नान में कार्रवाई रोकने EOW पहुंची अदालत

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ सरकार ने नान घोटाला में कार्रवाई रोकने की मांग की है. राज्य सरकार की ओर से राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने अदालत से अनुरोध किया है कि अदालत विशेष अनुसंधान दल यानी SIT जांच के परिणाम आने तक नान घोटाला में अग्रिम कार्यवाही स्थगित रखे.

नान घोटाला में दो आईएएस अधिकारी अनिल टूटेजा और आलोक शुक्ला के ख़िलाफ़ अदालत ने गिरफ़्तारी वारंट जारी किया था. अनिल टूटेजा की जमानत याचिका स्थानीय अदालत से खारिज की जा चुकी है. माना जा रहा है कि अगर अदालत राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के आवेदन के अनुसार कार्यवाही स्थगित रखने का निर्णय लेती है तो इससे अनिल टूटेजा को बड़ी राहत मिल सकती है.


हालांकि एसआईटी जांच को लेकर विपक्षी दल भाजपा ने सरकार पर ‘बदलापुर’ की कार्रवाई का आरोप लगाया है. भाजपा का कहना है कि सरकार के पास कोई सबूत है तो वह उसे अदालत में पेश कर सकती है. लेकिन किसी भी तरह से पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को इस मामले में फंसाने के लिये सरकार एसआईटी का गठन कर के बदले की भावना से कार्रवाई करना चाह रही है.

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के एंटी करप्शन ब्यूरो और आर्थिक अपराध शाखा ने 12 फरवरी 2015 को राज्य में नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों के 28 ठिकानों पर एक साथ छापा मार कर करोड़ों रुपये बरामद किये थे.

इसके अलावा इस मामले में भ्रष्टाचार से संबंधित कई दस्तावेज़, हार्ड डिस्क और डायरी भी एंटी करप्शन ब्यूरो ने जब्त किये थे. इस मामले में 27 लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज़ किया गया था. जिनमें से 16 के ख़िलाफ़ 15 जून 2015 को अभियोग पत्र पेश किया गया था. जबकि मामले में दो वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डॉ. आलोक शुक्ला और अनिल टूटेजा के ख़िलाफ़ कार्रवाई की अनुमति के लिये केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखी गई.

दोनों अधिकारियों के ख़िलाफ़ 4 जुलाई 2016 को केंद्र सरकार ने अनुमति भी दे दी. लेकिन राज्य सरकार ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की. लगभग ढ़ाई साल बाद इन दोनों अधिकारियों के ख़िलाफ़ पिछले महीने की 5 तारीख़ को पूरक चालान पेश किया गया है.

भूपेश बघेल की सरकार ने राज्य की कमान संभालते ही आईजी के नेतृत्व में एक एसआईटी बनाने की घोषणा की है. यह एसआईटी 3 महीने में नान घोटाले की जांच करेगी. अब राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के न्यायाधीश को कार्रवाई रोकने के लिये आवेदन प्रस्तुत किया है.

इस आवेदन में अग्रिम जांच हेतु तय 11 बिंदु का उल्लेख करते हुये कहा गया है कि इस प्रकरण में जून 2014 से फरवरी 2015 तक की विवेचना की गई है, उसके पूर्व अवधि को अनुसंधान में शामिल नहीं किया गया है.

आवेदन में कहा गया है कि शिवशंकर भट्ट से बरामद 113 पन्ने, जिसमें अवैध लेनदेन का हिसाब होना बताया गया था, उनमें मात्र 6 पन्ने ही केस रिलवेंट होने के कारण प्रकरण में संलग्न किये गये हैं. उन 6 पन्नों मे वर्ष 2011 से 2013 के बीच की अवधि के ज़िलेवार करोड़ों की वसूली का वर्णन है. इन्हीं 6 पन्नों को चालान के साथ अभियोजन दस्तावेज़ के रुप में प्रस्तुत किया गया है. शेष 107 पन्नों को कार्यालय में रखा गया है. इन 107 पन्नों में उक्त तथ्यों के संबंध में इस अपराध की विवेचना नहीं की गई है.

EOW ने अपने आवेदन में कहा है कि के के बारीक के कंप्यूटर से बरामद 127 पन्नों में अवैध लेनदेन का विवरण होना दर्शाया गया है. उपरोक्त 127 पन्ने कार्यालय में रखे गये हैं. अपराध में इन पन्नों की विवेचना नहीं की गई है.

