधानमंत्री तथा अन्य नौकरशाहों के बीच सेतु का काम करने के लिये क्या दूसरा विकल्प हमारे देश में मौजूद नहीं है. नरेन्द्र मोदी के इस कदम से पता चलता है कि उनकी कार्यप्रणाली व्यक्ति केन्द्रित रहने वाली है. जिसमें व्यक्ति का महत्व संस्था के ऊपर होगा.

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यूपीए के समय बनाये गये मंत्रियों के समूह तथा अधिकार प्राप्त मंत्रियों के सभी समूहों को भंग कर दिया. हफ्ता भर भी नहीं बीता था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 4 मंत्रिमंडलीय स्‍थायी समिति प्राकृतिक आपदा प्रबंधन पर मंत्रिमंडलीय समिति, मूल्‍यों पर मंत्रिमंडलीय समिति, विश्‍व व्‍यापार संगठन मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति तथा भारत संबं‍धी मुद्दों की विशिष्‍ट पहचान प्राधिकरण पर मंत्रिमंडलीय समिति को भंग कर दिया.

इसके लिये तर्क दिये जा सकते हैं कि फैसले लेने में देरी न हो इसलिये इन समितियों को भंग कर दिया गया. नरेन्द्र मोदी के इस कदम का एक दूसरा पहलू भी है. लोकतंत्र में फैसले लेने का अधिकार चुने हुए जन प्रतिनिधियों को होता है. भारतीय संसदीय प्रणाली में कैबिनेट फैसले लेती है जिसमें से कई को संसद में प्रस्तुत भी करना पड़ता है. फैसले लेने की प्रक्रिया में जितने ज्यादा जन प्रतिनिधियों की भागीदारी होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा.

गौरतलब है कि मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान ही स्पष्ट कर दिया था या यूं कहिये इसे चुनावी मुद्दा बना दिया था कि कम से कम सरकार तथा ज्यादा से ज्यादा शासन. इसी नारे को क्रियांवित करने के लिये अब सरकार के रूप को छोटा किया जा रहा है. सरकार के रूप को छोटा करने से तात्पर्य फैसले लेने के अधिकार को कम से कम लोगों के हाथों में केन्द्रित किये जाने से है. इससे तो यही बात समझ में आती है कि सत्ता का केन्द्रीयकरण शुरु हो गया है.

आपको याद होगा कि 1991 में राव सरकार के समय नारा दिया गया था कि सरकार शासन करने के लिये है, व्यापार करने के लिये नहीं. उसी के बाद के वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र की मुनाफा देने वाली ईकाईयों को निजी हाथों में स्थानांतरित कर दिया जाने लगा. जिसे बाजपेई सरकार ने भी जारी रखा था. कोरबा के बाल्कों प्लांट को बाजपेई सरकार के दौर में ही निजी हाथों में औने-पौने सौंप दिया गया था. राव सरकार द्वारा दिये गये नारे की वास्तविकता लोगों को जब समझ में आई जब व्यापारी ही शासन करने लगे.

मोदी सरकार के जुमले, कम से कम सरकार, अधिक से अधिक शासन का क्या हश्र होने वाला है इसका अंदाज आप राव सरकार के नारे की हकीकत से जान सकते हैं. इस बार का लोकसभा चुनाव पिछले तमाम चुनावों से अलग ढ़ंग से लड़ा गया. आरोप लगाया जाता रहा है कि इसके नेपथ्य में नैगम घरानों की दखलांजी सक्रिय है. इसे नहीं भूलना चाहिये कि चुनाव प्रचार के दौरान तथा एक्जिट पोल के नतीजे आने से किस प्रकार से कुछ घरानों के शेयरों के दाम बढ़ने लगे.

16वीं लोकसभा का चुनाव पार्टियों नहीं व्यक्तियों के बीच लड़ा गया है. जिसमें भाजपा के नरेन्द्र मोदी, कांग्रेस के राहुल गांधी, आप के अरविंद केजरीवाल, जयललिता, ममता बनर्जी प्रमुख रहें हैं. इन नामों के बीच में पार्टियां गौण हो गई थी. ऐसा लग रहा था कि भारत में संसदीय प्रणाली वाले चुनाव में सांसदों का नहीं, राष्ट्रपति शासन वाले प्रणाली से चुनाव राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा है.

इस प्रकार से आप देख सकते हैं कि लोकसभा का चुनवा प्रचार भी व्यक्तिवादी ढ़ंग से लड़ा गया तथा शासन भी व्यक्तिवादी ढ़ंग से ही चलाने के लिये ढ़ाचा तैयार किया जा रहा है. इन सबके माध्यम से जो विकास किया जायेगा उसे मोदीवादी विकास का नाम दिया जा सकता है क्योंकि इससे पहले कभी इस ढ़ंग से न तो चुनाव हुए थे न ही चुनाव परिणाम के पहले इस ढ़ंग से जीत को सुनिश्चित माना जा रहा था.

वैसे एक बार विकास का काम शुरु हो जाये तथा वह आम जनता के दरवाजे तक पहुंच जाये फिर भले ही कहिये कि यह विकास के मोदीवाद की करामात है. जिसमें फैसले लेने की क्षमता का केन्द्रीयकृत कर दिया गया है.

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