माओवाद की चुनौती

जयराम रमेश
हाल के दिनों में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भारत में नक्सलवादी-माओवादी उभार के खतरे को खत्म करने के मद्देनजर सारंडा मॉडल का जिक्र किया. सारंडा मॉडल नक्सली क्षेत्रों में आमूल-चूल परिवर्तन की दिशा में एक सफल उदाहरण है. इस संदर्भ में उन्होंने कहा है कि देश के कुछ नक्सली क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय साजिश रची जा रही है, जिससे निपटने के लिए अर्धसैनिक बलों और स्थानीय पुलिस को कड़े कदम उठाने होंगे.

हैरत की बात है कि मौजूदा प्रधानमंत्री इस मसले पर चुप हैं, लेकिन उनके पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह ने लगातार इस बात पर बल दिया कि यह भारत की आंतरिक सुरक्षा के मद्देनजर सबसे गंभीर चुनौती है और इसके मूलभूत सामाजिक-आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक पहलू भी हैं.
फिलहाल देश के 88 जिलों की 31,400 ग्राम पंचायतों और 1,19,000 गांवों में वामपंथी चरमपंथ का प्रभाव है. इस समस्या से जो राज्य सर्वाधिक प्रभावित हैं उनमें झारखंड के कुल 24 में से 17 जिले, ओड़िशा के कुल 30 जिलों में से 18 और छत्तीसगढ़ के कुल 27 में से 14 जिले शामिल हैं. इसी तरह पश्चिम बंगाल के 19 में 3 जिले, बिहार के 38 में 11, महाराष्ट्र के 36 में से 4, आंध्र प्रदेश के 13 में से 4, तेलंगाना के 10 में से 4, मध्य प्रदेश के 51 में से 11 जिले और उत्तार प्रदेश के 3 जिले भी इस समस्या से ग्रस्त है.


इस मामले में सभी राज्यों की अपनी पृष्ठभूमि है, जैसे बिहार में जाति की प्रभावी भूमिका है. यहां पांच मुख्य लक्षण हैं जो इन क्षेत्रों में विशेष तौर से मेल खाते हैं. पहली बात यह कि इन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों की संख्या काफी है और यह बहुमत में है. दूसरी बात यह कि जनजातीय बहुल इन इलाकों में काफी सघन वन हैं. तीसरी बात माओवाद प्रभावित इन जिलों में प्रचुर मात्रा में खनिज उपलब्ध हैं, जिनमें कोयला, बॉक्साइट और लौह अयस्क शामिल हैं. चौथी बात कई राच्यों में माओवाद प्रभावित जिले राजनीतिक सत्ता की पहुंच से बहुत दूर हैं और इनका आकार बड़ा है. पांचवीं बात यह है कि बुरी तौर पर प्रभावित ऐसे तमाम क्षेत्र दो या तीन राच्यों के सीमावर्ती इलाकों में स्थित हैं. माओवादी विरोधी कोई भी रणनीति बनाते समय हमें इन बातों को ध्यान में रखना होगा.

भारतीय राच्यों के इन नक्सल प्रभावित इलाकों में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की 71 बटालियनें और तकरीबन 71,000 सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है. राच्य पुलिस बलों को सहयोग देने के मामले में इनकी बड़ी भूमिका है, जिन्हें खुफिया जानकारियों को इकट्ठा करने और माओवादियों के खिलाफ चलाए जाने वाले अभियानों में अनिवार्य रूप से आगे अथवा प्रथम पंक्ति में होना चाहिए. यही कारण है कि पिछले तीन दशकों से आंध्र प्रदेश इस समस्या से प्रभावी रूप से निपटने में सफल रहा है. इस समस्या से निपटने के लिए महज सुरक्षा अभियान काफी नहीं होंगे और ऐसा हो भी नहीं सकता. लोगों की दिनप्रतिदिन की समस्याओं के समाधान और विकास कायरें के माध्यम से ही हम इसका स्थायी समाधान खोज सकते हैं. ऐसा इसलिए, क्योंकि इनके अभाव में यहां के लोग खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं.

वन प्रशासन अथवा प्रबंधन में व्यापक सुधार करके जनजातीय परिवारों के समक्ष आने वाली दिनप्रतिदिन की समस्याओं का समाधान आज वक्त की मांग है. वन नौकरशाही इन जनजातीय लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान करती है, क्योंकि राच्य दर राच्य यह लोग भटकते रहते हैं अथवा आते-जाते रहते हैं. पिछले पांच दशकों में खनन और सिंचाई परियोजनाओं के कारण बड़े पैमाने पर इन्हें विस्थापित होना पड़ा है. बड़े पैमाने पर विस्थापित इन लोगों को पुनर्वास और पुनस्र्थापना के माध्यम से अभी भी संतुष्ट करना शेष है.

