सिंगूर का सबक

नंद कश्यप
सिंगूर के भूमि अधिग्रहण से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को जिन संदर्भों में ऐतिहासिक फैसला निरूपित किया जाएगा उनमें पहला तो यह कि अधिग्रहण से पहले किसानों की आपत्तियों का निराकरण किया गया और न ही उनसे सार्थक बातचीत हुई. यदि इस उक्ति को कड़ाई से लागू किया जाए तो देश में लगभग सभी अधिग्रहण अवैध हैं, क्योंकि हरेक जगह नौकरशाही जनता या किसानों से न ही बात करती न उनकी आपत्तियों का निराकरण करती, और न ही इस संबंध में बने कानूनों और नागरिक अधिकारों को मान्यता देती है.

यहाँ तक कि पर्यावरणीय जन सुनवाईयों में नौकरशाही की भूमिका वास्तविक हकदारों के दमन तक की होती है, सरदार सरोवर बांध के विस्थापितों का आंदोलन इसका एक ज्वलंत उदाहरण है, देश में ऐसे अनेक उदाहरण हैं परंतु बस्तर में लगभग सारी जनसुनवाईयां पुलिस के आतंक और वास्तविक हकदारों को सुनवाई में जाने से रोककर या फिर बंदूक की नोंकपर सहमती ली गई है.

दूसरा मुद्दा मुवावजे को लेकर है, बेहद तर्कसंगत रूप से इसका उल्लेख किया है कोर्ट ने और कहा है जब भूमि के उपयोग से रोक दिया गया तो मुवावजा वापसी कैसे होगी. किसान के आय की निरंतरता तो खेती से सतत् उत्पादन होती है, मुवावजा तो जिंदा रहने में चुक गया, और इसीलिए उन्हें जिन्होंने किन्हीं कारणों से मुवावजा नहीं लिया है उन्हें भी मुआवजे का हकदार मानते हुए निर्देशित किया कि वे यह मुवावजा अभी ले लें.

मैं नहीं जानता कि ऐसा ही फैसला तब भी आता यदि सिंगूर विवाद में वाम सरकार नहीं होती. लेकिन यह वाम मोर्चे के लिए एक सबक है, वह यह कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मेहनतकश किसान मजदूर और आमजन वाम के साथ खड़े रहे परंतु पूंजीवादी उपभोक्ता वादी विकास को जिस उद्योगपति के लिए इस मेहनतकश की उपेक्षा किया वही पूंजीवादी व्यवस्था समाजवादी विचारों की कट्टर दुश्मन है. इसलिए वह ममता और मोदी के साथ हो लिए. इसमें विशेष कर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए सबक है कि मेहनतकश की राजनीति में Good governance नहीं व्यवस्था में रणनीतिक राहत ही होती है. Good Governance तो पूंजीपतियों के लिए होता है, जहाँ हड़तालों पर प्रतिबंध से लेकर धीरे धीरे मौलिक अधिकारों के स्थगन तक आते हैं .

इस फैसले का जमीन पर कितना अमल होगा भविष्य के गर्भ में है, क्योंकि अधिकतर जमीन खेती लायक नहीं बची है और ममता सरकार कोई सर्वहारा की सरकार नहीं है वह भी भ्रष्ट बिल्डरों और कारपोरेटों की सरकार है. वाम के खिलाफ फासिस्ट हमले करवाने ही दुनियाभर के कारपोरेट उसे पाले पोसे हुए हैं.

प्रश्न यह है कि पार्टी और किसान सभा अपनी गलती को स्वीकार कर वापस जनता के पास जाएगी क्या. 73-77 के अर्धफासिस्ट दौर के बाद जितना स्वागत वाम सरकार का देश में हुआ उससे कहीं ज्यादा अब होगा. एक नजीर बनेगा वाम, यदि कारपोरेटों और बिल्डरों द्वारा जमीन लूट के के खिलाफ आंदोलन में अपनी ताकत लगा दे. रोजगार विहीन औद्योगीकरण के इस दौर में कृषि को लाभकारी बनाकर ही समाज को बचाया जा सकता है, और इसके लिए जरूरी है जमीन का बचना. पर्यावरण बचाने जरूरी है सार्वजनिक परिवहन को व्यापक करना न कि निजी वाहनों की भीड़, इससे सड़कों और पार्किंग की विकराल समस्या आ रही है.

यह फैसला मोदी सरकार के लिए भी एक चुनौती है. भारत जैसे देश में विशुद्ध अमरीकी पूंजीवाद स्वीकार्य नहीं हो सकता परंतु यदि वह इसी रास्ते चली तो उसका भी हश्र बहुत ही खराब होने जा रहा.

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