जब एक कलेक्टर को अवमानना की सजा मिली

सुदीप ठाकुर | फेसबुक: सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के पूर्व अंतरिम प्रमुख नागेश्वर राव और जांच एजेंसी के सलाहकार को अवमानना का दोषी करार दिया है, यह अभूतपूर्व घटना है. सुप्रीम कोर्ट ने दोनों को अदालत के कक्ष के एक कोने में बैठे रहने की सजा दी और दोनों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया.

यह घटना कार्यपालिका और उसके अधीन काम करने वाली एजेंसियों के अंतरसंबंधों को भी रेखांकित करती है. संविधान ने न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की हदें तय की हैं. लेकिन सियासी हितों के कारण ये हदें लांघने की किस तरह से कोशिश होती है, यह घटना उसका एक उदाहरण है.


इससे पता चलता है कि सीबीआई जैसी जांच एजेंसी को आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट को पिंजरे का तोता कहना पड़ा था.

लेकिन किसी अधिकारी को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराये जाने और फिर उसे शाम तक अदालत के एक कोने में बैठे रहने की सजा देने का यह पहला मामला नहीं है. आज से तकरीबन 44 वर्ष पूर्व अविभाजित मध्य प्रदेश में जबलपुर उच्च न्यायालय ने एक जिला कलेक्टर को अदालत की अवमानना का दोषी पाकर उन्हें इसी तरह की सजा सुनाई थी.

यह वाकया था, राजनांदगांव जिले का. 1973 में राजनांदगांव को दुर्ग से अलग कर नया जिला बनाया गया था. अरुण क्षेत्रपाल इस नए जिले के पहले कलेक्टर थे. अवमानना का यह मामला उनसे ही जुड़ा हुआ है.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब 25 जून, 1975 की रात देश में आपातकाल लगाने का फैसला किया, उसके बाद देशभर में विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया जाने लगा. इसका असर छत्तीसगढ़ और राजनांदगांव में भी हुआ, जहां उस समय मदन तिवारी, जेपीएल फ्रांसिस, विद्याभूषण ठाकुर, दरबार सिंह ठाकुर और चंद्रभूषण दास जैसे अनेक समाजवादी नेता सक्रिय थे.

तेज तर्रार और जुझारू तेवर के समाजवादी नेता विद्याभूषण ठाकुर को मीसा एक्ट 1971 के तहत गिरफ्तार कर रायपुर की सेंट्रल जेल में रखा गया था. उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत और मीसा एक्ट के खंड 3(1) (a) के प्रावधान के अनुसार अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए हेबीअस कार्पस यानी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की दायर कर दी.

जबलपुर उच्च न्यायालय ने 1.8.1975 के अपने एक आदेश में प्रशासन को निर्देश दिए कि वह बंदी यानी विद्याभूषण ठाकुर को 8.8.1975 को अदालत में पेश करे. लेकिन जिला कलेक्टर अरूण क्षेत्रपाल ने वायरलेस संदेश के जरिये महाधिवक्ता और हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार को सूचित किया कि राज्य सरकार के सामान्य आदेश की वजह से विद्याभूषण ठाकुर को हाई कोर्ट में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता.

अरुण क्षेत्रपाल ने महाधिवक्ता को जो संदेश भेजा उसका एक हिस्सा कुछ इस तरह का थाः ‘सरकार की उपरोक्त अधिसूचना के प्रकाश में वह आपसे आग्रह कर रहे हैं कि आप कोर्ट से आग्रह करें कि वह विद्याभूषण ठाकुर को उसके समक्ष प्रस्तुत किए जाने पर जोर न दे, क्योंकि इस बात की पूरी संभावना है कि यदि विद्याभूषण ठाकुर को जेल से बाहर लाया जाता है, तो कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है. कृपया इस कार्रवाई के बारे में सरकार को अवगत कराएं.’

जबलपुर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ए एन राय की पीठ ने इसे अदालत की अवमानना माना और 20 अगस्त, 1975 को दिए गए अपने फैसले में राजनांदगांव के पहले कलेक्टर अरुण क्षेत्रपाल को इसका दोषी ठहाराया.

अदालत ने अरुण क्षेत्रपाल को उस दिन कोर्ट की कार्रवाई तक यानी दिन भर की सजा सुनाई और उन पर 100 रुपये का जुर्माना लगाया. हालांकि जब अरूण क्षेत्रपाल ने माफी मांगी तो उसे अदालत ने स्वीकार कर लिया.

आजादी के 70 साल बाद आज भी हमारी नौकरशाही सरकारों के इशारों पर ही काम करती हैं, जबकि उसे जनता और भारतीय संविधान के प्रति जवाबदेह होना चाहिए. भारतीय संविधान हमें स्वतंत्रता सेनानियों की ओर से मिला सबसे बड़ा लोकतांत्रिक उपहार है. सरकारें आती जाती रहेंगी, संविधान कायम रहेगा, जो हमें रास्ता दिखाता रहेगा.

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