सबसे खराब बात यह है कि इन जनजातीय वगरें को बार-बार विस्थापन का दंश झेलना पड़ रहा है. संसद द्वारा 2013 में पारित किए गए नए भूमि अधिग्रहण कानून के माध्यम से चीजों को दीर्घकालिक दृष्टि से सही रूप में हल करने की कोशिश की गई, लेकिन बाद में इसे कमजोर करने का काम किया गया. यदि ऐसा कुछ होता है तो माओवादियों को दुष्प्रचार करने का मौका मिलेगा. वास्तव में यह नक्सली नहीं हैं जिन्होंने अपनी विचारधारा को स्वीकृत कराने के लिए अनुकूल जमीन तैयार की, बल्कि यह सतत रूप से सरकारों की विफलता है जिनमें प्रभावित राच्यों के साथ ही केंद्र सरकार भी शामिल है.

सरकारें गरीबों की मानवीय गरिमा और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा कर पाने में विफल रही हैं और इसी के परिणामस्वरूप हिंसा के फैलाव के लिए अनुकूल जमीन तैयार हुई, जिसने सामाजिक कल्याण के नाम पर नक्सलियों को मुखर होने का मौका दिया. इसी का जामा पहनकर नक्सलियों ने गुरिल्ला लड़ाई का आधार तैयार किया और लोगों की भर्तियां कीं. सबसे दुखद बात यह है कि इसमें महिलाओं और बच्चों को भी शामिल किया गया.

यह संभव है कि चरमपंथी समूहों को विदेशों से वित्ताीय और हथियारों की मदद मिल रही हो, लेकिन जमीनी सच्चाई यही है कि उनके विस्तार अथवा प्रभाव वृद्धि में घरेलू वजहें कहीं अधिक जिम्मेदार हैं और इसमें जनजातियों में व्याप्त असंतोष, उनके साथ भेदभाव और विस्थापन की समस्या मुख्य हैं. इस संदर्भ में तमाम सफल कहानियां हैं जिनसे हम सबक सीख सकते हैं. महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के मेंडा लेखा गांव में ग्रामसभा को खेती और बांस के व्यापार में पूर्ण नियंत्रण दिया गया है. माओवादी इसे पसंद नहीं करते, लेकिन ग्रामसभा इससे वित्ताीय रूप से सशक्त हुई है. इसी तरह सामुदायिक वन अधिकारों में सुधार और कानून में बदलाव के जो भी प्रयास किए गए हैं उनका अनुसरण किया जा सकता है.

इस संदर्भ में बदलाव का सर्वाधिक बेहतरीन उदाहरण झारखंड के पश्चिमी सिंहभूमि जिले के सारंडा क्षेत्र का है. जुलाई-अगस्त 2011 में सीआरपीएफ द्वारा दो दशकों तक माओवादी प्रभाव में रहे इस इलाके को मुक्त कराए जाने के बाद ग्रामीण विकास मंत्रालय ने बड़ी संख्या में विकास योजनाओं की शुरुआत की, जिनमें रोजगार सृजन, सड़क, घर निर्माण, जल आपूर्ति, वर्षाजल प्रबंधन, जीवनस्तर को बेहतर बनाने के साथ महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूहों की शुरुआत की गई. नागरिक प्रशासन की विश्वसनीयता बहाल की गई.

इससे सकारात्मक बदलाव हुआ और एक नए विश्वास का संचार हुआ. सारंडा मॉडल को झारखंड, पश्चिमी बंगाल और ओड़िशा के भी कुछ इलाकों में अपनाया गया. बंगाल में ऐसी ही पहल करते हुए माओवादियों के गढ़ जंगलमहल क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियों को बहाल किया. यह बहुत महत्वपूर्ण बात है. इससे माओवादी ढांचा कमजोर हुआ. जहां-जहां राजनीतिक पार्टियों ने अपनी स्वाभाविक भूमिका निभानी छोड़ी वहां-वहां चरमपंथी संगठनों ने खाली स्थान को भरने का काम किया. अकेले विकासवादी रणनीति काफी नहीं होगी और न ही अर्धसैनिक बलों पर आधारित रणनीति पर्याप्त होगी. पूर्व की गलतियों में सुधार और जनजातीय समुदायों की चिंताओं पर ध्यान दिए बिना हम नक्सलवाद को समूल नष्ट नहीं कर सकते.

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