आवेदन के अनुसार गिरीश शर्मा के घर छापेमारी मैं 1.70 लाख रुपये नगद, अनेक वाहन, दो आवास, शॉपिंग मॉल तथा एक प्लाट होने की खबर प्रकाशित कराई गई, किंतु इस संबंध में असमानुपातिक संपत्ति अर्जित करने संबंधी विषय पर प्रकरण में विवेचना नहीं की गई है.

इसी तरह आवेदन में उल्लेख किया गया है कि त्रिनाथ रेड्डी के निवास से जप्त नगदी रकम 42,000 रुपये एवं संपत्ति के दस्तावेज़ जप्त किये गये हैं एवं जप्ती पत्रक अभियोग पत्र में लगाया गया है किंतु इस प्रकरण में असमानुपातिक संपत्ति अर्जित करने संबंधी विषय पर विवेचना नहीं की गई है.

इसी तरह के के बारीक के निवास से जप्त नगदी रकम 31,800 रुपये एवं संपत्ति के दस्तावेज़ जप्त किये गये हैं एवं जप्ती पत्रक अभियोग पत्र में लगाया गया है किंतु इस प्रकरण में असमानुपातिक संपत्ति अर्जित करने संबंधी विषय पर विवेचना नहीं की गई है.

अदालत में पेश आवेदन में कहा गया है कि जीतराम यादव के घर से जप्त 36 लाख रुपये के संबंध में विवेचना में प्रमाणित हुआ कि उक्त राशि शिवशंकर भट्ट की है, अतएव इन्हें एसीबी के बैंक अकाउंट में जमा कर इसकी पावती चालान के साथ संलग्न की गई है. अन्य बैंक अकाउंट की जब्ती की गई है एवं जप्ती पत्रक अभियोग पत्र में संलग्न किया गया है किंतु प्रकरण में असमानुपातिक संपत्ति अर्जित करने संबंधी विषय पर विवेचना नहीं की गई है.

अदालत में पेश 11 बिंदु आवेदन में कहा गया है कि अरविंद ध्रुव से जब्त दस्तावेज़ को अभियोजन पत्र में लगाया गया है. लेकिन इस प्रकरण में असमानुपातिक संपत्ति अर्जित करने संबंधी विषय पर विवेचना नहीं की गई है.

मामले के अभियुक्तों को लेकर कहा गया है कि गिरीश शर्मा, अरविंद ध्रुव, जीतराम यादव, केके बारीक तथा त्रिनाथ रेड्डी से बड़ी धनराशि तथा संपत्तियां बरामद होने के कारण उन्हें आरंभ में अभियुक्त बनाया गया था. माननीय उच्च न्यायालय ने गिरीश शर्मा, अरविंद ध्रुव एवं जीतराम यादव को धारा-319 दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार वर्तमान स्थिति में मुल्जिम के रुप में समंस करने पर रोक लगाई है. विवेचना में इन्हें गवाहों के रुप में प्रस्तुत किया गया है.

राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने अदालत में पेश अपने आवेदन में कहा है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 20 के अंतर्गत यह उल्लेखित है कि यदि किसी लोकसेवक से भ्रष्टाचार की राशि जब्त की जाती है तो यह उपधारणा की जायेगी कि वह राशि उसने स्वयं के लिये ली है. उस राशि को अन्य किसी व्यक्ति के लिये लेना बता कर वह अपने दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकता.

इस आवेदन में कहा गया है कि गिरीश शर्मा से जब्त कंप्यूटर के प्रिंट आउट, चार पन्ने में अनेक प्रभावशाली व्यक्तियों को रिश्वत की राशि प्राप्त होने का उल्लेख है. किंतु उसकी कोई विवेचना नहीं की गई. न ही गिरीश शर्मा के कंप्यूटर की हार्डडिस्क जब्त की गई.

अदालत में कहा गया है कि विशेष अनुसंधान दल SIT जांच के आधार पर इस प्रकर्ण से संबंधित तथ्यों का पुनर्निर्धारण तथा उसके आधार पर अंतिम सत्यान्वेषण किया जाना है. ऐसी स्थिति में अदालत से एसआईटी के परिणाम आने तक इस प्रकरण में अग्रिम कार्यवाही स्थगित रखे जाने का अनुरोध किया गया है.

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